भारत की आध्यात्मिक परंपरा में बच्चों को ईश्वर से जोड़ने का सबसे सुंदर माध्यम है प्रार्थना। Kalavati Aai Balopasana एक ऐसी ही पवित्र प्रार्थना-पुस्तिका है जो परमपूज्य श्री कलावतीदेवी आई द्वारा बाल-उपासकों के लिए रची गई है। इस Balopasana में भगवान गणेश, श्री विष्णु, श्रीकृष्ण और सद्गुरु की स्तुति से भरे भजन, श्लोक और प्रार्थनाएं संकलित हैं।
“Balopasana” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: “बाल” अर्थात बच्चे, और “उपासना” अर्थात ईश्वर की आराधना। इस प्रकार Balopasana का सीधा अर्थ है: बच्चों द्वारा की जाने वाली ईश्वर-उपासना।
परमपूज्य कलावती आई एक महान सिद्ध संत एवं गुरुमाता थीं। उन्होंने यह Balopasana Kalavati Aai के रूप में बच्चों को एक अमूल्य आध्यात्मिक उपहार दिया, ताकि वे प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करते हुए अपने जीवन में उत्साह, शक्ति और सफलता प्राप्त करें।
यह लेख Kalavati Aai Balopasana Full In Marathi के साथ-साथ उसका हिंदी अर्थ और आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।
परमपूज्य कलावती आई : संक्षिप्त जीवन परिचय
जन्म और बाल्यकाल
परमपूज्य कलावती आई का जन्म सन् १९०८ में ऋषीपंचमी के पवित्र दिन, ब्राह्म मुहूर्त में हुआ। उनके पिता का नाम बाबुराव और माता का नाम सिताबाई था। वे कल्याणपुरकरों के एक अत्यंत सुसंस्कृत और सात्विक कुल से थीं। इसी घराने में श्रीमद् परमहंस शिवराम स्वामी जैसे महान संन्यासी भी हुए थे।
बाबुराव और सिताबाई के विवाह के आठ वर्षों तक संतान नहीं हुई। तब सन् १९०७ में श्रावण मास में बाबुराव ने पुत्रप्राप्ति की कामना से सहस्त्रलिंगार्चन किया। अष्टमी की रात्रि को देवी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा: “मैं तुम्हारे वंश में जन्म लेने वाली हूँ।” देवी का यह आशीर्वाद फलीभूत हुआ और सिताबाई गर्भवती हुईं। गर्भकाल में सिताबाई को निरंतर नामस्मरण करने की, प्रवचन-कीर्तन सुनने की और मंदिर जाने की तीव्र इच्छा होती रहती थी: यह उस दिव्य बालिका का ही प्रभाव था।
इस सत्शील दम्पत्ती के यहाँ ऋषीपंचमी के शुभ दिन एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ। बारहवें दिन उनका नामकरण किया गया और नाम रखा गया “रुक्माबाई”। परंतु परिवार और स्नेहीजन उन्हें “बाळ” के प्यारे नाम से पुकारते थे।
बाल्यकाल के दिव्य संकेत
बाळ के जीवन से आरंभ से ही दैवी संकेत प्रकट होने लगे। उन्होंने जन्म के प्रथम दिन ही बोलना शुरू किया और उनके मुख से निकला पहला शब्द था: “हरि”। छह महिनों में ही वे पूरी तरह बोलने लगीं।
तीन वर्ष की आयु में परिवार गोकर्ण के पास के खेत पर रहने चला गया। वहाँ प्रतिदिन संध्याकाळी हरिपाठ होता था। बाळ लहानपणापासून अंतर्मुख थी। उन्हें खिलौनों में रुचि नहीं थी, बल्कि देव-मूर्तियाँ ही उनका खेल थीं। कृष्ण की मूर्ति उन्हें विशेष प्रिय थी। वे श्रीकृष्ण की मूर्ति को मध्य में रखकर अन्य देवताओं की मूर्तियाँ उनके आसपास सजाती थीं।
पाँच वर्ष की आयु से उन्होंने कन्नड़, मराठी और गुजराती भाषाओं में भजन गाना शुरू कर दिया। उनका स्वर अत्यंत मधुर था। सात वर्ष की आयु में उन्हें पूर्णानंद सरस्वती स्वामी महाराज के दर्शन हुए, जिन्होंने बाळ की दिव्यता को पहचानकर अपनी नित्यपूजा की गोपालकृष्ण की मूर्ति उन्हें प्रदान की। वह मूर्ति बाळ का सर्वस्व बन गई।
विवाह और वैराग्य
पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह दक्षिण कर्नाटक के कडलूर निवासी पुलिस इंस्पेक्टर एम. राजगोपाल से हुआ। ससुराल जाते समय रास्ते में हुबळी में परमपूज्य श्री सिद्धारूढ स्वामी महाराज के दर्शन हुए और उनका अनुग्रह प्राप्त हुआ। इसके बाद वे और भी अधिक अंतर्मुख होकर कृष्णध्यान में निमग्न रहने लगीं।
सत्रह वर्ष की आयु में उनके एक पुत्र हुआ जिसका नाम बाळकृष्ण रखा गया। परंतु उन्नीस वर्ष की आयु में एक गहरा आघात लगा: उनके पति का अचानक निधन हो गया। पति-वियोग और पश्चात् पिता बाबुराव के निधन ने उन्हें अत्यंत विचलित कर दिया। वे आत्महत्या करने को तत्पर हुईं, किंतु तभी एक जटाधारी साधु प्रकट हुए और उन्होंने कहा
“माई, थांब! थांब! आत्महत्या करण्याकरिता तू जन्माला नाही आलीस।
जीव देणार्यांना वाचविण्यासाठी तुझा जन्म झाला आहे।”
इन शब्दों ने उनके मन को शांत किया और वे हुबळी की ओर चल पड़ीं।
सद्गुरु की सेवा और दीक्षा
हुबळी में श्री सिद्धारूढ स्वामी महाराज के मठ में आईं ने प्रवेश किया। स्वामी उनकी प्रतीक्षा में ही थे। उन्होंने स्वामी की आज्ञा से मठ में सेवा आरंभ की। वे एक लुगड़े के दो टुकड़े करके पहनती थीं, सोने के लिए पोता और उशी के स्थान पर ईंट रखती थीं। दिन-रात उनके मुख पर “ॐ नमः शिवाय” महामंत्र रहता था। आठ-आठ दिन केवल जल पर रहकर उन्होंने तपस्या की।
सन् १९२८ में दशहरे के पावन दिन श्री सिद्धारूढ स्वामी महाराज ने उन पर पूर्णकृपा करते हुए उनका नाम “कलावतीदेवी“ रखा और उन्हें निरूपण करने की आज्ञा दी। तत्पश्चात् एक दिन स्वामी ने उनके मस्तक पर हाथ रखकर पूर्णकृपा प्रदान की। उस कृपा से आई लगभग आठ घंटे गहरी समाधि में स्थिर रहीं। समाधि उतरने पर उन्हें एक नया जन्म होने का अनुभव हुआ।
लोककल्याण का कार्य
स्वामी महाराज की समाधि के पश्चात् आईंने छह माह एकांत में साधनाभ्यास किया। तत्पश्चात् बारह वर्षों तक हरिनाम और विश्वप्रेम के प्रचार के लिए गाँव-गाँव की यात्रा की। इस काल में उन्होंने अनेक रोगियों को रोगमुक्त किया और सहस्रों लोगों को भजन व नामस्मरण से जोड़ा।
स्वामी की आज्ञा मानकर आई ने बेळगाव में “श्री हरि मंदिर” की स्थापना की जो आज भी एक प्रमुख साधना केंद्र है।
आईंने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की जिनमें परमार्थ दर्शन, सिद्धारुढ वैभव, बोधामृत, बालोपासना, कथासुमनहार और श्रीकृष्ण प्रताप प्रमुख हैं।
महासमाधि
परमपूज्य कलावती आई ने ८ फरवरी १९७८, माघ शुद्ध प्रतिपदा के दिन महासमाधि ग्रहण की। उनकी समाधि बेळगाव के श्री हरि मंदिर में स्थित है। आज भी वहाँ सैकड़ों भक्त उनकी कृपाशक्ति का अनुभव करते हैं।
Balopasana के बारे में परमपूज्य आई का मार्गदर्शन
परमपूज्य आई ने बाल-उपासकों को इस प्रकार प्रेरित किया था
“बाळगोपाळांनो! रोज़ सकाळी अंघोळ झाली की तुम्ही या बालोपासनेतिल प्रार्थना म्हणा, म्हणजे तुमचे मन अत्यंत उत्साही बनेल। त्यावर जर शाळेतील अभ्यास केला तर तो पूर्ण तुमच्या लक्षात राहिल आणि तुम्ही परीक्षेत नक्की पास व्हाल। मात्र प्रार्थना दररोज व नियमित केली पाहिजे।”
हिंदी अर्थ “बच्चों! प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद इस बालोपासना की प्रार्थना करो। इससे तुम्हारा मन उत्साह से भर जाएगा। इसके बाद पढ़ाई करोगे तो वह पूरी तरह याद रहेगी और परीक्षा में अवश्य सफल होगे। पर प्रार्थना प्रतिदिन और नियमित रूप से होनी चाहिए।”
Balopasana In Marathi : सम्पूर्ण पाठ
ॐ नम: शिवाय
१. बालोपासना
(श्री गणपति स्तुति)
श्री गणपते | विघ्ननाशना |
मंगलमूरुते | मूषकवाहना | १|
तिमिर नाशिसी | निजज्ञान देउनि |
रक्षिसी सदा | सुभक्तांलागुनि | २|
खड्ग दे मला | प्रेमरूपी हे |
मारिन षड़रिपु | दुष्ट दैत्य हे | ३|
बालकापरी | जवळी घे मज |
ईश जगाचा तू | मी तव पदरज | ४|
मनोहर तुझी | मूर्ति पहावया |
लागी दिव्य दुष्टि | देई मोरया | ५|
पुरवि हेतुला | करुनि करुणा |
रमवी भजनी | कलिमलदहना | ६|
हिंदी भावार्थ हे गणपति! हे विघ्नों के नाशक! हे मंगलमूर्ति! हे मूषकवाहन! आप अपने ज्ञान के प्रकाश से अंधकार को नष्ट करते हैं और सच्चे भक्तों की सदा रक्षा करते हैं। मुझे प्रेम का खड्ग दें जिससे मैं अपने भीतर के षड्रिपुओं को जीत सकूँ। हे जगत के ईश! मुझे बालक की भांति अपने निकट रखें। मैं तो आपके चरणों की धूल मात्र हूँ। हे मोरया! मुझे दिव्य दृष्टि दें ताकि मैं आपके मनोहर स्वरूप के दर्शन कर सकूँ। कृपा करके मेरी भावना पूर्ण करें और मुझे भजन में रमाए रखें।
२. आनंदलहरी
ज्ञानभास्करा शांतिसागरा, भक्तमनहरा मुकुंदा |
परम उदारा भवभयहरा, रखमाईवरा सुखकंदा ||
पाप ताप दुरितादि हराया, तूचि समर्थ यदुराया |
म्हणोनि तुजसी एकोभावे, शरण मी आलो यदुराया ||
कंठी निशिदिनी नाम वसो, चित्ती अखंड प्रेम ठसो |
श्यामसुंदरा सर्वकाळ मज, तुझे सगुण रूप दिसो ||
तू माउली मी लेकरू देवा, तू स्वामी मी चाकरू |
मी पान तू तरुवरु देवा, तू धेनु मी वासरू ||
तू पावन मी पतित देवा, तू दाता मी याचक |
तू फूल मी सुवास देवा, तू मालक मी सेवक ||
तू गूळ मी गोडी देवा, तू धनुष्य मी बाण |
तू डोंगर मी चारा देवा, तू चंदन मी सहाण ||
तू चंद्रमा मी चकोर देवा, मी कला तू पौर्णिमा |
तुझ्या वर्णनासी नाही सीमा, असा अगाध तुझा महिमा ||
तू जल मी बर्फ देवा, तू सागर मी लहरी |
तुजविण क्षण मज युगसम वाटो, हेचि मागणे श्रीहरि ||
वत्सा गाय बाळा माय, तेवी मजला तू आई |
काया वाचा मने सदोदित, तव पदी सेवा मज देई ||
ध्यास नसोंदे विषयांचा मज, तुझ्या पायी मन सतत रमो |
दृढतरभावे तव गुण गाता, कोठे माझे मन न गमो ||
अनंतरूपा एकोभावे, करितो अनंत नमस्कार |
दासपणाचे सुखसोहळे, भोगवी प्रभो निरंतर ||
नको मजवरि राहू उदास धावत येई यदुराया |
तव दर्शनेविण दुजी न आस, धावत येई यदुराया ||
हिंदी भावार्थ हे ज्ञानभास्कर! हे शांति के सागर! हे भक्तों के मन को हरने वाले मुकुंद! हे परम उदार! हे संसार के भय को हरने वाले रुक्मिणीपति! तू ही पाप, ताप और दुःखों को दूर करने में समर्थ है, इसलिए मैं एकभाव से तेरी शरण आया हूँ।
मेरे कंठ में दिन-रात तेरा नाम बसे रहे। हे श्यामसुंदर! तू माँ है और मैं तेरा बालक। तू वृक्ष है और मैं पत्ता। तू गाय है और मैं बछड़ा। तू फूल है और मैं उसकी सुगंध। तू गुड़ है और मैं उसकी मिठास। तू चंद्रमा है और मैं चकोर। तेरे बिना एक क्षण भी युग के समान लगता है: यही मेरी एकमात्र प्रार्थना है, हे श्रीहरि! दौड़ते हुए आ, हे यदुराया!
३. नारायणाष्टक
नारायणा हे नारायणा | नारायणा हे नारायणा |
नारायणा हे नारायणा | नारायणा हे नारायणा ||धृ||
जगादिस्तंभा नारायणा | लक्ष्मीवल्लभा नारायणा |
कमलनाभा नारायणा | नारायणा हे नारायणा || १||
देवकीनंदना नारायणा | गोपीजीवाना नारायणा |
कालियामर्दना नारायणा | नारायणा हे नारायणा || २||
सुहास्यवदना नारायणा | राजीवलोचना नारायणा |
मदनामोहना नारायणा | नारायणा हे नारायणा || ३||
जगज्जनका नारायणा | जगतपालका नारायणा |
जगन्निवासका नारायणा | नारायणा हे नारायणा || ४||
पतितपावना नारायणा | पीतवसना नारायणा |
शेषशयना नारायणा | नारायणा हे नारायणा || ५||
त्रिगुणातीता नारायणा | षड्गुणवंता नारायणा |
वसुदेवसुता नारायणा | नारायणा हे नारायणा || ६||
सुरनरवंदना नारायणा | असुरकंदना नारायणा |
नित्यनिरंजना नारायणा | नारायणा हे नारायणा || ७||
यदुकुलभूषणा नारायणा | भवसिंधुतारणा नारायणा |
कलिमलहरणा नारायणा | नारायणा हे नारायणा || ८||
हिंदी भावार्थ हे नारायण! हे जगत के आधारस्तंभ! हे लक्ष्मीपति! हे कमलनाभ! हे देवकीनंदन! हे गोपियों के जीवनधन! हे कालियामर्दन! हे सुंदर मुस्कान वाले! हे कमलनेत्र! हे मदनमोहन! हे जगत के जनक, पालक और निवासस्थान! हे पतितपावन! हे पीताम्बरधारी! हे शेषशयन! हे त्रिगुणातीत! हे वसुदेवपुत्र! हे देव-मनुष्यों द्वारा वंदित! हे असुरनाशक! हे नित्यनिरंजन! हे यदुकुलभूषण! हे भवसागर से तारने वाले! हे कलियुग के पापों को हरने वाले! बारंबार नमस्कार!
४. चोवीस नामावळी
केशवा, दे मजला विसावा | आलो शरण तुला | १|
नारायणा, करी मजवरी करूणा | आलो शरण तुला | २|
माधवा, चैन पडेना जीवा | आलो शरण तुला | ३|
गोविंदा, दे तव नाम छंदा | आलो शरण तुला | ४|
श्रीविष्णु, मी वत्स तू धेनु | आलो शरण तुला | ५|
मधुसूदना, वारि चित्तवेदना | आलो शरण तुला | ६|
त्रिविक्रमा, अगाध तुझा महिमा | आलो शरण तुला | ७|
वामना, पुरवी मनकामना | आलो शरण तुला | ८|
श्रीधरा, तुजविण नको पसारा | आलो शरण तुला | ९|
हृषिकेशा, तोडी वेगी भवपाशा | आलो शरण तुला | १०|
पद्मनाभा, जगताचा तू गाभा | आलो शरण तुला | ११|
दामोदरा, चरणी देई थारा | आलो शरण तुला | १२|
संकर्षणा, तू त्रैलोक्याचा राणा | आलो शरण तुला | १३|
वासुदेवा, सतत देई मज सेवा | आलो शरण तुला | १४|
प्रद्यम्ना, न पाहि तुजविण आना | आलो शरण तुला | १५|
अनिरुद्धा, दे प्रेम भक्ति श्रद्धा | आलो शरण तुला | १६|
पुरुषोत्तमा, भजनी दे मज प्रेमा | आलो शरण तुला | १७|
अधोक्षजा, सत्य सखा तू माझा | आलो शरण तुला | १८|
नरसिंहा, कृपा करिसि तू केव्हां | आलो शरण तुला | १९|
अच्युता, तुजविण नाही त्राता | आलो शरण तुला | २०|
जनार्दना, घे पदरी या दिना | आलो शरण तुला | २१|
उपेंद्रा, घालवि आळस-निद्रा | आलो शरण तुला | २२|
श्रीहरि, जन्ममरणाते वारी | आलो शरण तुला | २३|
श्रीकृष्णा, घालवि माझी तृष्णा | आलो शरण तुला | २४|
निरंजना, रुक्मिणीच्या जीवना | आलो शरण तुला | २५|
हिंदी भावार्थ यह भगवान विष्णु के चौबीस (पच्चीस) नामों से की जाने वाली शरणागति प्रार्थना है। प्रत्येक नाम में एक विशेष प्रार्थना निहित है: “हे केशव! मुझे विश्राम दो। हे नारायण! मुझ पर करुणा करो। हे माधव! जीव को चैन नहीं है। हे गोविंद! मुझे अपने नाम की धुन दो।” इस प्रकार प्रभु के प्रत्येक नाम के साथ भक्त अपनी एक इच्छा और शरणागति प्रकट करता है।
५. गुरुपादुकाष्टक
दयावंत कृपावंत सद्गुरुराया | अनन्यभावे शरण आलो मी पाया |
भवभ्रमातुनि काढी त्वरे या दीनासी | नमस्कार करितो तुझ्या पादुकांसी || १||
अनंत अपराधी मी सत्य आहे | म्हणोनि तुझा दास होऊ इच्छिताहे |
तुजविण हे दुःख सांगू कुणासी | नमस्कार करितो तुझ्या पादुकांसी || २||
मतिहीन परदेशी मी एक आहे | तुजविण जगी कोणी प्रेमे न पाहे |
जननी जनक इष्ट बंधु तू मजसी | नमस्कार करितो तुझ्या पादुकांसी || ३||
जगतपसारा दिसो सर्व वाव | अखंडीत तव पायी मज देई ठाव |
विषापरि विषय वाटो मनासी | नमस्कार करितो तुझ्या पादुकांसी || ४||
तव आज्ञेसी पाळील जो एकभावे | तयासीच तू भेट देसी स्वभावे |
म्हणोनि अनन्यशरण आलो मी तुजसी | नमस्कार करितो तुझ्या पादुकांसी || ५||
किती दिवस गाऊ हे संसारगाणे | तुजविण कोण हे चुकविल पेणे |
नको दूर लोटू चरणी थारा दे मजसी | नमस्कार करितो तुझ्या पादुकांसी || ६||
सुवार्णासी सोडुनी कांति न राही | सुमनासी न सोडी सुवास पाही |
तैसा मी राहीन निरंतर तुझ्या सेवेसी | नमस्कार करितो तुझ्या पादुकांसी || ७||
कलावंत भगवंत अनंत देवा | मनकामना पुरवि दे अखंड तव भक्तिमेवा |
कृपा करोनि मज ठेवी स्वदेशी | नमस्कार करितो तुझ्या पादुकांसी || ८||
हिंदी भावार्थ हे दयावान और कृपावान सद्गुरुराया! मैं अनन्यभाव से आपके चरणों में शरण आया हूँ। इस संसार की भ्रांति से मुझ दीन को शीघ्र निकालिए। आपकी पादुकाओं को मेरा नमस्कार। मैं अनंत अपराधी हूँ, इसलिए आपका दास बनना चाहता हूँ। मेरा दुःख आपके बिना किसे कहूँ? जैसे सोने की चमक उससे अलग नहीं हो सकती, फूल की सुगंध उससे अलग नहीं हो सकती, वैसे ही मैं निरंतर आपकी सेवा में बना रहूँगा। आपकी पादुकाओं को नमस्कार।
६. यदुवीराष्टक
नमन करितो अनंता | सुमन वाहतो श्रीकांता |
ठेवितो चरणावरी माथा | जय जय यदुवीर समर्था || १||
त्रयभुवनाचा तू कंद | अससी सत-चित-आनंद |
परि सगुण होउनि रमविसि भक्तां | जय जय यदुवीर समर्था || २||
देवकीने तुज वाहिले | नंदराणीने पाळिले |
तोषविली गोकुळिची जनता | जय जय यदुवीर समर्था || ३||
पुतनेचे विष शोषियेले | अघ-बक असुरा मारियले |
करांगुळी गोवर्धन धरिता | जय जय यदुवीर समर्था || ४||
कलियावरी नाचसी | मंजुळ मुरली वाजविसी |
यमुनातीरी धेनु चारिता | जय जय यदुवीर समर्था || ५||
गोपीसवे रास खेळसी | अक्रुरासह मथुरे जासी |
गज आपटिला भूमिवरुता | जय जय यदुवीर समर्था || ६||
कंसाचे केले कंदन | राज्यी स्थापिला उग्रसेन |
सुख विलेसी तात-माता | जय जय यदुवीर समर्था || ७||
गुरूगृही काष्टे वाहिली | विप्रा सुवर्णपुरी दिधलि |
भक्तांची कामना पुरविता | जय जय यदुवीर समर्था || ८||
अर्जुनासी कथिलि गीता | ती झाली सकलां माता |
बोधने कलिमल हरिता | जय जय यदुवीर समर्था || ९||
हिंदी भावार्थ हे यदुवीर समर्थ! मैं अनंत को नमन करता हूँ। आप तीनों भुवनों के आधार हैं, सच्चिदानंद स्वरूप हैं। देवकी ने आपको जन्म दिया, नंदरानी ने पालन-पोषण किया, गोकुल की जनता को आपने आनंदित किया। पूतना का विष पीकर आपने उसे मुक्ति दी, अघासुर और बकासुर का वध किया, कनिष्ठिका अंगुली पर गोवर्धन उठाया। कंस का वध करके उग्रसेन को राज्य लौटाया और माता-पिता को सुखी किया। अर्जुन को गीता सुनाकर कलियुग के पापों को हरा। जय जय यदुवीर समर्थ!
७. पूजा
गिरिधर मी पूजणार आजी | यदुवीर मी पूजणार || धृ.||
रत्नजडित सिंहासनी बसवुनी | झारीत घेउनि गुलाबपाणी |
प्रभुरायाचे मुख न्याहाळोनि | स्वकरे पाय धुणार || १||
चंदनउटि लावुनि अंगाला | नेसवुनी पीतांबर पिवळा |
अंगावरि भरजरी लाल शेला | पांघराया देणार || २||
जाई जुई मोगरा मालती | चाफा बकुळी सुगंधि शेवंती |
दवणा मरवा तुळस वैजयंती | गुंफुनि हार करणार || ३||
कपाळी लावुनि कस्तुरिटिळा | सुमनहार घालुनि गळां |
हास्यवदन घनश्याम सांवळा | डोळेभर पहाणार || ४||
धूप घालुनि दीप लाविन | दूधफळाते प्रेमे अर्पिन |
मंगलारती ओवाळून | प्रभुचे गुण गाणार || ५||
परमपावना रुक्मिणीजीवना | निशिदिनी करी रत तव गुणगाना |
ऐसे भावे करुनि प्रार्थना | पदी मस्तक ठेवणार || ६||
तव भक्तिलागी तनु ही झिजू दे | तव चरणकमली मन हे निजू दे | तव स्मरणी ठेवी ही वाचा रिझाया | नमस्कार माझा तुला यदुराया ||
हिंदी भावार्थ आज मैं गिरिधर की पूजा करूँगा! रत्नजड़ित सिंहासन पर बिठाकर गुलाबजल से उनके चरण धोऊँगा। चंदन का लेप लगाकर पीतांबर पहनाऊँगा और लाल शाल ओढ़ाऊँगा। जाई, जुई, मोगरा, चाफा, तुलसी, वैजयंती के फूलों की माला गूँथूँगा। कस्तूरी का तिलक लगाकर उनके हँसते हुए श्यामल मुख को भरपूर निहारूँगा। धूप और दीप से आरती उतारूँगा और प्रभु के गुण गाऊँगा।
८. आरती
आरती १ : श्रीकृष्ण आरती
जय जय कृष्णनाथा | तिन्ही लोकींच्या ताता |
आरती ओवाळीता | हरली घोर भवचिंता || धृ.||
धन्य ते गोकुळ हो, जेथे करी कृष्ण लीला |
धन्य ती देवकीमाता, कृष्ण नवमास वाहिला |
धन्य तो वसुदेव, कृष्ण गुप्तपणे रक्षिला |
धन्य ती यमुनाई, कृष्णपदी ठेवी माथा || १||
धन्य ती नंदयशोदा, ज्यांनी प्रभु खेळविला |
धन्य ते बाळगोपाळ, कृष्ण देई दहीकाला |
धन्य ते गोपगोपी, भोगिति सुखसोहळा |
धन्य त्या राधा-रुक्मिणी, कृष्णप्रेमसरिता || २||
हिंदी भावार्थ हे कृष्णनाथ! हे तीनों लोकों के पिता! आपकी आरती उतारते ही संसार के सभी कष्ट और चिंताएँ दूर हो जाती हैं। धन्य है गोकुल जहाँ आपने लीलाएँ कीं! धन्य हैं देवकीमाता जिन्होंने नौ मास आपको अपने उदर में धारण किया। धन्य हैं नंद-यशोदा जिन्होंने आपको पाला। धन्य हैं राधा-रुक्मिणी जो आपके प्रेम की सरिता हैं।
आरती २ : परमपूज्य कलावती आई आरती
ओवाळू आरती माता कलावती |
पाहता तुझी मूर्ति मनकामनापुर्ती || धृ.||
भावे वंदिता तव दिव्य पाउले |
संसारापासुनि माझे मन भंगले |
तुझ्या भजनी नित चित्त रंगले |
झाली ह्रत्तापाची पूर्ण शांति || १||
गौरवर्ण तनुवरि शोभे शुभ्र अंबर |
दर्शनमात्रे लाभे आनंद थोर |
भाषणे सकल संशय जाती दूर |
विशालाक्ष मज दे गुणवंती || २||
हिंदी भावार्थ माता कलावती की आरती उतारते हैं। आपकी मूर्ति देखने मात्र से मन की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। आपके दिव्य चरणों की वंदना करने से मेरा मन संसार से विरक्त हो गया और आपके भजन में रंग गया। इससे हृदय के सभी ताप शांत हो गए। आपके श्वेत वस्त्रों में गोरी काया सुशोभित है। आपके दर्शन से ही महान आनंद प्राप्त होता है और आपके प्रवचन से सभी संशय दूर हो जाते हैं।
९. उद्यापन (प्रार्थना)
हे विश्वजनका, विश्वंभरा, विश्वपालका, विश्वेश्वरा !
माझ्या मनाची चंचलता दूर कर।
हे सर्वव्यापी, सर्वसाक्षी, सर्वोत्तमा, सर्वज्ञा !
तुला ओळखण्याचे मला ज्ञान दे।
हे प्रेमसागरा, प्रेमानंदा, प्रेममूर्ते, प्रेमरूपा !
माझे दुर्गुण नाहीसे करून शुद्ध प्रेमाने हृदय भरू दे।
हे ज्ञानेशा, ज्ञानमुर्ते, ज्ञानांजना, ज्ञानज्योति !
तुझ्या चरणी माझी श्रद्धा, भक्ती द्रुढ कर।
हे मायातीता, मायबापा, मायाचालका, मायामोहहरणा !
समदृष्टी आणि अढळ शांति मला दे।
हे कमलनयना, कमलाकांता, कमलानाथा, कमलाधीशा !
माझ्या नेत्रांना सर्व स्थावर-जंगमात तुझे दर्शन घडू दे।
माझे कान तुझे कीर्तन श्रवण करू देत।
हे पतितपावना, परमेशा, परमानंदा, परमप्रिया !
माझ्या हस्ताने तुझी पूजा घडू दे।
तुझ्याभोवती माझे पाय प्रदक्षिणा घालू देत।
हे गुरुनाथा, गुरुमूर्ते, गुरुराजा, गुरुदेवा !
माझे मन निरंतर तुझे ध्यान करू दे।
तुझ्या चरणकमली मला अखंड थारा दे।
हिंदी भावार्थ हे विश्व के जनक, विश्वपालक, विश्वेश्वर! मेरे मन की चंचलता दूर करो। हे सर्वव्यापी, सर्वसाक्षी, सर्वज्ञ! मुझे तुम्हें जानने का ज्ञान दो। हे प्रेमसागर! मेरे दुर्गुणों को नष्ट करके शुद्ध प्रेम से मेरा हृदय भर दो। हे ज्ञानज्योति! मेरी श्रद्धा और भक्ति को दृढ़ करो। हे मायातीत! मुझे समदृष्टि और अटल शांति दो। हे कमलनयन! मेरी आँखें सर्वत्र आपके दर्शन करें, मेरे कान सदा आपका कीर्तन सुनें, मेरे हाथ सदा आपकी पूजा करें, मेरे पाँव सदा आपकी प्रदक्षिणा करें और मेरा मन निरंतर आपका ध्यान करे। आपके चरणकमलों में मुझे अखंड स्थान दो।
Balopasana का पाठ कब और कैसे करें
Kalavati Aai Balopasana के नियमित पाठ के लिए परमपूज्य आई ने स्वयं कुछ सरल और स्पष्ट निर्देश दिए हैं
प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात् यह Balopasana करनी चाहिए। पाठ करते समय मन को एकाग्र रखें और प्रत्येक पंक्ति को पूरे भाव के साथ बोलें। बड़ों के दबाव या भय से की गई प्रार्थना ईश्वर को प्रिय नहीं होती। प्रेम, श्रद्धा और उत्सुकता के साथ पाठ करना चाहिए। यह पाठ प्रतिदिन और बिना नागा के करने से ही पूर्ण फल मिलता है। यदि संभव हो तो पूरे परिवार के साथ मिलकर इस Balopasana Kalavati Aai का पाठ करें।
Kalavati Aai Balopasana के आध्यात्मिक लाभ
इस Balopasana के नियमित पाठ से अनेक आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ होते हैं
बच्चों के लिए पढ़ाई में एकाग्रता और स्मरणशक्ति बढ़ती है। परीक्षाओं में सफलता मिलती है। मन उत्साही और सकारात्मक बना रहता है। जीवन में अनुशासन और संस्कार का बीजारोपण होता है।
सभी साधकों के लिए मन की चंचलता दूर होती है। ईश्वर में श्रद्धा और भक्ति दृढ़ होती है। षड्रिपुओं पर विजय पाने की आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है। सद्गुरु का आशीर्वाद और कृपा सदा बनी रहती है। हृदय के सभी ताप और संसारिक चिंताएँ शांत होती हैं।
निष्कर्ष
Kalavati Aai Balopasana केवल एक प्रार्थना-संग्रह नहीं है: यह परमपूज्य कलावती आई की असीम करुणा और शिष्यप्रेम का जीवंत प्रमाण है। उन्होंने इसे इसलिए रचा ताकि प्रत्येक बच्चे के जीवन की नींव ईश्वरभक्ति, अनुशासन और संस्कार पर खड़ी हो।
चाहे Balopasana In Marathi में पाठ करें या Balopasana In English में उसका अर्थ समझें: इसका मूल भाव एक ही है। वह है ईश्वर के साथ सरल, निष्कपट और प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करना।
जो साधक इसे प्रतिदिन श्रद्धा और नियम से पढ़ता है उसके जीवन में ज्ञान का प्रकाश जलता है, मन की शांति उतरती है और सद्गुरु का आशीर्वाद सदा बना रहता है।
परमपूज्य आई के इन्हीं पवित्र शब्दों के साथ इस लेख का समापन करते हैं
“देवाचा आशीर्वाद मिळून मोठेपणी सुद्धा प्रत्येक कामात तुम्ही यशस्वी व्हाल।”
अर्थ “ईश्वर का आशीर्वाद पाकर बड़े होने पर भी जीवन के हर कार्य में तुम सफल होगे।”
|| श्री गोपालकृष्ण महाराज की जय || || परमपूज्य श्री कलावती माता की जय || || श्री सिद्धारूढ बाबा महाराज की जय ||
? FAQs : अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. Kalavati Aai Balopasana क्या है?
यह परमपूज्य श्री कलावतीदेवी आई द्वारा बच्चों के लिए रची गई एक पवित्र प्रार्थना-पुस्तिका है जिसमें गणेश स्तुति, आनंदलहरी, नारायणाष्टक, चोवीस नामावळी, गुरुपादुकाष्टक, यदुवीराष्टक, पूजा, आरती और उद्यापन सम्मिलित हैं।
2. परमपूज्य कलावती आई का जन्म कब हुआ था?
उनका जन्म सन् १९०८ में ऋषीपंचमी के शुभ दिन ब्राह्म मुहूर्त पर हुआ था। उनका मूल नाम रुक्माबाई था और सद्गुरु श्री सिद्धारूढ स्वामी ने उन्हें सन् १९२८ में “कलावतीदेवी” नाम दिया।
3. Balopasana का पाठ किस समय करना चाहिए?
प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात् यह Balopasana करना सर्वोत्तम माना जाता है।
4. क्या Balopasana Kalavati Aai PDF उपलब्ध है?
हाँ, यह ऑनलाइन उपलब्ध है। आप Blessingread.com पर जाकर इसे पढ़ और डाउनलोड कर सकते हैं।
5. Kalavati Aai Balopasana Full In Marathi में कितने भाग हैं?
इसमें मुख्यतः नौ भाग हैं: बालोपासना, आनंदलहरी, नारायणाष्टक, चोवीस नामावळी, गुरुपादुकाष्टक, यदुवीराष्टक, पूजा, आरती और उद्यापन।
6. क्या यह बालोपासना केवल बच्चों के लिए है?
नहीं। बाल शब्द यहाँ बच्चों के ईश्वर के प्रति सरल, निष्कपट और प्रेममय भाव को दर्शाता है। इसलिए यह Balopasana हर आयु के साधकों के लिए समान रूप से उपयोगी और लाभकारी है।
🙏 इन मंत्रों और श्लोकों को भी पढ़ना न भूलें:
