भगवान विष्णु की भक्ति में जो स्तोत्र सबसे अधिक कर्णप्रिय और हृदयस्पर्शी माने जाते हैं, उनमें Shree Hari Stotram का स्थान अत्यंत विशेष है। यह स्तोत्र भगवान हरि – अर्थात श्री विष्णु – के दिव्य स्वरूप, उनके गुणों और उनकी महिमा का गुणगान करता है। जो भक्त प्रतिदिन Shri Hari Stotram का पाठ करते हैं, उन्हें मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
यह स्तोत्र संस्कृत की मधुर लय में रचित है और इसकी प्रत्येक पंक्ति भगवान विष्णु के सौंदर्य, शक्ति और करुणा का वर्णन करती है। Hari Stotram को पढ़ने और सुनने मात्र से मन में एक अलग ही भक्तिमय वातावरण का अनुभव होता है।
Shree Hari Stotram क्या है?
Shree Hari Stotram भगवान विष्णु को समर्पित एक प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है जिसे “जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं स्तोत्रम्” के नाम से भी जाना जाता है। इसमें कुल आठ श्लोक हैं और अंत में एक फलश्रुति श्लोक दिया गया है जो इस स्तोत्र के पाठ से मिलने वाले फलों का वर्णन करता है।
यह स्तोत्र भगवान विष्णु के उन दिव्य रूपों और गुणों का चित्रण करता है जो भक्तों के हृदय में श्रद्धा और प्रेम जगाते हैं। Shree Hari Stotram Lyrics का प्रत्येक पद इतनी सुंदर भाषा में रचित है कि पाठ करने वाले को अपने आप भक्ति भावना में डूब जाने का अनुभव होता है।
Shree Hari Stotram Lyrics – सम्पूर्ण संस्कृत पाठ
नीचे Shree Hari Stotram का सम्पूर्ण पाठ दिया जा रहा है। किसी भी श्लोक को न छोडते हुए सभी पद यहाँ प्रस्तुत हैं:
॥ श्री हरि स्तोत्रम् ॥
जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं
शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालं
नभोनीलकायं दुरावारमायां
सुपद्मासहायम् भजेऽहं भजेऽहं ॥1॥
सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं
जगत्सन्निवासं शतादित्यभासं
गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं
हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं ॥2॥
रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं
जलान्तर्विहारं धराभारहारं
चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं
ध्रुतानेकरूपं भजेऽहं भजेऽहं ॥3॥
जराजन्महीनं परानन्दपीनं
समाधानलीनं सदैवानवीनं
जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं
त्रिलोकैकसेतुं भजेऽहं भजेऽहं ॥4॥
कृताम्नायगानं खगाधीशयानं
विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानं
स्वभक्तानुकूलं जगद्वृक्षमूलं
निरस्तार्तशूलं भजेऽहं भजेऽहं ॥5॥
समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं
जगद्विम्बलेशं हृदाकाशदेशं
सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं
सुवैकुण्ठगेहं भजेऽहं भजेऽहं ॥6॥
सुरालिबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं
गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपैकनिष्ठं
सदा युद्धधीरं महावीरवीरं
महाम्भोधितीरं भजेऽहं भजेऽहं ॥7॥
रमावामभागं तलानग्रनागं
कृताधीनयागं गतारागरागं
मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतं
गुणौधैरतीतं भजेऽहं भजेऽहं ॥8॥
॥ फलश्रुति ॥
इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं
पठेदष्टकं कण्ठहारम् मुरारेः
स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं
जराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो ॥9॥
Shree Hari Stotram Transliteration (Roman Lipi)
|| Shri Hari Stotram ||
Jagajjalapalam chalatkanthamalam
Sharacchandrabalam mahadaityakalam
Nabhonilakaayam duraavaramaayam
Supadmaasahaayam bhaje’ham bhaje’ham ||1||
Sadaambhodhivaasam galatpushpahaasam
Jagatsannivaasam shataadityabhaasam
Gadaachakrashaastram lasatpeetavastram
Hasacchaaru vaktram bhaje’ham bhaje’ham ||2||
Ramaakanthahaaram shrutivratasaaram
Jalaantarvihaaram dharaabhaarahaaram
Chidaaanandaaroopam manojnyasvaroopam
Dhrutaanekaroopam bhaje’ham bhaje’ham ||3||
Jarajanmaheenam paraanandapeenam
Samaadhanaqleenam sadaivaanaveenanam
Jagajjanmahhetum suraaneekakeetum
Trilokaikassetum bhaje’ham bhaje’ham ||4||
Krtaamnayagaanam khagaadhishayaanam
Vimuktternidaanam haraaratimaanam
Svabhaktaanukulam jagadvriksamuulam
Nirastaartas shuulam bhaje’ham bhaje’ham ||5||
Samastaamaresham dvireephaabhakesham
Jagadviambaalesham hridaakaashadesham
Sadaa divyadheham vimuktaakhileeham
Suvaaikuntageham bhaje’ham bhaje’ham ||6||
Suraalibalistham trilokiivarishtham
Guroonam garishtham svaruupaikanishttham
Sadaa yuddhadhiiram mahaaviiraviiram
Mahaambhoodhitiiram bhaje’ham bhaje’ham ||7||
Ramaavaamabhaagam talaanagranaaagam
Krtaadhiinayaagam gataaraagaaragam
Muniindraih sugiitam suraiah sampareetam
Gunaaughairiitam bhaje’ham bhaje’ham ||8||
|| Phalaashruti ||
Idam yastu nityam samaadhaaaya chittam
Patheddashtakam kanthahaaram muraare
Sa vishnorvishokam dhruvam yaati lokam
Jarajjanmashhokam punarvindatee no ||9||
Shree Hari Stotram Lyrics With Meaning – श्लोकवार हिंदी अर्थ
श्लोक 1
मूल पाठ: जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालं नभोनीलकायं दुरावारमायां सुपद्मासहायम् भजेऽहं भजेऽहं ॥
Shree Hari Stotram Meaning: मैं उन भगवान हरि की भक्ति करता हूँ – जो इस सम्पूर्ण जगत की जाल की भाँति रक्षा करने वाले हैं, जिनके कण्ठ में वनमाला सुशोभित होती है, जिनका मुखमण्डल शरद-पूर्णिमा के चंद्रमा के समान है, जो महान दैत्यों के काल हैं, जिनका शरीर आकाश के समान नील वर्ण का है, जिनकी माया को पार करना अत्यंत कठिन है और जो देवी लक्ष्मी (सुपद्मा) के साथ विराजमान हैं।
श्लोक 2
मूल पाठ: सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं जगत्सन्निवासं शतादित्यभासं गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं ॥
हिंदी अर्थ: मैं उन भगवान हरि का भजन करता हूँ – जो सदा क्षीरसागर में निवास करते हैं, जिनका हास-विलास प्रफुल्लित पुष्पों के समान है, जो सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं, जिनकी प्रभा सैकड़ों सूर्यों के समान है, जो गदा और सुदर्शन चक्र धारण करते हैं, जो पीताम्बर वस्त्र पहनते हैं और जिनका मुखमण्डल मुस्कुराते हुए अत्यंत सुंदर लगता है।
श्लोक 3
मूल पाठ: रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं जलान्तर्विहारं धराभारहारं चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं ध्रुतानेकरूपं भजेऽहं भजेऽहं ॥
हिंदी अर्थ: मैं उन भगवान हरि का भजन करता हूँ – जो देवी रमा (लक्ष्मी) के कण्ठ के हार के समान प्रिय हैं, जो समस्त वेदों और श्रुतियों के सार हैं, जो जल के भीतर विहार करते हैं (शेषनाग पर), जो पृथ्वी के भार को हरण करते हैं, जो चिदानंद रूप हैं – अर्थात चेतना और आनंद के स्वरूप हैं, जिनका स्वरूप मन को आकर्षित करने वाला है और जो अनेक रूपों को धारण करते हैं।
श्लोक 4
मूल पाठ: जराजन्महीनं परानन्दपीनं समाधानलीनं सदैवानवीनं जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं त्रिलोकैकसेतुं भजेऽहं भजेऽहं ॥
हिंदी अर्थ: मैं उन भगवान हरि का भजन करता हूँ – जो जरा (वृद्धावस्था) और जन्म-मृत्यु से मुक्त हैं, जो परम आनंद से परिपूर्ण हैं, जो समाधि में लीन रहते हैं, जो सदा नए और अपरिवर्तनीय हैं, जो इस जगत के उत्पत्ति के कारण हैं, जो देवताओं की सेना के ध्वज हैं और जो तीनों लोकों के एकमात्र सेतु हैं।
श्लोक 5
मूल पाठ: कृताम्नायगानं खगाधीशयानं विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानं स्वभक्तानुकूलं जगद्वृक्षमूलं निरस्तार्तशूलं भजेऽहं भजेऽहं ॥
हिंदी अर्थ: मैं उन भगवान हरि का भजन करता हूँ – जिनकी वेदों द्वारा स्तुति की जाती है, जो गरुड़ (पक्षियों के राजा) पर आरूढ़ होते हैं, जो मोक्ष के कारण हैं, जो भगवान शिव के शत्रुओं (असुरों) का मान-मर्दन करने वाले हैं, जो अपने भक्तों पर सदा अनुकूल रहते हैं, जो इस जगत रूपी वृक्ष की जड़ हैं और जो पीड़ितों के कष्टों को दूर करते हैं।
श्लोक 6
मूल पाठ: समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं जगद्विम्बलेशं हृदाकाशदेशं सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं सुवैकुण्ठगेहं भजेऽहं भजेऽहं ॥
हिंदी अर्थ: मैं उन भगवान हरि का भजन करता हूँ – जो समस्त देवताओं के स्वामी हैं, जिनके केश भौंरे के समान काले और सुंदर हैं, जो इस जगत में प्रतिबिंब रूप में विद्यमान हैं, जो हृदय रूपी आकाश में विराजते हैं, जिनका शरीर सदा दिव्य है, जो समस्त इच्छाओं से मुक्त हैं और जो वैकुण्ठ धाम में निवास करते हैं।
श्लोक 7
मूल पाठ: सुरालिबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपैकनिष्ठं सदा युद्धधीरं महावीरवीरं महाम्भोधितीरं भजेऽहं भजेऽहं ॥
हिंदी अर्थ: मैं उन भगवान हरि का भजन करता हूँ – जो देवताओं में सबसे बलशाली हैं, जो तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ हैं, जो समस्त गुरुओं में सबसे गुरु हैं, जो अपने स्वरूप में ही एकनिष्ठ रहते हैं, जो सदा युद्ध में धैर्यवान हैं, जो महावीरों में भी वीर हैं और जो महासागर के तट पर (क्षीरसागर में) विराजते हैं।
श्लोक 8
मूल पाठ: रमावामभागं तलानग्रनागं कृताधीनयागं गतारागरागं मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतं गुणौधैरतीतं भजेऽहं भजेऽहं ॥
हिंदी अर्थ: मैं उन भगवान हरि का भजन करता हूँ – जिनके वाम भाग में देवी रमा (लक्ष्मी) विराजती हैं, जिनके चरणतल में शेषनाग है, जिनके अधीन यज्ञ किए जाते हैं, जो राग-रंग (आसक्ति) से सर्वथा मुक्त हैं, जिनकी स्तुति मुनिश्रेष्ठों द्वारा की जाती है, जो देवताओं द्वारा घिरे रहते हैं और जो समस्त गुणों से परे हैं।
फलश्रुति (श्लोक 9)
मूल पाठ: इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं पठेदष्टकं कण्ठहारम् मुरारेः स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं जराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो ॥
हिंदी अर्थ: जो व्यक्ति प्रतिदिन अपने चित्त को स्थिर करके श्री मुरारि (विष्णु) के इस अष्टक स्तोत्र का पाठ करता है, वह निश्चित रूप से भगवान विष्णु के दुःखरहित लोक (वैकुण्ठ) को प्राप्त करता है और उसे जन्म-मृत्यु तथा जरा (वृद्धावस्था) के दुःखों का सामना नहीं करना पड़ता।
Shree Hari Stotram का आध्यात्मिक महत्व
Shree Hari Stotram केवल एक प्रार्थना नहीं है – यह भगवान विष्णु के स्वरूप का एक जीवंत ध्यान है। इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें भगवान के सौंदर्य, शक्ति, करुणा और उनकी दिव्यता को एक साथ प्रस्तुत किया गया है।
“भजेऽहं भजेऽहं” – अर्थात “मैं भजन करता हूँ, मैं भजन करता हूँ” – प्रत्येक श्लोक के अंत में यह पुनरावृत्ति इस बात का प्रतीक है कि भक्त अपने हृदय में भगवान की उपस्थिति को बार-बार अनुभव कर रहा है।
इस स्तोत्र में भगवान के नीलवर्ण शरीर, पीतांबर, गदा-चक्र, वैजयंती माला और लक्ष्मी के साथ उनके स्वरूप का जो वर्णन है, वह भक्त के मन में भगवान की एक स्पष्ट और जीवंत छवि बनाता है। इससे भक्ति की गहराई और बढ़ जाती है।
Shree Hari Stotram यह भी सिखाता है कि भगवान हरि ही इस सम्पूर्ण जगत के पालनकर्ता हैं, वे ही वेदों के सार हैं, वे ही मोक्ष के दाता हैं और वे ही तीनों लोकों के एकमात्र आधार हैं।
Shree Hari Stotram का पाठ कब करें?
Shri Hari Stotram का पाठ निम्नलिखित अवसरों पर विशेष रूप से करना शुभफलदायी माना जाता है:
प्रातःकाल: सूर्योदय के समय स्नानोपरांत भगवान विष्णु की पूजा करते हुए Hari Stotram का पाठ करना अत्यंत शुभ होता है।
एकादशी: भगवान विष्णु को एकादशी तिथि अत्यंत प्रिय है। इस दिन व्रत रखकर Shree Hari Stotram का पाठ करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
द्वादशी: एकादशी के पश्चात द्वादशी तिथि पर भी इस स्तोत्र का पाठ करने की परंपरा है।
विष्णु जयंती और अन्य उत्सव: जन्माष्टमी, वैकुण्ठ एकादशी, सत्यनारायण पूजा आदि अवसरों पर Shree Hari Stotram का पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
दैनिक पूजा: अनेक भक्त प्रतिदिन अपनी संध्याकालीन या प्रातःकालीन पूजा में भी Shri Hari Stotram का पाठ करते हैं।
Shree Hari Stotram Benefits – आध्यात्मिक लाभ
Shree Hari Stotram का नियमित पाठ करने से भक्तों को निम्नलिखित आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
मानसिक शांति: इस स्तोत्र की मधुर ध्वनि और भावपूर्ण शब्द मन की अशांति को दूर करते हैं और एक गहरी शांति का अनुभव कराते हैं।
भक्ति में वृद्धि: Hari Stotram का नियमित पाठ भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और प्रेम को गहरा करता है।
पाप-नाश: शास्त्रों के अनुसार भगवान हरि का स्मरण और स्तुति पूर्व जन्मों के पापों को नष्ट करती है।
वैकुण्ठ की प्राप्ति: फलश्रुति श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि Shree Hari Stotram का नित्य पाठ करने वाले को विष्णुलोक (वैकुण्ठ) की प्राप्ति होती है।
जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से जीव जन्म-जरा-मृत्यु के दुःखों से मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।
सकारात्मकता: Shree Hari Stotram का पाठ जीवन में सकारात्मकता लाता है और नकारात्मक विचारों को दूर करता है।
ईश्वरीय कृपा: भगवान विष्णु की कृपा से भक्त के जीवन में सुख-समृद्धि और कल्याण की वृद्धि होती है।
निष्कर्ष
Shree Hari Stotram भगवान विष्णु की महिमा का एक अद्भुत गुणगान है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में भगवान हरि की दिव्यता, सौंदर्य और करुणा की अनुभूति होती है। जो भक्त नित्य श्रद्धा और एकाग्रता के साथ Shri Hari Stotram का पाठ करते हैं, उन्हें इस जीवन में मानसिक शांति, आत्मिक बल और ईश्वरीय कृपा तो प्राप्त होती ही है – साथ ही फलश्रुति के वचनानुसार वे भगवान के परम धाम वैकुण्ठ को प्राप्त करते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होते हैं।
“भजेऽहं भजेऽहं” – इस पावन उद्घोष के साथ हम भी भगवान हरि के श्रीचरणों में प्रणाम करते हैं और उनकी कृपा की कामना करते हैं।
हरि ॐ तत्सत्।
? FAQs – Shree Hari Stotram से जुड़े सामान्य प्रश्न
प्रश्न 1: Shree Hari Stotram किसने रचा?
Shree Hari Stotram के रचयिता के बारे में विभिन्न मत हैं, परंतु यह स्तोत्र वैष्णव परंपरा में प्राचीन काल से प्रचलित है और भगवान विष्णु की भक्ति में सर्वाधिक गाए जाने वाले स्तोत्रों में से एक है।
प्रश्न 2: Shree Hari Stotram का पाठ दिन में कितनी बार करना चाहिए?
फलश्रुति के अनुसार इसका नित्य (प्रतिदिन) पाठ करना उत्तम है। प्रातःकाल एकबार पाठ करना पर्याप्त है, परंतु श्रद्धा के अनुसार अधिक बार भी पाठ किया जा सकता है।
प्रश्न 3: Shree Hari Stotram Lyrics In Hindi में पाठ करना शुभ है?
हाँ, Shree Hari Stotram Lyrics In Hindi या संस्कृत – दोनों में पाठ करना शुभ है। महत्वपूर्ण यह है कि पाठ भक्ति और श्रद्धा से किया जाए।
प्रश्न 4: Shree Hari Stotram Meaning समझकर पाठ करना आवश्यक है?
अर्थ समझकर पाठ करने से भक्ति और गहरी होती है, परंतु केवल श्रद्धा से पाठ करने पर भी भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
प्रश्न 5: Hari Stotram का पाठ करते समय किन बातों का ध्यान रखें?
स्वच्छता, पवित्रता और एकाग्र मन से पाठ करना चाहिए। संभव हो तो भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर पाठ करें।
प्रश्न 6: क्या महिलाएं भी Shree Hari Stotram का पाठ कर सकती हैं?
हाँ, Shree Hari Stotram का पाठ स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं। इस स्तोत्र पर किसी प्रकार का लिंग-भेद नहीं है।
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