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    Mantras

    Yagyopavit Mantra (Janeu Mantra): मुख्य मंत्र अर्थ, महत्व, विधि और आध्यात्मिक लाभ

    RaviBy RaviApril 14, 2026
    yagyopavit mantra

    सनातन धर्म में अनेक संस्कार हैं जो मनुष्य के जीवन को पवित्र और अनुशासित बनाते हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है Yagyopavit Sanskar, जिसे उपनयन संस्कार भी कहा जाता है। यह संस्कार बालक के जीवन में एक नई आध्यात्मिक शुरुआत का प्रतीक है।

    Yagyopavit जिसे सामान्य भाषा में जनेऊ भी कहते हैं एक पवित्र धागा होता है जो तीन धागों से बना होता है। यह धागा ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिशक्ति का प्रतीक माना जाता है। Yagyopavit Mantra वह पवित्र मंत्र है जिसे जनेऊ धारण करते समय उच्चारित किया जाता है।

    इस लेख में हम Yagyopavit Dharan Mantra, उसके अर्थ, Yagyopavit Sanskar in Hindi, और इससे जुड़े आध्यात्मिक लाभों को सरल और भक्तिपूर्ण भाषा में समझेंगे।

    Table of Contents

    Toggle
    • Yagyopavit क्या है?
    • Yagyopavit Mantra — यज्ञोपवीत तीन प्रमुख मंत्र
      • 1. वाजसनेयी यज्ञोपवीत मंत्र (Vajasaneyi Yagyopavit Mantra)
        • मंत्र (Sanskrit Text)
        • रोमन लिप्यंतरण (Transliteration)
        • शब्द-अर्थ (Word by Word Meaning)
        • सरल हिन्दी अर्थ
        • आध्यात्मिक व्याख्या
      • 2. छन्दोग यज्ञोपवीत मंत्र (Chhandoga Yagyopavit Mantra)
        • मंत्र (Sanskrit Text)
        • रोमन लिप्यंतरण (Transliteration)
        • शब्द-अर्थ (Word by Word Meaning)
        • सरल हिन्दी अर्थ
        • आध्यात्मिक व्याख्या
      • 3. जीर्ण यज्ञोपवीत त्याग मंत्र (Jirna Yagyopavit Tyag Mantra)
        • मंत्र (Sanskrit Text)
        • रोमन लिप्यंतरण (Transliteration)
        • शब्द-अर्थ (Word by Word Meaning)
        • सरल हिन्दी अर्थ
        • आध्यात्मिक व्याख्या
    • Janeu Mantra In Hindi — तीनों मंत्रों का सम्मिलित महत्व
    • Yagyopavit Sanskar In Hindi — संस्कार की सम्पूर्ण विधि
    • Yagyopavit के तीनों मंत्र — कब और कैसे पढ़ें?
    • Yagyopavit के आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ
      • आध्यात्मिक लाभ:
      • शारीरिक और मानसिक लाभ:
    • यज्ञोपवीत के तीन धागों का प्रतीकात्मक अर्थ
    • निष्कर्ष (Conclusion)
    • FAQs — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
      • प्रश्न 1: Yagyopavit Mantra का क्या अर्थ है?
      • प्रश्न 2: Yagyopavit Sanskar किस आयु में होना चाहिए?
      • प्रश्न 3: Janeu Mantra कितनी बार पढ़ना चाहिए?
      • प्रश्न 4: क्या Yagyopavit Dharan Mantra केवल पुरुषों के लिए है?
      • प्रश्न 5: Yagyopavit को कब बदलना चाहिए?
      • प्रश्न 5: Yagyopavit को कब बदलना चाहिए और जीर्ण त्याग मंत्र कब पढ़ें?
      • प्रश्न 6: वाजसनेयी और छन्दोग Yagyopavit Mantra में क्या अंतर है?
      • प्रश्न 7: क्या Yagyopavit Mantra गायत्री मंत्र से जुड़ा है?

    Yagyopavit क्या है?

