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    Home » Shlok » Vritrasura Stuti – वृत्रासुर स्तुति: अर्थ, महत्व और आध्यात्मिक संदेश
    Shlok

    Vritrasura Stuti – वृत्रासुर स्तुति: अर्थ, महत्व और आध्यात्मिक संदेश

    RaviBy RaviMay 21, 2026
    Vritrasura Stuti

    हिंदू धर्म की सबसे महान और रहस्यमयी कथाओं में से एक है Vritrasura की कथा। श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कंध में वृत्रासुर का वर्णन मिलता है। देखने में वृत्रासुर एक राक्षस था, किंतु उसके हृदय में भगवान विष्णु के प्रति जो भक्ति थी, वह अत्यंत दुर्लभ और अनुकरणीय थी।

    युद्धभूमि में इंद्र के साथ भीषण संघर्ष से पहले वृत्रासुर ने भगवान श्रीहरि की जो स्तुति की, उसे ही Vritrasura Stuti कहा जाता है। वृत्रासुर स्तुति में कुल चार श्लोक हैं, जिन्हें Vritrasura Chatushloki भी कहते हैं। ये चारों श्लोक भागवत पुराण (6.11.24–27) से लिए गए हैं।

    Table of Contents

    Toggle
    • Vritrasura Story – वृत्रासुर की कथा
    • Vritrasura Stuti in Sanskrit – वृत्रासुर स्तुति संस्कृत में
      • श्लोक १ (6.11.24)
      • श्लोक २ (6.11.25)
      • श्लोक ३ (6.11.26)
      • श्लोक ४ (6.11.27)
    • आध्यात्मिक व्याख्या – Spiritual Explanation
    • Vritrasura Stuti In Hindi – पाठ का उचित समय
    • आध्यात्मिक लाभ – Spiritual Benefits
      • १. निष्काम भक्ति का भाव जागता है
      • २. वैराग्य की भावना उत्पन्न होती है
      • ३. सत्सङ्ग की इच्छा और प्रेरणा मिलती है
      • ४. मन, वचन और कर्म में एकता आती है
      • ५. आंतरिक शांति और स्थिरता
      • ६. मृत्यु भय का नाश
    • वृत्रासुर स्तुति का संदेश – Spiritual Message
    • निष्कर्ष (Conclusion)
    • ? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
      • प्रश्न १: Vritrasura Stuti क्या है?
      • प्रश्न २: Vritrasura Chatushloki किसे कहते हैं?
      • प्रश्न ३: Vritrasura Stuti का मुख्य Meaning क्या है?
      • प्रश्न ४: Vritrasura Story में वृत्रासुर कौन था?
      • प्रश्न ५: वृत्रासुर स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
      • प्रश्न ६: क्या Vritrasura Stuti In Sanskrit पढ़ना आवश्यक है?

    इन श्लोकों में वृत्रासुर ने न स्वर्ग माँगा, न मोक्ष माँगा, न योगसिद्धि माँगी उसने केवल यही माँगा कि उसका मन सदा प्रभु के चरणों में लगा रहे। यही Vritrasura Stuti का अर्थ और इसकी महानता है।

    Vritrasura Story – वृत्रासुर की कथा

    Vritrasura Story अत्यंत रोचक और प्रेरणादायी है। वृत्रासुर पूर्वजन्म में चित्रकेतु नामक राजा थे। एक बार उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती की उपस्थिति में कुछ असम्मानजनक व्यवहार किया, जिससे माता पार्वती ने उन्हें शाप दिया कि वे असुर-योनि में जन्म लेंगे।

    इस प्रकार चित्रकेतु राजा ने वृत्रासुर के रूप में जन्म लिया। किंतु पूर्वजन्म के संस्कारों के कारण उनके भीतर भगवद्-भक्ति का भाव सदा जागृत रहा। इंद्र से युद्ध से पूर्व, जब Vritrasura जानता था कि उसका अंत निकट है, तब भी उसने प्रभु की स्तुति की। उसने अपनी मृत्यु को भी भगवान की कृपा मानकर स्वीकार किया। यही उसकी सच्ची भक्ति का प्रमाण है।

    Vritrasura Stuti in Sanskrit – वृत्रासुर स्तुति संस्कृत में

    श्लोक १ (6.11.24)

    अहं हरे तव पादैकमूल-
    दासानुदासो भवितास्मि भूयः।
    मनः स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते
    गृणीत वाक् कर्म करोतु कायः॥

    Transliteration:

    Ahaṁ hare tava pādaikamūla- dāsānudāso bhavitāsmi bhūyaḥ।
    Manaḥ smaretāsupater guṇāṁste gṛṇīta vāk karma karotu kāyaḥ॥

    शब्दार्थ:

    • अहम् = मैं
    • हरे = हे हरि (भगवान विष्णु)
    • तव = आपके
    • पादैकमूल = चरण-कमलों के आश्रित
    • दासानुदासः = सेवक के भी सेवक
    • भवितास्मि = बनूँ
    • मनः = मेरा मन
    • स्मरेत = स्मरण करे
    • गुणान् = गुणों को
    • वाक् गृणीत = वाणी गाये
    • कर्म करोतु कायः = शरीर सेवा में लगा रहे

    Vritrasura Stuti Meaning (हिंदी अर्थ): हे प्रभु! आप मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मैं आपके चरण-कमलों के आश्रित भक्तों का भी सेवक बन जाऊँ। मेरा मन सदा आपके गुणों का स्मरण करता रहे, मेरी वाणी निरंतर आपके नाम और गुणों का कीर्तन करती रहे, और मेरा शरीर सदा आपकी सेवा में लगा रहे।

    श्लोक २ (6.11.25)

    न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यम्
    न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
    न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
    समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्क्षे॥

    Transliteration:

    Na nākapṛṣṭhaṁ na ca pārameṣṭhyam na sārvabhaumaṁ na rasādhipatyam।
    Na yogasiddhīrapunarbhavaṁ vā samañjasa tvā virahayya kāṅkṣe॥

    शब्दार्थ:

    • नाकपृष्ठम् = स्वर्गलोक
    • पारमेष्ठ्यम् = ब्रह्मलोक का पद
    • सार्वभौमम् = पृथ्वी का साम्राज्य
    • रसाधिपत्यम् = रसातल का राज्य
    • योगसिद्धिः = योग की सिद्धियाँ
    • अपुनर्भवम् = मोक्ष
    • त्वा विरहय्य = आपको छोड़कर
    • काङ्क्षे = चाहता हूँ

    हिंदी अर्थ: हे भगवन्! मुझे आपको छोड़कर स्वर्गलोक नहीं चाहिए, ब्रह्मलोक का वैभव नहीं चाहिए, पृथ्वी का साम्राज्य नहीं चाहिए, रसातल का राज्य नहीं चाहिए, योग की अष्ट सिद्धियाँ नहीं चाहिए और मोक्ष भी नहीं चाहिए यदि इन सबके लिए आपसे विरह सहना पड़े।

    श्लोक ३ (6.11.26)

    अजातपक्षा इव मातरं खगाः
    स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः।
    प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा
    मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥

    Transliteration:

    Ajātapakṣā iva mātaraṁ khagāḥ stanyaṁ yathā vatsatarāḥ kṣudhārtāḥ।
    Priyaṁ priyeva vyuṣitaṁ viṣaṇṇā mano’ravindākṣa didṛkṣate tvām॥

    शब्दार्थ:

    • अजातपक्षाः = जिनके पंख नहीं उगे हों
    • खगाः = पक्षी
    • मातरम् इव = माँ की तरह
    • वत्सतराः = बछड़े
    • स्तन्यम् = माँ का दूध
    • क्षुधार्ताः = भूख से व्याकुल
    • प्रिया = प्रियतमा (पत्नी)
    • व्युषितम् प्रियम् = विदेश गए पति को
    • विषण्णा = उदास होकर
    • अरविन्दाक्ष = कमलनयन
    • दिदृक्षते = दर्शन के लिए तरसता है

    हिंदी अर्थ: हे कमलनयन प्रभु! जैसे बिना पंखों वाले छोटे पक्षी अपनी माँ की प्रतीक्षा करते हैं, जैसे भूखे बछड़े माँ के दूध के लिए व्याकुल रहते हैं, और जैसे पति के विदेश चले जाने पर पत्नी उदास होकर उनके दर्शनों के लिए तरसती है ठीक वैसे ही मेरा मन भी आपके दर्शन के लिए निरंतर तड़पता रहता है।

    श्लोक ४ (6.11.27)

    ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं
    संसारचक्रे भ्रमतः स्वकर्मभिः।
    त्वन्माययात्मात्मजदारगेहे-
    ष्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयात्॥

    Transliteration:

    Mamottamaśloka-janeṣu sakhyaṁ saṁsāracakre bhramataḥ svakarmabhiḥ।
    Tvanmāyayātmātmaja-dāra-geheṣv- āsakta-cittasya na nātha bhūyāt॥

    शब्दार्थ:

    • उत्तमश्लोकजनेषु = भगवान के उत्तम भक्तों में
    • सख्यम् = सङ्ग, मित्रता
    • संसारचक्रे भ्रमतः = संसार-चक्र में भटकते हुए
    • स्वकर्मभिः = अपने कर्मों के अनुसार
    • त्वन्माययाआसक्तचित्तस्य = आपकी माया से आसक्त चित्त वाले का
    • आत्मात्मजदारगेहेषु = शरीर, पुत्र, स्त्री और घर में
    • न भूयात् = न हो

    हिंदी अर्थ: हे नाथ! मेरे कर्मों के अनुसार मुझे जहाँ भी जन्म मिले, वहाँ मुझे आपके भक्तों का सङ्ग और सेवा मिले। जो लोग आपकी माया के वशीभूत होकर शरीर, पुत्र, स्त्री और घर में आसक्त हैं ऐसे विषयी पुरुषों का सङ्ग मुझे कभी प्राप्त न हो।

    आध्यात्मिक व्याख्या – Spiritual Explanation

    Vritrasura Stuti केवल शब्दों की रचना नहीं है यह एक सच्चे भक्त के हृदय की पुकार है।

    पहले श्लोक में वृत्रासुर ने त्रिविध भक्ति का आदर्श रखा है मन से स्मरण, वाणी से कीर्तन और शरीर से सेवा। यह भक्ति के तीन स्तंभ हैं जो प्रत्येक साधक को अपनाने चाहिए।

    दूसरे श्लोक में वृत्रासुर की विरक्ति देखने योग्य है। जो असुर युद्धभूमि में खड़ा है, वह स्वर्ग, ब्रह्मलोक, मोक्ष तक को अस्वीकार कर देता है यदि उसके लिए प्रभु का विरह सहना पड़े। यह निष्काम भक्ति का सर्वोच्च रूप है।

    तीसरे श्लोक में वृत्रासुर की भगवद्-विरह की पीड़ा तीन उपमाओं के माध्यम से व्यक्त की गई है माँ की प्रतीक्षा करता पक्षी, दूध के लिए आतुर बछड़ा, और पति की प्रतीक्षा करती पत्नी। ये उपमाएँ भक्ति की गहनता को अत्यंत मार्मिक रूप से व्यक्त करती हैं।

    चौथे श्लोक में वृत्रासुर ने सत्सङ्ग की माँग की है। उन्होंने कहा भगवन्, मुझे सुख नहीं चाहिए, वैभव नहीं चाहिए; बस आपके भक्तों का सङ्ग और विषयासक्त लोगों से दूरी मिले। यह संसार से मुक्ति का सरलतम मार्ग है।

    Vritrasura Chatushloki यह सिद्ध करती है कि भक्ति का कोई बाहरी रूप नहीं होता। भक्त तो वह है जिसका हृदय प्रभु में रमा हो चाहे वह राजा हो, ऋषि हो या असुर।

    Vritrasura Stuti In Hindi – पाठ का उचित समय

    Vritrasura Stuti In Hindi का पाठ निम्नलिखित अवसरों पर किया जा सकता है:

    • प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व, शान्त मन से पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
    • भागवत कथा के दौरान जब षष्ठ स्कंध की वृत्रासुर-कथा का प्रसंग आए।
    • एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की उपासना के साथ इस स्तुति का पाठ विशेष महत्वपूर्ण है।
    • मानसिक अशांति या विषम परिस्थिति में जब मन विचलित हो और प्रभु के प्रति समर्पण का भाव जगाना हो।
    • नित्य साधना में प्रतिदिन भक्तिपूर्वक इस वृत्रासुर स्तुति का पाठ मन को स्थिर और शांत रखता है।

    आध्यात्मिक लाभ – Spiritual Benefits

    Vritrasura Stuti के नियमित पाठ से निम्नलिखित आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

    १. निष्काम भक्ति का भाव जागता है

    इन श्लोकों को पढ़कर मन में यह समझ आती है कि प्रभु से कुछ माँगने से बड़ी बात यह है कि प्रभु के साथ जुड़ाव बना रहे।

    २. वैराग्य की भावना उत्पन्न होती है

    दूसरे श्लोक का पाठ संसार की क्षणिक वस्तुओं से विरक्ति दिलाता है और मन को भगवान की ओर उन्मुख करता है।

    ३. सत्सङ्ग की इच्छा और प्रेरणा मिलती है

    चौथे श्लोक से यह प्रेरणा मिलती है कि जीवन में सत्सङ्ग और भक्तों की सेवा ही सच्चा लाभ है।

    ४. मन, वचन और कर्म में एकता आती है

    पहला श्लोक हमें सिखाता है कि मन से, वाणी से और शरीर से तीनों से भगवान की भक्ति करनी चाहिए।

    ५. आंतरिक शांति और स्थिरता

    वृत्रासुर स्तुति श्लोक का भक्तिपूर्वक पाठ चित्त को स्थिर करता है और जीवन के हर संघर्ष में प्रभु पर विश्वास दृढ़ करता है।

    ६. मृत्यु भय का नाश

    वृत्रासुर ने मृत्यु के क्षण में भी प्रभु की स्तुति की यह हमें सिखाता है कि सच्चा भक्त जीवन और मृत्यु दोनों में प्रभु का स्मरण करता है।

    वृत्रासुर स्तुति का संदेश – Spiritual Message

    वृत्रासुर स्तुति का केंद्रीय संदेश यह है कि भक्ति का संबंध बाहरी स्वरूप से नहीं, हृदय की शुद्धता से है। वृत्रासुर एक असुर था, फिर भी उसकी भगवद्-भक्ति इतनी निर्मल थी कि वह भागवत पुराण में स्मरणीय बन गया।

    यह Vritrasura Stuti हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में सबसे बड़ी संपत्ति है भगवान के भक्तों का सङ्ग और प्रभु के चरणों में अनन्य प्रेम। संसार के सभी सुख-वैभव नश्वर हैं, किंतु प्रभु-भक्ति शाश्वत है।

    निष्कर्ष (Conclusion)

    Vritrasura Stuti भारतीय आध्यात्मिक साहित्य का एक अनमोल रत्न है। यह स्तुति हमें यह याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति जाति, कुल या स्वरूप नहीं देखती वह देखती है केवल हृदय की पवित्रता।

    वृत्रासुर जैसे असुर ने जो निष्काम भक्ति का उदाहरण प्रस्तुत किया, वह हम सभी के लिए अनुकरणीय है। उनकी वृत्रासुर स्तुति के ये चार श्लोक हमें बताते हैं कि प्रभु से प्रेम करो फल की चिंता मत करो।

    जब कभी जीवन में अशांति हो, संसार का मोह सताए या मन भटके तब इन वृत्रासुर स्तुति श्लोक का स्मरण करें और प्रभु के श्रीचरणों में अपना मन लगाएँ।

    ? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    प्रश्न १: Vritrasura Stuti क्या है?

    Vritrasura Stuti वह चार श्लोकों की स्तुति है जो वृत्रासुर ने इंद्र से युद्ध से पूर्व भगवान श्रीहरि की स्तुति करते हुए कही थी। यह श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कंध (6.11.24–27) में आती है।

    प्रश्न २: Vritrasura Chatushloki किसे कहते हैं?

    Vritrasura Chatushloki इन्हीं चार श्लोकों (6.11.24, 25, 26, 27) के समूह को कहते हैं। “चतुःश्लोकी” का अर्थ है चार श्लोकों का समूह।

    प्रश्न ३: Vritrasura Stuti का मुख्य Meaning क्या है?

    इसका मुख्य अर्थ यह है कि भक्त को भगवान से कोई भौतिक वस्तु नहीं माँगनी चाहिए न स्वर्ग, न मोक्ष। केवल यही माँगना चाहिए कि मन, वाणी और शरीर सदा प्रभु की भक्ति में लगे रहें और सत्सङ्ग मिलता रहे।

    प्रश्न ४: Vritrasura Story में वृत्रासुर कौन था?

    Vritrasura पूर्वजन्म में चित्रकेतु राजा थे। माता पार्वती के शाप से वे असुर-योनि में जन्मे, किंतु उनकी भगवद्-भक्ति अटूट रही। इंद्र के साथ युद्ध में वज्र से उनका वध हुआ, किंतु उन्होंने मृत्यु को भी प्रभु की कृपा मानकर स्वीकार किया।

    प्रश्न ५: वृत्रासुर स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

    इस स्तुति के चारों वृत्रासुर स्तुति श्लोक प्रतिदिन एकाग्र मन से एक बार पढ़ना भी पर्याप्त है। भागवत कथा के प्रसंग में या एकादशी के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।

    प्रश्न ६: क्या Vritrasura Stuti In Sanskrit पढ़ना आवश्यक है?

    Vritrasura Stuti In Sanskrit पढ़ना सर्वोत्तम है क्योंकि मूल भाव तब पूर्णतः अनुभव होता है। किंतु जो संस्कृत नहीं जानते, वे हिंदी अर्थ के साथ भी इसका पाठ कर सकते हैं भाव और श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण है।

    🙏 इन मंत्रों और श्लोकों को भी पढ़ना न भूलें:

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