सनातन धर्म में भगवान शिव के उग्र रक्षक स्वरूप बटुक भैरव की पूजा विशेष रूप से की जाती है। “बटुक” का अर्थ बालक या ब्रह्मचारी बालक है। यह बाल स्वरूप करुणा और शक्ति से भरा हुआ माना जाता है।
Batuk Bhairav Stotra बटुक भैरव की महिमा का गुणगान करने वाला शक्तिशाली स्तोत्र है। इसके नियमित पाठ से भय मुक्ति, शत्रु नाश, बाधा निवारण और मनोकामना पूर्ति जैसे लाभ मिलते हैं।
Batuk Bhairav Mantra और Batuk Bhairav Beej Mantra का जाप भी तंत्र-मंत्र साधना में बहुत प्रभावी माना जाता है। इनके जाप से भक्तों को सुरक्षा कवच मिलता है और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
काशी, उज्जैन, मथुरा समेत देश भर के भैरव मंदिरों में भक्त Batuk Bhairav Stotra और संबंधित मंत्रों का नित्य पाठ करते हैं।
Batuk Bhairav Mantra (बटुक भैरव मूल मंत्र)
Batuk Bhairav Mantra यह मंत्र बटुक भैरव की उपासना का केंद्र है। इसे “आपदुद्धारण मंत्र” भी कहते हैं क्योंकि यह हर प्रकार की आपदा और संकट से रक्षा करता है:
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ स्वाहा ।
Oṃ Hrīṃ Baṭukāya Āpaduddhāraṇāya Kuru Kuru Baṭukāya Hrīṃ Oṃ Svāhā।
मंत्र का शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ॐ (Oṃ) | परब्रह्म, समस्त सृष्टि का मूल नाद |
| ह्रीं (Hrīṃ) | शक्ति का महाबीज, चेतना और माया का संयोग |
| बटुकाय | बटुक भैरव के लिए |
| आपदुद्धारणाय | आपदाओं (संकटों) से उद्धार करने वाले |
| कुरु कुरु | करो, करो (क्रिया का द्विरुक्त — शीघ्र कृपा की प्रार्थना) |
| स्वाहा | समर्पण, आहुति — “मैं पूर्णतः समर्पित हूँ” |
सरल हिंदी अर्थ:
हे बटुक भैरव! आप आपदाओं से उद्धार करने वाले हैं। हे प्रभु, शीघ्र कृपा करें, शीघ्र कृपा करें। आपको मेरा पूर्ण समर्पण है।
यह Batuk Bhairav Mantra तंत्र और भक्ति दोनों मार्गों के साधकों के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। “कुरु कुरु” की पुनरावृत्ति में भक्त की तीव्र आकांक्षा और विश्वास प्रकट होता है।
Batuk Bhairav Beej Mantra (बटुक भैरव बीज मंत्र)
तंत्र साधना में Batuk Bhairav Beej Mantra का विशेष स्थान है। यह मंत्र साधक के भीतर की चेतना को जागृत करता है:
ऊँ बं बटुक भैरवाय नमः ॥
Oṃ Baṃ Baṭuka Bhairavāya Namaḥ॥
बीज मंत्र का अर्थ
| बीज | अर्थ |
|---|---|
| ऊँ (Oṃ) | परब्रह्म का प्रतीक, सर्वव्यापी चेतना |
| बं (Baṃ) | भैरव का विशेष बीज — शक्ति, साहस और रक्षा का प्रतीक |
| बटुक भैरवाय | बटुक भैरव के लिए |
| नमः | नमस्कार, पूर्ण समर्पण |
आध्यात्मिक अर्थ: “बं” बीज भैरव तत्व का आह्वान करता है। यह बीज मंत्र (Beej Mantra) साधक के मन और शरीर में भैरव की शक्ति का संचार करता है, नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और आत्मिक सुरक्षा का कवच बनाता है।
श्री बटुक भैरव स्तोत्र | Batuk Bhairav Stotra – सम्पूर्ण पाठ
यह सम्पूर्ण बटुक भैरव स्तोत्र चार भागों में विभाजित है ध्यान, मानस-पूजन, मूल-स्तोत्र और क्षमा-प्रार्थना।
ध्यान
वन्दे बालं स्फटिक-सदृशम्, कुन्तलोल्लासि-वक्त्रम्।
दिव्याकल्पैर्नव-मणि-मयैः, किंकिणी-नूपुराढ्यैः॥
दीप्ताकारं विशद-वदनं, सुप्रसन्नं त्रि-नेत्रम्।
हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं, शूल-दण्डौ दधानम्॥
Transliteration:
Vande bālaṃ sphaṭika-sadṛśam, kuntalollāsi-vaktram।
