Radha Kripa Kataksh Stotra ब्रज की अधिष्ठात्री देवी श्री राधा रानी की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण स्तोत्र है। इसे राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र के नाम से जाना जाता है, और मान्यता है कि इसकी रचना स्वयं भगवान शिव ने की थी। इस स्तोत्र के तेरह श्लोकों में श्री राधा जी के दिव्य सौंदर्य, उनके गुणों, उनकी करुणा और वात्सल्य का अत्यंत काव्यात्मक और भक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है।
Shri Radha Kripa Kataksh Stotra का नियमित पाठ करने वाले भक्तों का विश्वास है कि इससे राधा रानी की कृपा-दृष्टि शीघ्र प्राप्त होती है और जीवन के समस्त कष्ट, दुःख तथा संचित कर्मों का नाश होता है। वैष्णव परंपरा, विशेषकर वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में, यह स्तोत्र अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया और पढ़ा जाता है। आइए इस पवित्र स्तोत्र को उसके मूल संस्कृत रूप, हिंदी अर्थ और आध्यात्मिक महत्व के साथ विस्तार से समझते हैं।
श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र – मूल संस्कृत पाठ (Shri Radha Kripa Kataksh Stotra Sanskrit Text)
नीचे श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का संपूर्ण मूल पाठ दिया गया है, जिसे बिना किसी श्लोक को छोड़े प्रस्तुत किया गया है –
मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणि, प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकुञ्जभूविलासिनि।
व्रजेन्द्रभानुनन्दिनि व्रजेन्द्रसूनुसंगते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥१॥
अशोकवृक्षवल्लरी वितानमण्डपस्थिते, प्रवालज्वालपल्लव प्रभारुणांघ्रिकोमले।
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥२॥
अनंगरंगमंगल-प्रसंगभंगुरभ्रुवां, सुविभ्रम ससम्भ्रम दृगन्तबाणपातनैः।
निरन्तरं वशीकृत-प्रतीतनन्दनन्दने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥३॥
तडित्सुवर्णचम्पक प्रदीप्तगौरविग्रहे, मुखप्रभापरास्त-कोटिशारदेन्दुमण्डले।
विचित्रचित्र-सञ्चरच्चकोरशावलोचने, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥४॥
मदोन्मदातियौवने प्रमोदमानमण्डिते, प्रियानुरागरञ्जिते कलाविलासपण्डिते।
अनन्यधन्यकुञ्जराज्य-कामकेलिकोविदे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥५॥
अशेषहावभाव-धीरहीरहारभूषिते, प्रभूतशातकुम्भकुम्भ-कुम्भिकुम्भसुस्तनि।
प्रशस्तमन्दहास्य-चूर्णपूर्णसौख्यसागरे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥६॥
मृणालबालवल्लरी तरंगरंगदोर्लते, लताग्रलास्यलोलनील-लोचनावलोकने।
ललल्लुलन्मिलन्मनोज्ञ-मुग्धमोहनाश्रिते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥७॥
सुवर्णमालिकांचिते त्रिरेखकम्बुकण्ठगे, त्रिसूत्रमंगलीगुण त्रिरत्नदीप्तिदीधिते।
सलोलनीलकुन्तले प्रसूनगुच्छगुम्फिते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥८॥
नितम्बबिम्बलम्बमान-पुष्पमेखलागुणे, प्रशस्तरत्नकिंकिणी-कलापमध्यमञ्जुले।
करीन्द्रशुण्डदण्डिका-वरोहसौभगोरुके, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥९॥
अनेकमन्त्रनादमंजु-नूपुरारवस्खलत्, समाजराजहंसवंश-निक्वणातिगामिनि।
विलोलहेमवल्लरी-विडम्बिचारुचंक्रमे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥१०॥
अनन्तकोटिविष्णुलोक-नम्रपद्मजार्चिते, हिमादिजा पुलोमजा-विरञ्चिजावरप्रदे।
अपारसिद्धिवृद्धिदिग्ध-सत्पदांगुलीनखे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥११॥
मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी, त्रिवेदभारतीश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी।
रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी, व्रजेश्वरी व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोऽस्तु ते॥१२॥
इतीदमद्भुतस्तवं निशम्य भानुनन्दिनी, करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्षभाजनम्।
भवेत्तदैव सञ्चित-त्रिरूपकर्मनाशनं, लभेत तद्व्रजेन्द्रसूनु-मण्डलप्रवेशनम्॥१३॥
॥ हरिः ॐ तत् सत् ॥

Radha Kripa Kataksh Stotra In Hindi – अंग्रेजी लिप्यंतरण (Transliteration)
Munindra-vrinda-vandite trilok-shok-harini,