    Yagyopavit शब्द दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है:

    • यज्ञ (Yagya) — पवित्र अनुष्ठान या हवन
    • उपवीत (Upavit) — धारण करना, ऊपर से पहनना

    अर्थात् Yagyopavit वह पवित्र धागा है जो यज्ञ अनुष्ठान के साथ विधिवत् धारण किया जाता है। इसे जनेऊ, यज्ञसूत्र या ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं।

    Yagyopavit Sanskar हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक है। यह संस्कार बालक के जीवन के उस पड़ाव को दर्शाता है जब वह ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश करता है और गुरु की शरण में शिक्षा ग्रहण करता है।

    Yagyopavit Mantra — यज्ञोपवीत तीन प्रमुख मंत्र

    सनातन वैदिक परम्परा में Yagyopavit से सम्बन्धित तीन प्रमुख मंत्र हैं। प्रत्येक मंत्र का अपना विशेष प्रयोजन और महत्व है। इन्हें क्रमशः जनेऊ धारण करते समय, शास्त्रोक्त विधि में और पुराना जनेऊ त्यागते समय पढ़ा जाता है।

    1. वाजसनेयी यज्ञोपवीत मंत्र (Vajasaneyi Yagyopavit Mantra)

    यह मंत्र शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी शाखा से लिया गया है। यह सबसे प्रचलित और व्यापक रूप से प्रयुक्त Yagyopavit Dharan Mantra है।

    मंत्र (Sanskrit Text)

    ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं
    प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
    आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं
    यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

    रोमन लिप्यंतरण (Transliteration)

    Om Yagyopaveetam Paramam Pavitram
    Prajapateryatsahajam Purastat |
    Aayushyamagryam Pratimuñcha Shubhram
    Yagyopaveetam Balamastu Tejah ||

    शब्द-अर्थ (Word by Word Meaning)

    संस्कृत शब्द हिन्दी अर्थ
    यज्ञोपवीतम् यज्ञोपवीत (जनेऊ)
    परमम् सर्वोच्च, परम
    पवित्रम् पवित्र, शुद्ध
    प्रजापतेः प्रजापति (ब्रह्मा जी) का
    यत् सहजम् जो स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हुआ
    पुरस्तात् सृष्टि के प्रारम्भ में
    आयुष्यम् दीर्घायु देने वाला
    अग्रयम् श्रेष्ठ, सर्वोत्तम
    प्रतिमुञ्च धारण करो
    शुभ्रम् श्वेत, उज्ज्वल
    बलम् बल, शक्ति
    अस्तु हो
    तेजः तेज, दीप्ति

    सरल हिन्दी अर्थ

    “यह यज्ञोपवीत परम पवित्र है। यह प्रजापति ब्रह्मा जी से सृष्टि के आरम्भ में ही उत्पन्न हुआ है। यह दीर्घायु और श्रेष्ठता प्रदान करने वाला शुभ्र धागा है। इस यज्ञोपवीत को धारण करो यह तुम्हें बल और तेज प्रदान करे।”

    आध्यात्मिक व्याख्या

    यह Janeu Mantra केवल एक साधारण मंत्र नहीं, यह एक संकल्प है एक वचन जो बालक अपने जीवन के प्रति, अपने गुरु के प्रति और परमात्मा के प्रति लेता है।

    परम पवित्रता का बोध: यज्ञोपवीत को “परमं पवित्रं” कहा गया है यह धागा साधारण वस्त्र नहीं, ईश्वरीय ऊर्जा से स्पर्शित पवित्र सूत्र है।

    ब्रह्मांडीय उत्पत्ति: “प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्” यह यज्ञोपवीत ब्रह्मा जी के साथ सृष्टि के आरम्भ से ही विद्यमान है। इस परम्परा की जड़ें अत्यंत प्राचीन और गहरी हैं।

    दीर्घायु और बल की कामना: “आयुष्यमग्रयं” और “बलमस्तु तेजः” यह मंत्र धारणकर्ता के लिए दीर्घ जीवन, शारीरिक बल और आत्मिक तेज की प्रार्थना करता है।

    2. छन्दोग यज्ञोपवीत मंत्र (Chhandoga Yagyopavit Mantra)

    यह मंत्र सामवेद की छन्दोग शाखा से सम्बन्धित है। सामवेदीय परम्परा में Yagyopavit Sanskar के समय इस मंत्र का विशेष प्रयोग किया जाता है।

    मंत्र (Sanskrit Text)

    ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वोपवीतेनोपनह्यामि।

    रोमन लिप्यंतरण (Transliteration)

    Om Yagyopaveetamasi Yagyasya Tvopaveetenopanaahyaami |

    शब्द-अर्थ (Word by Word Meaning)

    संस्कृत शब्द हिन्दी अर्थ
    यज्ञोपवीतम् असि तुम यज्ञोपवीत हो
    यज्ञस्य यज्ञ का, यज्ञ के योग्य
    त्वा तुम्हें
    उपवीतेन उपवीत (जनेऊ) के द्वारा
    उपनह्यामि बाँधता हूँ, धारण कराता हूँ

    सरल हिन्दी अर्थ

    “तुम यज्ञोपवीत हो यज्ञ का पवित्र सूत्र। मैं तुम्हें यज्ञ के उपवीत (पवित्र धागे) से बाँधता हूँ।”

    आध्यात्मिक व्याख्या

    यह मंत्र अत्यंत संक्षिप्त किन्तु गहन अर्थ से परिपूर्ण है। इसमें यज्ञोपवीत को सीधे सम्बोधित किया गया है जैसे वह एक चेतन सत्ता हो। “यज्ञोपवीतमसि” कहकर जनेऊ को यज्ञ का स्वरूप माना गया है।

    “उपनह्यामि” शब्द में गुरु का वह संकल्प है जिसमें वह शिष्य को यज्ञ की पवित्र परम्परा से आबद्ध करता है। यह मंत्र बताता है कि Yagyopavit केवल एक धागा नहीं यह बालक और यज्ञ-परम्परा के मध्य एक दिव्य बंधन है।

    3. जीर्ण यज्ञोपवीत त्याग मंत्र (Jirna Yagyopavit Tyag Mantra)

    जनेऊ धारण करना जितना आवश्यक है, उतना ही महत्वपूर्ण है पुराने और जीर्ण हो चुके यज्ञोपवीत को विधिवत् त्यागना। यह मंत्र पुराना जनेऊ उतारते समय श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है।

    मंत्र (Sanskrit Text)

    ॐ एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया।
    जीर्णत्वात्तवत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम।।

    रोमन लिप्यंतरण (Transliteration)

    Om Etaavaddina Paryantam Brahma Tvam Dhaaritam Mayaa |
    Jeernatvaat Tvat Parityaago Gaccha Sootra Yathaasukhham ||

    शब्द-अर्थ (Word by Word Meaning)

    संस्कृत शब्द हिन्दी अर्थ
    एतावत् दिन पर्यन्तम् इतने दिनों तक
    ब्रह्म ब्रह्मस्वरूप, पवित्र
    त्वम् तुमको (जनेऊ को)
    धारितम् मया मैंने धारण किया
    जीर्णत्वात् जीर्ण (पुराना) हो जाने के कारण
    त्वत् परित्यागः तुम्हारा त्याग
    गच्छ जाओ
    सूत्र हे सूत्र (धागे)
    यथासुखम् सुखपूर्वक, शान्तिपूर्वक

    सरल हिन्दी अर्थ

    “हे ब्रह्मस्वरूप यज्ञोपवीत! इतने दिनों तक मैंने तुम्हें श्रद्धापूर्वक धारण किया। अब जीर्ण (पुराना) हो जाने के कारण मैं तुम्हारा त्याग कर रहा हूँ। हे पवित्र सूत्र! तुम सुखपूर्वक जाओ।”

    आध्यात्मिक व्याख्या

    यह मंत्र सनातन धर्म की उस उदात्त भावना को प्रकट करता है जिसमें निर्जीव वस्तु को भी आदर और कृतज्ञता दी जाती है। जो जनेऊ इतने समय तक हमारे साथ रहा, हमारी साधना और पूजा का साक्षी बना उसे भी प्रेमपूर्वक विदा करना हमारी संस्कृति की विशेषता है।

    “गच्छ सूत्र यथासुखम्” यह वाक्य मात्र शब्द नहीं, एक कृतज्ञ हृदय की भावना है। इस मंत्र के माध्यम से व्यक्ति अपने पुराने जनेऊ के प्रति आभार व्यक्त करता है और उसे शान्तिपूर्वक प्रकृति में विसर्जित करता है।

    Janeu Mantra In Hindi — तीनों मंत्रों का सम्मिलित महत्व

    Yagyopavit Mantra की यह त्रयी वाजसनेयी मंत्र, छन्दोग मंत्र और जीर्ण त्याग मंत्र मिलकर एक सम्पूर्ण आध्यात्मिक चक्र बनाती है।

    • वाजसनेयी मंत्र नवीन जनेऊ धारण करते समय ईश्वर से बल और तेज की प्रार्थना करता है।
    • छन्दोग मंत्र जनेऊ को यज्ञ के साथ आबद्ध करने का संकल्प है।
    • जीर्ण त्याग मंत्र पुराने जनेऊ के प्रति कृतज्ञता और विनम्रता का भाव प्रकट करता है।

    ये तीनों मंत्र मिलकर बताते हैं कि सनातन धर्म में आरम्भ और अंत दोनों ही पवित्र हैं। जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर ईश्वर का स्मरण यही Yagyopavit Sanskar का मूल सन्देश है।

    Yagyopavit Sanskar In Hindi — संस्कार की सम्पूर्ण विधि

    Yagyopavit Sanskar एक विस्तृत और पवित्र अनुष्ठान है। इसे विधिवत् सम्पन्न करने के लिए पंडित जी की उपस्थिति आवश्यक होती है। इस संस्कार की प्रमुख विधि इस प्रकार है:

    1. मुहूर्त निर्धारण: उपनयन संस्कार के लिए शुभ मुहूर्त का चयन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किया जाता है। सामान्यतः बसंत पंचमी, श्रावण मास और उत्तरायण काल को उत्तम माना जाता है।

    2. स्नान और शुद्धि: बालक को पवित्र स्नान कराया जाता है। इसके बाद पीले वस्त्र पहनाए जाते हैं।

    3. हवन और यज्ञ: गायत्री मंत्र और अन्य वैदिक मंत्रों के साथ हवन सम्पन्न किया जाता है।

    4. Yagyopavit Dharan Mantra का उच्चारण: गुरु या आचार्य बालक को Yagyopavit Mantra के साथ जनेऊ धारण कराते हैं।

    5. गायत्री मंत्र की दीक्षा: बालक को पहली बार गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता है। यह संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है।

    6. भिक्षा-वंदन: बालक अपनी माँ से पहली भिक्षा माँगता है यह ब्रह्मचर्य आश्रम के प्रवेश का प्रतीक है।

    Yagyopavit के तीनों मंत्र — कब और कैसे पढ़ें?

    Janeu Mantra in Hindi की यह त्रयी तीन अलग-अलग परिस्थितियों में प्रयुक्त होती है:

    मंत्र अवसर
    वाजसनेयी Yagyopavit Mantra नया जनेऊ धारण करते समय Yagyopavit Sanskar में और प्रतिवर्ष नया जनेऊ पहनते समय
    छन्दोग Yagyopavit Mantra सामवेदीय परम्परा में जनेऊ धारण के समय यज्ञ-बंधन के रूप में
    जीर्ण यज्ञोपवीत त्याग मंत्र पुराना और जीर्ण जनेऊ उतारते समय नया धारण करने से पूर्व

    इसके अतिरिक्त Yagyopavit Mantra के स्मरण के अन्य अवसर:

    • संध्योपासना के समय — नित्य प्रातः और सायं की पूजा में।
    • पूजा और यज्ञ से पूर्व — किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने से पहले।
    • गायत्री मंत्र जप से पूर्व — जब जनेऊ धारणकर्ता गायत्री का जप करते हैं।
    • श्रावण पूर्णिमा — रक्षाबंधन के पवित्र दिन वार्षिक जनेऊ परिवर्तन के समय।

    Yagyopavit के आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ

    Yagyopavit Mantra और जनेऊ धारण करने के अनेक लाभ शास्त्रों में वर्णित हैं:

    आध्यात्मिक लाभ:

    आत्मशुद्धि: यज्ञोपवीत धारण करने से व्यक्ति की आत्मा में शुद्धता और पवित्रता आती है। वह ईश्वर की उपस्थिति के प्रति अधिक जागरूक होता है।

    अनुशासन की भावना: जनेऊ धारण करने के साथ अनेक नियमों का पालन करना होता है। इससे व्यक्ति में आत्म-अनुशासन और संयम का विकास होता है।

    गायत्री मंत्र का अधिकार: शास्त्रों के अनुसार Yagyopavit Sanskar के बाद ही व्यक्ति को गायत्री मंत्र जपने का विधिवत् अधिकार प्राप्त होता है।

    पाप नाश: यज्ञोपवीत के नियमित धारण और मंत्र उच्चारण से संचित पाप कर्मों का नाश होता है।

    शारीरिक और मानसिक लाभ:

    मन की शांति: Yagyopavit Mantra का उच्चारण और ध्यान मन को शांत और स्थिर करता है।

    बौद्धिक विकास: उपनयन संस्कार बालक को शिक्षा के प्रति समर्पित करता है, जिससे उसका बौद्धिक विकास होता है।

    सकारात्मक ऊर्जा: जनेऊ के तीन धागे सत्व, रज और तम तीन गुणों का प्रतीक हैं। इनका संतुलन व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

    आत्मविश्वास: इस संस्कार से बालक में एक नया आत्मविश्वास जागता है कि वह अब एक जिम्मेदार, विद्यार्थी जीवन जीने के योग्य है।

    यज्ञोपवीत के तीन धागों का प्रतीकात्मक अर्थ

    Yagyopavit में तीन धागे होते हैं, जिनके अनेक प्रतीकात्मक अर्थ हैं:

    धागा प्रतीक
    पहला धागा माता, पिता और गुरु के प्रति ऋण
    दूसरा धागा ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिशक्ति
    तीसरा धागा सत्व, रज और तम — तीन गुण

    इसके अतिरिक्त यह तीन लोकों स्वर्ग, मृत्यु और पाताल का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।

    निष्कर्ष (Conclusion)

    Yagyopavit Mantra केवल शब्दों का समूह नहीं है यह एक जीवन-परिवर्तनकारी संकल्प है। Yagyopavit Sanskar के माध्यम से एक बालक जब पहली बार जनेऊ धारण करता है, तो वह जीवन के एक नए अध्याय में प्रवेश करता है ज्ञान, अनुशासन, पवित्रता और आध्यात्मिकता के अध्याय में।

    Janeu Mantra in Hindi के इस पवित्र स्मरण से हम समझते हैं कि हमारी सनातन परम्परा कितनी गहरी और सार्थक है। यह परम्परा हमें न केवल ईश्वर से जोड़ती है, बल्कि अपने कर्तव्यों, अपने गुरु, अपने माता-पिता और अपनी संस्कृति से भी जोड़ती है।

    जब भी आप Yagyopavit Dharan Mantra का पाठ करें या सुनें, उस क्षण में पूर्ण श्रद्धा और भाव के साथ उपस्थित रहें। यही मंत्र की सच्ची शक्ति है।

    🙏 यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं — ॐ शांति, शांति, शांति।

    FAQs — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    प्रश्न 1: Yagyopavit Mantra का क्या अर्थ है?

    उत्तर: Yagyopavit Mantra का अर्थ है “यह पवित्र जनेऊ परम पवित्र है, यह प्रजापति ब्रह्मा जी के साथ सृष्टि के आरम्भ में प्रकट हुआ। इसे धारण करो यह तुम्हें दीर्घायु, बल और तेज प्रदान करे।”

    प्रश्न 2: Yagyopavit Sanskar किस आयु में होना चाहिए?

    उत्तर: शास्त्रों के अनुसार Yagyopavit Sanskar ब्राह्मण बालक के लिए 8 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 11 वर्ष और वैश्य के लिए 12 वर्ष की आयु में होना उचित माना गया है। आधुनिक काल में यह प्रायः 7 से 14 वर्ष की आयु के बीच किया जाता है।

    प्रश्न 3: Janeu Mantra कितनी बार पढ़ना चाहिए?

    उत्तर: Janeu Mantra जनेऊ धारण करते समय एक बार पूर्ण श्रद्धा से पढ़ना पर्याप्त है। प्रतिदिन की संध्योपासना और गायत्री जप के समय इसका स्मरण करना लाभकारी है।

    प्रश्न 4: क्या Yagyopavit Dharan Mantra केवल पुरुषों के लिए है?

    उत्तर: परम्परागत रूप से Yagyopavit Sanskar पुरुषों के लिए विहित है। हालाँकि वैदिक परम्परा में महिलाओं के लिए भी इस संस्कार के उल्लेख मिलते हैं। आज के काल में अनेक आध्यात्मिक संस्थाएँ महिलाओं को भी यज्ञोपवीत धारण करने की अनुमति देती हैं।

    प्रश्न 5: Yagyopavit को कब बदलना चाहिए?

    उत्तर: Yagyopavit को प्रतिवर्ष श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के दिन अवश्य बदलना चाहिए। इसके अतिरिक्त जनेऊ टूट जाए, अपवित्र हो जाए, या किसी सूतक-पातक में अपवित्र हो तो भी बदलना चाहिए।

    प्रश्न 5: Yagyopavit को कब बदलना चाहिए और जीर्ण त्याग मंत्र कब पढ़ें?

    उत्तर: Yagyopavit को प्रतिवर्ष श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के दिन अवश्य बदलना चाहिए। इसके अतिरिक्त जनेऊ टूट जाए, अपवित्र हो जाए, या किसी सूतक-पातक में अपवित्र हो तो भी बदलना चाहिए। पुराना जनेऊ उतारते समय जीर्ण यज्ञोपवीत त्याग मंत्र “ॐ एतावद्दिनपर्यन्तं…” श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है। इस मंत्र द्वारा जनेऊ के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है और उसे आदरपूर्वक विसर्जित किया जाता है।

    प्रश्न 6: वाजसनेयी और छन्दोग Yagyopavit Mantra में क्या अंतर है?

    उत्तर: वाजसनेयी Yagyopavit Mantra शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा से है और नया जनेऊ धारण करते समय पढ़ा जाता है इसमें बल, तेज और दीर्घायु की प्रार्थना है। छन्दोग Yagyopavit Mantra सामवेद की परम्परा से है और इसमें जनेऊ को सीधे सम्बोधित कर उसे यज्ञ-सूत्र से बाँधने का संकल्प लिया जाता है। दोनों मंत्र अपनी-अपनी वैदिक शाखाओं में प्रयुक्त होते हैं।

    प्रश्न 7: क्या Yagyopavit Mantra गायत्री मंत्र से जुड़ा है?

    उत्तर: हाँ। Yagyopavit Sanskar के बाद बालक को गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है। Janeu Mantra और गायत्री मंत्र दोनों मिलकर इस संस्कार को पूर्ण बनाते हैं। जनेऊ धारण करने के बाद ही गायत्री का विधिवत् अधिकार प्राप्त होता है।

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