Divyākalpairmava-maṇi-mayaiḥ, kiṃkiṇī-nūpurāḍhyaiḥ॥
Dīptākāraṃ viśada-vadanaṃ, suprasannaṃ tri-netram।
Hastābjābhyāṃ baṭukamaniśaṃ, śūla-daṇḍau dadhānam॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं उस बालक-रूपी भैरव की वंदना करता/करती हूँ जो स्फटिक के समान निर्मल और उज्ज्वल हैं, जिनके घुँघराले केशों से मुख सुशोभित है। वे दिव्य आभूषणों, नवरत्नों, किंकिणी और नूपुरों से सज्जित हैं। उनका रूप तेजस्वी, मुख प्रसन्न, तीन नेत्र दीप्तिमान हैं और वे अपने दोनों कमल-हस्तों में शूल और दण्ड धारण किए हुए हैं।
मानस-पूजन
पाँच तत्वों को समर्पित यह मानस-पूजन साधक के ध्यान के पश्चात किया जाता है:
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये घ्रापयामि नमः।
ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये निवेदयामि नमः।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।
सरल अर्थ:
पृथ्वी तत्व से गंध, आकाश तत्व से पुष्प, वायु तत्व से धूप, अग्नि तत्व से दीप और समस्त तत्वों से ताम्बूल (पान) — यह सब कुछ श्रीमद् आपदुद्धारण बटुक भैरव की प्रसन्नता के लिए समर्पित करता/करती हूँ।
मूल-स्तोत्र (108 नाम)
यह Batuk Bhairav Stotra का मूल भाग है जिसमें भगवान भैरव के 108 नामों की स्तुति है:
ॐ भैरवो भूत-नाथश्च, भूतात्मा भूत-भावनः।
क्षेत्रज्ञः क्षेत्र-पालश्च, क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट् ॥1॥
श्मशान-वासी मांसाशी, खर्पराशी स्मरान्त-कृत्।
रक्तपः पानपः सिद्धः, सिद्धिदः सिद्धि-सेवितः ॥2॥
कंकालः कालः-शमनः, कला-काष्ठा-तनुः कविः।
त्रि-नेत्रो बहु-नेत्रश्च, तथा पिंगल-लोचनः ॥3॥
शूल-पाणिः खड्ग-पाणिः, कंकाली धूम्र-लोचनः।
अभीरुर्भैरवी-नाथो, भूतपो योगिनी-पतिः ॥4॥
धनदोऽधन-हारी च, धन-वान् प्रतिभागवान्।
नागहारो नागकेशो, व्योमकेशः कपाल-भृत् ॥5॥
कालः कपालमाली च, कमनीयः कलानिधिः।
त्रि-नेत्रो ज्वलन्नेत्रस्त्रि-शिखी च त्रि-लोक-भृत् ॥6॥
त्रिवृत्त-तनयो डिम्भः शान्तः शान्त-जन-प्रिय।
बटुको बटु-वेषश्च, खट्वांग-वर-धारकः ॥7॥
भूताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः।
धूर्तो दिगम्बरः शौरिर्हरिणः पाण्डु-लोचनः ॥8॥
प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शंकर-प्रिय-बान्धवः।
अष्ट-मूर्तिर्निधीशश्च, ज्ञान-चक्षुस्तपो-मयः ॥9॥
अष्टाधारः षडाधारः, सर्प-युक्तः शिखी-सखः।
भूधरो भूधराधीशो, भूपतिर्भूधरात्मजः ॥10॥
कपाल-धारी मुण्डी च, नाग-यज्ञोपवीत-वान्।
जृम्भणो मोहनः स्तम्भी, मारणः क्षोभणस्तथा ॥11॥
शुद्द-नीलाञ्जन-प्रख्य-देहः मुण्ड-विभूषणः।
बलि-भुग्बलि-भुङ्-नाथो, बालोबाल-पराक्रम ॥12॥
सर्वापत्-तारणो दुर्गो, दुष्ट-भूत-निषेवितः।
कामीकला-निधिःकान्तः, कामिनी-वश-कृद्वशी ॥13॥
जगद्-रक्षा-करोऽनन्तो, माया-मन्त्रौषधी-मयः।
सर्व-सिद्धि-प्रदो वैद्यः, प्रभ-विष्णुरितीव हि ॥14॥
प्रमुख श्लोकों का सरल अर्थ
श्लोक 1 — भगवान भैरव भूतनाथ हैं, भूतात्मा हैं, क्षेत्र के ज्ञाता और रक्षक हैं, वे विराट् स्वरूप हैं।
श्लोक 7 — वे त्रिवृत्त के पुत्र हैं, बालरूपी हैं, शांत और शांत भक्तों के प्रिय हैं। वे बटुक वेष में खट्वांग धारण किए हुए हैं।
श्लोक 13 — वे सभी आपदाओं से तारने वाले, दुर्गम संकटों के नाशक, इच्छापूर्ण और वशीकरण शक्ति के स्वामी हैं।
श्लोक 14 — वे जगत के रक्षक, अनंत, माया-मंत्र-औषधि स्वरूप, सर्व-सिद्धि-प्रदाता और सर्वशक्तिमान हैं।
फल-श्रुति
अष्टोत्तर-शतं नाम्नां, भैरवस्य महात्मनः।