Prasanna-vaktra-pankaje nikunja-bhu-vilasini।
Vrajendra-bhanu-nandini vrajendra-sunu-sangate,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥1॥
Ashoka-vriksha-vallari vitana-mandapa-sthite,
Pravala-jvala-pallava prabharunanghri-komale।
Varabhaya-sphurat-kare prabhuta-sampadalaye,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥2॥
Ananga-ranga-mangala-prasanga-bhangura-bhruvam,
Suvibhram sasambhram driganta-banapatanaih।
Nirantaram vashikrita-pratita-nanda-nandane,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥3॥
Tadit-suvarna-champaka pradipta-gaura-vigrahe,
Mukha-prabha-parasta-koti-sharadendu-mandale।
Vichitra-chitra-sancharach-chakora-shava-lochane,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥4॥
Madonmadati-yauvane pramoda-mana-mandite,
Priyanuraga-ranjite kala-vilasa-pandite।
Ananya-dhanya-kunja-rajya-kama-keli-kovide,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥5॥
Ashesha-hava-bhava-dhira-hira-hara-bhushite,
Prabhuta-shata-kumbha-kumbha-kumbhi-kumbha-sustani।
Prashasta-manda-hasya-churna-purna-saukhya-sagare,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥6॥
Mrinala-bala-vallari taranga-ranga-dorlate,
Latagra-lasya-lola-nila-lochanavalokane।
Lalallulan-milan-manojna-mugdha-mohanashrite,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥7॥
Suvarna-malikanchite trirekha-kambu-kanthage,
Trisutra-mangali-guna tri-ratna-dipti-didhite।
Salola-nila-kuntale prasuna-guccha-gumphite,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥8॥
Nitamba-bimba-lambamana-pushpa-mekhala-gune,
Prashasta-ratna-kinkini-kalapa-madhya-manjule।
Karindra-shunda-dandika-varoha-saubhagoruke,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥9॥
Aneka-mantra-nada-manju-nupuraravaskhalat,
Samaja-raja-hansa-vansha-nikvanatigamini।
Vilola-hema-vallari-vidambi-charu-chankrame,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥10॥
Ananta-koti-vishnu-loka-namra-padmajarchite,
Himadija pulomaja-viranchija-varaprade।
Apara-siddhi-vriddhi-digdha-satpadangulinakhe,
Kada karishyasiha maam kripa-kataksha-bhajanam॥11॥
Makheshvari kriyeshvari svadheshvari sureshvari,
Trivedabharatishvari pramanashasaneshvari।
Rameshvari kshameshvari pramodakananeshvari,
Vrajeshvari vrajadhipe shriradhike namostu te॥12॥
Itidam-adbhuta-stavam nishamya bhanunandini,
Karotu santatam janam kripa-kataksha-bhajanam।
Bhavet tadaiva sanchita-trirupa-karma-nashanam,
Labheta tad-vrajendra-sunu-mandala-praveshanam॥13॥
॥ Harih Om Tat Sat ॥
राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र सरल भावार्थ (Simple Meaning)
राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में भक्त, राधा रानी से यह प्रश्न पूछता है – “हे माँ, आप मुझे कब अपनी कृपा-दृष्टि से कृतार्थ करेंगी?” यह पंक्ति स्तोत्र के लगभग हर श्लोक के अंत में दोहराई गई है, जो भक्त की गहन व्याकुलता और समर्पण को दर्शाती है। नीचे प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ दिया गया है –
श्लोक 1: हे माँ! समस्त श्रेष्ठ मुनिगण जिनके चरणों की वंदना करते हैं, जो तीनों लोकों का शोक हरने वाली हैं, जिनका मुख-कमल सदा प्रसन्नता से खिला रहता है, जो निकुंज-भूमि में विलास करने वाली हैं, जो राजा वृषभानु की पुत्री और व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण की सदा संगिनी हैं – हे राधे! आप मुझे कब अपनी कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 2: हे माँ! आप अशोक वृक्ष की लताओं से बने मंडप में विराजमान रहती हैं, आपके चरण-कमल मूँगे की ज्वाला के समान लाल और कोमल हैं, आपके हाथ वर और अभय मुद्रा में सदा स्फुरित रहते हैं, आप अपार ऐश्वर्य की स्वामिनी हैं – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का भागी बनाएंगी?