मया ते कथितं देवि, रहस्य सर्व-कामदम् ॥15॥
य इदं पठते स्तोत्रं, नामाष्ट-शतमुत्तमम्।
न तस्य दुरितं किञ्चिन्न च भूत-भयं तथा ॥16॥
न शत्रुभ्यो भयं किञ्चित्, प्राप्नुयान्मानवः क्वचिद्।
पातकेभ्यो भयं नैव, पठेत् स्तोत्रमतः सुधीः ॥17॥
मारी-भये राज-भये, तथा चौराग्निजे भये।
औत्पातिके भये चैव, तथा दुःस्वप्नजे भये ॥18॥
बन्धने च महाघोरे, पठेत् स्तोत्रमनन्य-धीः।
सर्वं प्रशममायाति, भयं भैरव-कीर्तनात् ॥19॥
फल-श्रुति का अर्थ:
हे देवि! मैंने महात्मा भैरव के 108 नाम तुम्हें बताए — यह सर्व-कामदायी रहस्य है। जो इस उत्तम नाम-स्तोत्र का पाठ करता है, उसे कोई पाप, भूत-भय या शत्रु-भय नहीं होता। महामारी का भय, राजदंड का भय, चोर-अग्नि का भय, अपशकुन का भय, दुःस्वप्न का भय और घोर बंधन — इन सबसे मुक्ति के लिए एकाग्र मन से इस स्तोत्र का पाठ करें। भैरव के कीर्तन से सभी भय शांत होते हैं।
क्षमा-प्रार्थना
आवाहनङ न जानामि, न जानामि विसर्जनम्।
पूजा-कर्म न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर ॥
मन्त्र-हीनं क्रिया-हीनं, भक्ति-हीनं सुरेश्वर।
मया यत्-पूजितं देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥
Transliteration:
Āvāhanaṃ na jānāmi, na jānāmi visarjanam। P
ūjā-karma na jānāmi, kṣamasva parameśvara॥Mantra-hīnaṃ kriyā-hīnaṃ, bhakti-hīnaṃ sureśvara।
Mayā yat-pūjitaṃ deva paripūrṇaṃ tadastu me॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे परमेश्वर! मुझे न आवाहन करना आता है, न विसर्जन। पूजा-कर्म की भी मुझे पूर्ण जानकारी नहीं है कृपया मुझे क्षमा करें। हे देवाधिदेव! मेरी पूजा मंत्र-हीन, क्रिया-हीन और भक्ति-हीन रही हो, फिर भी जो कुछ मैंने आपको अर्पित किया वह पूर्ण हो जाए।
आध्यात्मिक व्याख्या (Spiritual Explanation)
बटुक भैरव स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं है यह एक आध्यात्मिक संवाद है जो भक्त और परमात्मा के बीच का सेतु बनाता है।
बटुक भैरव का बालरूप यह संदेश देता है कि ईश्वर की सत्ता निर्दोष, निर्भय और सरल है। बालक जैसे निष्कलंक मन से जब भक्त इस स्तोत्र का पाठ करता है, तब उसके मन से भय, क्रोध और अहंकार का नाश होता है।
भैरव शब्द तीन तत्वों से बना है:
- भ = भरण (पोषण करने वाले)
- र = रमण (सर्वत्र विद्यमान)
- व = वमन (बुराई का नाश करने वाले)
इस प्रकार बटुक भैरव पोषक, सर्वव्यापी और विघ्ननाशक देव हैं।
कब करें पाठ? (When to Recite)
Batuk Bhairav Stotra का पाठ निम्न अवसरों पर विशेष फलदायी माना जाता है:
- प्रतिदिन प्रातःकाल — सूर्योदय से पहले या सूर्योदय के समय
- रात्रि साधना — विशेषकर अर्धरात्रि में (तंत्र साधकों के लिए)
- अष्टमी और चतुर्दशी तिथि — इन तिथियों पर भैरव की उपासना विशेष फलदायी होती है
- शनिवार और मंगलवार — इन दिनों भैरव उपासना का विशेष महत्व है
- भय, संकट या कठिन परिस्थिति में मन को शांत करने हेतु
- नई यात्रा या कार्य आरंभ से पहले रक्षा और सफलता के लिए
आध्यात्मिक एवं जीवन लाभ (Benefits)
Batuk Bhairav Stotra और Batuk Bhairav Mantra के नियमित पाठ से साधक को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं:
आध्यात्मिक लाभ
- आत्मिक शुद्धि और मन की एकाग्रता
- नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति
- भूत-प्रेत बाधाओं से रक्षा (तांत्रिक मान्यता)
- मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होना
सांसारिक लाभ
- भय और चिंता से मुक्ति
- शत्रुओं पर विजय
- धन और समृद्धि में वृद्धि
- परिवार की सुरक्षा
- न्यायिक मामलों में सफलता
मानसिक लाभ
- मन में साहस और दृढ़ता
- आत्मविश्वास में वृद्धि
- मानसिक शांति और स्थिरता
बटुक भैरव की आरती
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।
काशी क्षेत्र विराजत, अघोर रूप देवा॥
जय भैरव देवा…
बटुक रूप सुहाना, त्रिनयन विशाला।
हाथों में खड्ग शोभे, गले में माला॥
जय भैरव देवा…
उपासना विधि (Worship Method)
बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ करने से पहले निम्न सरल विधि अपनाएँ:
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- भैरव प्रतिमा या चित्र के सामने दीप और धूप जलाएँ
- काले तिल, सरसों तेल और सिंदूर अर्पित करें
- बटुक भैरव बीज मंत्र
ऊँ बं बटुक भैरवाय नमःका 108 बार जाप करें - इसके पश्चात बटुक भैरव मूल मंत्र
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ स्वाहाका जाप करें - तत्पश्चात Batuk Bhairav Stotra का सम्पूर्ण पाठ करें
- अंत में आरती और प्रसाद अर्पित करें
निष्कर्ष (Conclusion)
Batuk Bhairav Stotra केवल शब्दों का संकलन नहीं है यह एक आध्यात्मिक ऊर्जा है जो भक्त के जीवन में प्रकाश, साहस और शांति का संचार करती है।
जब हम श्रद्धापूर्वक बटुक भैरव मंत्र का उच्चारण करते हैं, तो हम उस परम चेतना से जुड़ते हैं जो सृष्टि की रक्षा करती है। बटुक भैरव बीज मंत्र हमारे भीतर की नकारात्मकता को जलाकर हमें शुद्ध और सशक्त बनाता है।
भगवान बटुक भैरव के चरणों में अपना मस्तक झुकाएँ, उनकी कृपा माँगें, और जीवन के हर संकट में उनका स्मरण करें। उनकी भक्ति ही सबसे बड़ा कवच है।
ॐ बटुक भैरवाय नमः॥
हर भय का नाश हो, हर भक्त का कल्याण हो।
? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Batuk Bhairav Stotra क्या है?
Batuk Bhairav Stotra भगवान बटुक भैरव की स्तुति में रचित एक पवित्र स्तोत्र है। इसका पाठ करने से भक्त को भय से मुक्ति, संकट नाश और मनोकामना पूर्ति का वरदान मिलता है।
प्रश्न 2: बटुक भैरव मंत्र कितनी बार जपना चाहिए?
Batuk Bhairav Mantra का जाप न्यूनतम 108 बार प्रतिदिन करना शुभ माना जाता है। विशेष साधना में 1008 बार जाप का विधान भी है।
प्रश्न 3: Batuk Bhairav Beej Mantra क्या है?
ऊँ बं बटुक भैरवाय नमः यही Batuk Bhairav Beej Mantra है। “बं” भैरव का विशेष बीज है जो शक्ति, साहस और रक्षा का प्रतीक है। यह मंत्र साधक की चेतना को जागृत करता है और आत्मिक कवच प्रदान करता है।
प्रश्न 4: बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ किस दिन करना चाहिए?
अष्टमी, चतुर्दशी, शनिवार और मंगलवार को बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से फलदायी होता है।
प्रश्न 5: क्या महिलाएँ Batuk Bhairav Stotra का पाठ कर सकती हैं?
हाँ, महिलाएँ पूर्ण श्रद्धा और भक्ति से बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं। भगवान भैरव सभी भक्तों पर समान कृपा करते हैं।
प्रश्न 6: बटुक भैरव और काल भैरव में क्या अंतर है?
बटुक भैरव भैरव का बालरूप है जो अत्यंत करुणामय और शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं। काल भैरव समय और मृत्यु के अधिष्ठाता देव हैं। दोनों भगवान शिव के ही स्वरूप हैं।
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