श्लोक 3: हे माँ! आपकी भृकुटियाँ कामदेव के रंग-प्रसंगों में मनोहर ढंग से मुड़ी हुई हैं, आप अपने चंचल कटाक्ष-बाणों से नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को निरंतर वशीभूत रखती हैं – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 4: हे माँ! आपका गौर शरीर बिजली, स्वर्ण और चम्पा के फूल के समान देदीप्यमान है, आपके मुख की कान्ति करोड़ों शरद-पूर्णिमा के चन्द्रमाओं को भी मात देती है, आपके नेत्र चकोर पक्षी के बच्चों के समान चंचलता से इधर-उधर विचरण करते हैं – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 5: हे माँ! आप उन्मत्त यौवन और आनंदमय मान से सुशोभित हैं, आप अपने प्रियतम के अनुराग से रंगी हुई हैं, आप समस्त कलाओं और विलासों में निपुण हैं, आप निकुंज-राज्य में काम-क्रीड़ा की परम विदुषी हैं – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 6: हे माँ! आप समस्त हाव-भाव और धीर हीरक-हारों से भूषित हैं, आपके स्तन शुद्ध स्वर्ण-कलशों के समान सुंदर हैं, आपकी मंद-मंद मुस्कान सुख के सागर के समान आनंद प्रदान करने वाली है – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 7: हे माँ! जल-तरंगों से हिलती हुई कमल-नाल की लता के समान आपकी कोमल भुजाएँ हैं, आपके नीले चंचल नेत्र पवन में झूलती लता के अग्रभाग के समान चलायमान हैं, समस्त मन को लुभाने वाला मोहन भी आपके मिलन के लिए सदा आतुर और मुग्ध रहता है – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 8: हे माँ! आप स्वर्ण-मालाओं से अलंकृत हैं, आपका कंठ तीन रेखाओं युक्त शंख के समान सुंदर है, आप मंगल-सूत्र में प्रकृति के तीन गुणों और तीन रत्नों की दीप्ति धारण करती हैं, आपके चंचल काले-नीले घुंघराले केश दिव्य पुष्प-गुच्छों से गूँथे हुए हैं – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 9: हे माँ! आपके नितम्ब पर पुष्पों की मेखला-गुण लटक रहे हैं, आपकी कमर सुंदर रत्न-किंकिणियों की मालाओं से सुशोभित है, आपकी जंघाएँ गजराज की सूँड़ के समान सुडौल और सुंदर हैं – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 10: हे माँ! आपके चरणों के नूपुरों की मधुर ध्वनि अनेक वेद-मंत्रों के समान गुंजायमान होती है, वह राजहंसों के समूह के कलरव को भी मात देती है, आपकी चाल स्वर्ण-लता के लहराने के समान मनोहर है – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 11: हे माँ! अनंत करोड़ों विष्णुलोकों में ब्रह्मा जी भी आपके चरणों में झुककर पूजा करते हैं, हिमालय-पुत्री पार्वती, इंद्राणी (पुलोमजा) और सरस्वती (विरंचिजा) को भी वरदान देने वाली आप ही हैं, आपके चरणों की अंगुलियों के नख अपार सिद्धि और वृद्धि से दीप्तिमान हैं – हे राधे! आप मुझे कब कृपा-कटाक्ष का पात्र बनाएंगी?
श्लोक 12: हे माँ! आप यज्ञों की स्वामिनी, क्रियाओं की स्वामिनी, स्वधा (पितृ-तर्पण) की स्वामिनी, देवताओं की स्वामिनी, त्रिवेद-वाणी की स्वामिनी, समस्त प्रमाण-शासन की स्वामिनी, लक्ष्मी की स्वामिनी, क्षमा की स्वामिनी, आनंद-कानन की स्वामिनी और व्रज की अधिष्ठात्री स्वामिनी हैं – हे श्रीराधिके! आपको मेरा बारंबार नमस्कार है।
श्लोक 13 (फलश्रुति): इस अद्भुत स्तवन को सुनकर वृषभानुनन्दिनी श्रीराधा भक्त को निरंतर अपनी कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएं। इस स्तोत्र के प्रभाव से भक्त के संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण – इन तीनों प्रकार के कर्मों का नाश हो जाता है, और वह अंततः श्रीकृष्ण के दिव्य व्रज-मण्डल में प्रवेश प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance of Radha Kripa Kataksh)
Radha Kripa Kataksh केवल एक सौंदर्य-वर्णन नहीं, बल्कि प्रेम-भक्ति की पराकाष्ठा है। इस स्तोत्र में राधा जी को केवल श्री कृष्ण की प्रेयसी के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि की समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री, मखेश्वरी, सुरेश्वरी और व्रजेश्वरी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका गहरा संदेश यह है कि भक्त का समर्पण जितना गहन और निष्कपट होगा, राधा रानी की कृपा-दृष्टि उतनी ही शीघ्र प्राप्त होगी।
यह स्तोत्र भक्त और भगवत्स्वरूपा राधा के बीच के उस अनन्य संबंध को उजागर करता है, जहाँ भक्त बार-बार विनम्रता से पूछता है – “कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्” – अर्थात “आप मुझे कब कृपा-दृष्टि का पात्र बनाएंगी?” यह पंक्ति साधक के हृदय की व्याकुलता और अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।
Radha Kripa Kataksh कब पढ़ें – पाठ का समय और अवसर
श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का पाठ निम्नलिखित समय और अवसरों पर विशेष रूप से फलदायी माना जाता है –
- प्रातःकाल स्नान के पश्चात, शांत मन से इस स्तोत्र का पाठ करना श्रेष्ठ माना जाता है।
- राधा अष्टमी के दिन इसका विशेष पाठ किया जाता है।
- वृंदावन यात्रा के दौरान या ठाकुरजी की सेवा-पूजा में इसे गाया जाता है।
- संध्या समय, विशेषकर तुलसी के समक्ष दीप जलाकर इसका पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- जब मन अशांत हो या जीवन में कठिनाइयाँ हों, तब श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ मानसिक शांति प्रदान करता है।
Radha Kripa Kataksh Stotra के लाभ
नियमित रूप से राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं –
- मानसिक शांति – मन की चंचलता शांत होती है और भीतर एक गहरी स्थिरता आती है।
- राधा रानी की कृपा – श्रद्धापूर्वक पाठ करने से साधक को राधा जी की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।
- संचित कर्मों का नाश – मान्यता है कि इस स्तोत्र के श्रवण मात्र से त्रिविध कर्मों (संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण) का नाश होता है।
- भक्ति भाव में वृद्धि – राधा-कृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना प्रगाढ़ होती है।
- सकारात्मकता और आत्मबल – जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की आंतरिक शक्ति मिलती है।
- व्रज-धाम प्रवेश की कामना – अंततः भक्त को श्री कृष्ण के दिव्य धाम में प्रवेश की कामना पूर्ण होने का आशीर्वाद मिलता है।
पाठ विधि (How To Recite Radha Kripa Kataksh Stotra)
इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए किसी विशेष कठोर नियम की आवश्यकता नहीं है, परन्तु शुद्धता और श्रद्धा का ध्यान रखना आवश्यक है –
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- राधा-कृष्ण की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप और धूप प्रज्वलित करें।
- शांत चित्त से, स्पष्ट उच्चारण के साथ Shri Radha Kripa Kataksh Stotra का पाठ करें।
- पाठ के अंत में राधा रानी से क्षमा-प्रार्थना और कृतज्ञता व्यक्त करें।
जो भक्त संस्कृत उच्चारण में सहज नहीं हैं, वे Radha Kripa Kataksh In Hindi अर्थ सहित पढ़कर भी इसके भावों का अनुभव कर सकते हैं। कई भक्त इसे PDF रूप में सहेजकर नित्य पाठ के लिए उपयोग करते हैं, जिससे Radha Kripa Kataksh PDF की खोज भी श्रद्धालुओं में लोकप्रिय है।
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निष्कर्ष (Conclusion)
Radha Kripa Kataksh Stotra भक्ति, समर्पण और प्रेम का अद्भुत संगम है। इसके तेरह श्लोकों में राधा रानी के दिव्य स्वरूप का जो वर्णन किया गया है, वह हर भक्त के हृदय को गहराई से स्पर्श करता है। जो साधक श्रद्धा और नियमितता के साथ Shri Radha Kripa Kataksh स्तोत्र का पाठ करता है, उसे राधा रानी की कृपा-दृष्टि अवश्य प्राप्त होती है और उसका जीवन प्रेम, शांति और भक्ति से परिपूर्ण हो जाता है।
यदि आप नित्य पाठ के लिए Radha Kripa Kataksh PDF सहेजना चाहते हैं या Radha Kripa Kataksh In Hindi अर्थ सहित पुनः स्मरण करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए एक संपूर्ण संदर्भ है। हे राधे रानी, अपने समस्त भक्तों पर सदा अपनी कृपा-दृष्टि बनाए रखें।
॥ जय श्री राधे ॥
? अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र किसने रचा है?
उत्तर: मान्यता के अनुसार इस स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान शिव ने राधा रानी की स्तुति में की थी।
प्रश्न 2: Radha Kripa Kataksh Stotra का पाठ कब करना चाहिए?
उत्तर: प्रातःकाल या संध्या समय, विशेषकर राधा अष्टमी के दिन इसका पाठ श्रेष्ठ माना जाता है।
प्रश्न 3: इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ मिलते हैं?
उत्तर: मानसिक शांति, राधा रानी की कृपा-प्राप्ति और संचित कर्मों के नाश जैसे आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।
प्रश्न 4: क्या यह स्तोत्र भगवद्गीता का भाग है?
उत्तर: नहीं, यह स्तोत्र भगवद्गीता का अंश नहीं है, यह राधा जी की स्तुति में रचित एक स्वतंत्र भक्ति स्तोत्र है।
प्रश्न 5: इस स्तोत्र में कुल कितने श्लोक हैं?
उत्तर: श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र में कुल तेरह श्लोक हैं, जिनमें अंतिम श्लोक फलश्रुति स्वरूप है।
प्रश्न 6: क्या Radha Kripa Kataksh Stotra का हिंदी अर्थ समझना आवश्यक है?
उत्तर: संस्कृत उच्चारण के साथ अर्थ समझकर पाठ करने से भाव और श्रद्धा दोनों प्रगाढ़ होते हैं, इसलिए राधा कृपा कटाक्ष अर्थ सहित पढ़ना अधिक लाभकारी माना जाता है।
इन मंत्रों और श्लोकों को भी पढ़ना न भूलें:
