जय जगन्नाथ! — यह उद्घोष केवल एक अभिवादन नहीं है, यह करोड़ों भक्तों की आस्था और समर्पण का प्रतीक है। भगवान जगन्नाथ — जिनका अर्थ है “जगत के स्वामी” — भगवान विष्णु अथवा श्रीकृष्ण के उस दिव्य स्वरूप का नाम है, जो ओडिशा के पुरी धाम में महासागर के तट पर नीलाचल पर्वत पर विराजमान हैं। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा — ये तीनों दिव्य भाई-बहन एक साथ पूजे जाते हैं और इनकी उपस्थिति मात्र से मन को परम शांति मिलती है।
Jagannath Ashtakam — जिसे Sri Jagannath Ashtakam अथवा Jagannath Stotram भी कहा जाता है — की रचना जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने की थी, जब वे पुरी की यात्रा पर गए थे। “अष्टकम्” का अर्थ होता है आठ श्लोकों का समूह। इन आठ श्लोकों में शंकराचार्य ने भगवान जगन्नाथ के दिव्य स्वरूप, उनकी लीलाओं, और उनकी करुणा का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है।
यह Jagannath Ashtakam in Hindi के माध्यम से पढ़ने पर भक्त को अनुभव होता है जैसे वे साक्षात् प्रभु के दर्शन कर रहे हों। प्रत्येक श्लोक की समाप्ति “जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे” — अर्थात “वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में आएं” — इस प्रार्थना से होती है। यही इस स्तोत्र की आत्मा है।
भगवान जगन्नाथ की उत्पत्ति कैसे हुई
भगवान जगन्नाथ की उत्पत्ति की कथा अत्यंत रोचक और आध्यात्मिक दृष्टि से गहन है। पुराणों के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान की आज्ञा मिली कि वे नीलाचल पर्वत पर एक दिव्य मूर्ति बनाएं। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने वृद्ध बढ़ई के रूप में प्रकट होकर एक शर्त रखी — 21 दिनों तक उन्हें बंद कमरे में एकांत में कार्य करने दिया जाए। रानी के व्याकुल होकर द्वार खोल देने से कार्य अपूर्ण रह गया, और इसीलिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ आज भी अधूरे हाथों वाली हैं।
यह भी माना जाता है कि जगन्नाथ साक्षात् ब्रह्म हैं जो सभी रूपों में विद्यमान हैं। इसीलिए संत कबीर, गुरुनानक देव, शंकर देव जैसे निर्गुण पंथी संत भी पुरी आकर उनके चरणों में नत हो गए।
Jagannath Ashtakam – संपूर्ण संस्कृत पाठ, अनुवाद एवं अर्थ
Jagannath Sloka In Sanskrit — आदि शंकराचार्य विरचित संपूर्ण Sri Jagannath Ashtakam
श्लोक १ (Shloka 1)
Jagannath Sloka In Sanskrit:
कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीत तरलो
मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः ।
रमा शम्भु ब्रह्मामरपति गणेशार्चित पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥१॥
Transliteration:
kadachit kalindi tata vipina sangita taralo
mudabhiri nari vadana kamala svada madhupah |
rama shambhu brahmamarapati ganesharchita pado
jagannathah svami nayana patha gami bhavatu me ||1||
हिंदी अर्थ: जो कभी-कभी यमुना के तट पर स्थित वनों में अपनी मधुर बाँसुरी की तान से सबको आनंदमग्न करते हैं, जो गोपियों के कमल-मुख का रस लेने वाले भ्रमर के समान हैं, और जिनके चरण-कमलों की पूजा लक्ष्मी, शिव, ब्रह्मा, इंद्र और गणेश करते हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में आएं।
श्लोक २ (Shloka 2)
Jagannath Sloka In Sanskrit:
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥२॥
Transliteration:
bhuje savye venum shirasi shikhipicchham katitate
dukulam netrante sahachara-kataksham vidadhate |
sada shrimad-vrindavana-vasati-lila-parichayo
jagannathah svami nayana-patha-gami bhavatu me ||2||
हिंदी अर्थ: जो अपने बाएँ हाथ में वेणु (बाँसुरी) धारण करते हैं, शिर पर मोर-पंख सजाते हैं, कमर पर पीत रेशमी वस्त्र पहनते हैं, और नेत्रों के कोने से अपने प्रिय भक्तों पर कृपा-कटाक्ष करते हैं — जो सदा वृंदावन की दिव्य लीलाओं से परिचित हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में आएं।
श्लोक ३ (Shloka 3)
Jagannath Sloka In Sanskrit:
महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुर सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥
Transliteration:
mahaambhodhes tire kanaka ruchire nila shikhare
vasan prasadantah sahaja balabhadrena balina |
subhadra madhyasthah sakalasura sevavasarado
jagannathah svami nayana-patha-gami bhavatu me ||3||
हिंदी अर्थ: जो महासमुद्र के तट पर, स्वर्ण-समान तेजस्वी नीलाचल पर्वत के शिखर पर, अपने शक्तिशाली भाई बलभद्र के साथ और बीच में सुभद्रा के साथ विराजमान हैं, और जो सभी देवताओं को भी सेवा का अवसर प्रदान करते हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में आएं।
श्लोक ४ (Shloka 4)
Jagannath Sloka In Sanskrit:
कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरो
रमा वाणी रामः स्फुरद् अमल पङ्केरुहमुखः ।
सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥४॥
Transliteration:
kripa paravaarah sajala jalada shreniruchiro
rama vani ramah sphurad amala pankeruhammukhah |
surendrair aradhyah shrutigana shikha gita charito
jagannathah svami nayana patha gami bhavatu me ||4||
हिंदी अर्थ: जो करुणा के अथाह सागर हैं, जल से भरे श्याम मेघों की पंक्ति के समान सुंदर हैं, जो लक्ष्मी और सरस्वती के आनंद के स्रोत हैं, जिनका मुख निर्मल कमल की भाँति दीप्त है, देवेंद्र जिनकी आराधना करते हैं, और जिनका यश उपनिषदों द्वारा गाया जाता है — वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में आएं।
श्लोक ५ (Shloka 5) – रथ यात्रा का वर्णन
Jagannath Sloka In Sanskrit:
रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥५॥
Transliteration:
ratharudho gacchan pathi milita bhudeva patalaim
stuti pradurbhavam pratipadamupakarnaya sadayah |
daya sindhurbandhuh sakala jagatam sindhu sutaya
jagannathah svami nayana patha gami bhavatu me ||5||
हिंदी अर्थ: जो रथ पर सवार होकर मार्ग में चलते हुए, ब्राह्मणों के समूहों द्वारा प्रत्येक चरण पर की जाने वाली स्तुति को करुणाभाव से सुनते हैं, जो करुणा के सागर और समस्त संसार के सखा हैं, और जो सागर की पुत्री लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में आएं।
यह श्लोक जगन्नाथ रथ यात्रा का काव्यात्मक वर्णन करता है।
श्लोक ६ (Shloka 6)
Jagannath Sloka In Sanskrit:
परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥
Transliteration:
parama-brahmaapidah kuvalaya-dalotphulla-nayano
nivasi niladrau nihita-charano ananta-shirasi |
rasanandi radha-sarasa-vapuralinga-sukho
jagannathah svami nayana-pathagami bhavatu me ||6||
हिंदी अर्थ: जो परब्रह्म के मस्तक के आभूषण हैं, जिनके नेत्र कमल-दल के समान पूर्ण विकसित हैं, जो नीलाचल पर्वत पर निवास करते हैं और जिनके चरण अनंतदेव के शिर पर स्थापित हैं, जो प्रेम-रस में आनंदमग्न रहते हैं और श्री राधा के आलिंगन से परम सुख प्राप्त करते हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में आएं।
श्लोक ७ (Shloka 7) – निष्काम भक्ति का श्लोक
Jagannath Sloka In Sanskrit:
न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥
Transliteration:
na vai yache rajyam na cha kanaka manikya vibhavam
na yache’ham ramyam sakala jana kamyam varavadhum |
sada kale kale pramatha patina gitacharito
jagannathah svami nayana patha gami bhavatu me ||7||
हिंदी अर्थ: मैं न राज्य माँगता हूँ, न स्वर्ण, न माणिक्य, न संपत्ति — और न ही किसी सुंदरी वधू की कामना करता हूँ जिसे सभी लोग चाहते हैं। मेरी केवल एक प्रार्थना है — जिनके गुण सदा-सर्वदा स्वयं भगवान शिव गाते हैं — वे जगन्नाथ स्वामी सदा मेरे नेत्रों के मार्ग में बने रहें।
यह Jagannath Ashtakam का सर्वाधिक मार्मिक श्लोक है — निष्काम भक्ति का अनुपम उदाहरण।
श्लोक ८ (Shloka 8) – शरणागति का श्लोक
Jagannath Sloka In Sanskrit:
हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥
Transliteration:
hara tvam samsaram drutataram asaram surapate
hara tvam papanam vitatim aparam yadavapate |
aho dine’nathe nihita charano nishchitamidam
jagannathah svami nayana patha gami bhavatu me ||8||
हिंदी अर्थ: हे देवताओं के स्वामी! इस असार संसार से मुझे शीघ्र मुक्त करो। हे यदुपति! मेरे अपार पाप-समूह को नष्ट करो। यह निश्चित है कि भगवान जगन्नाथ के चरण-कमल उन्हीं पर अवतरित होते हैं जो दीन, असहाय और अनाथ हैं — वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में आएं।
फलश्रुति (Phalashruti) – श्लोक ९
इति श्रीमद् शङ्कराचार्यप्रणीतं जगन्नाथाष्टकं सम्पूर्णम् ।
जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ।
सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥९॥
हिंदी अर्थ: यह श्रीमद् शंकराचार्य द्वारा रचित जगन्नाथाष्टक सम्पूर्ण हुआ। जो मनुष्य संयमी और पवित्र होकर इस पुण्यदायक जगन्नाथाष्टक का पाठ करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
Jagannath Ashtakam का आध्यात्मिक महत्व
Sri Jagannath Ashtakam एक ऐसी रचना है जिसमें अद्वैत वेदांत के प्रतिष्ठाता आदि शंकराचार्य ने जगन्नाथ को श्रीकृष्ण और विष्णु के एकीकृत रूप के रूप में देखा है। उन्होंने एक ओर वृंदावन की कृष्ण-लीला का वर्णन किया, तो दूसरी ओर पुरी धाम में विराजित भगवान के महासागरीय विराट स्वरूप का। यह स्तोत्र यह संदेश देता है कि जगन्नाथ केवल एक पंथ या संप्रदाय के नहीं, अपितु समस्त सृष्टि के स्वामी हैं।
Chaturbhuja Jagannath Sloka की परंपरा में यह अष्टकम् इसलिए विशिष्ट है क्योंकि इसमें भगवान के चतुर्भुज विष्णु स्वरूप की झलक के साथ-साथ उनके सगुण-साकार कृष्ण स्वरूप का भी दर्शन होता है।
तीन प्रमुख आध्यात्मिक संदेश:
१. सर्व-समावेशी देवता: जगन्नाथ ऐसे देव हैं जिनके दर्शन को शंकर, कबीर, नानक, तुलसीदास सभी ने अपने-अपने भाव से किया।
२. निष्काम भक्ति की सर्वोच्चता: सातवाँ श्लोक बताता है कि सच्चा भक्त राज्य, धन या सांसारिक सुख नहीं माँगता — केवल प्रभु के दर्शन की कामना करता है।
३. शरणागति: आठवाँ श्लोक उन भक्तों के लिए है जो टूटे हुए, दीन और अनाथ हैं — प्रभु का वरद हस्त उन्हीं पर सबसे पहले पड़ता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास
जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। पुरी में प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीन विशाल रथों पर मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा करते हैं। यह रथ यात्रा जगत की सबसे बड़ी धार्मिक शोभायात्राओं में से एक मानी जाती है।
Jagannath Ashtakam का पाँचवाँ श्लोक इसी रथ यात्रा का काव्यमय वर्णन करता है — जहाँ ब्राह्मण प्रत्येक चरण पर स्तुति करते हैं और करुणासागर प्रभु उन्हें आशीर्वाद देते हैं।
Jagannath Ashtakam का पाठ कब और कैसे करें
Jagannath Stotram का पाठ निम्नलिखित समय और अवसरों पर विशेष रूप से फलदायी माना जाता है:
- प्रातःकाल स्नान के बाद — प्रतिदिन पूजा-पाठ के समय इसका पाठ शुभ होता है।
- आषाढ़ शुक्ल द्वितीया — रथ यात्रा के दिन इसका पाठ अत्यंत पुण्यदायक है।
- एकादशी के दिन — भगवान विष्णु के भक्तों के लिए यह दिन विशेष होता है।
- जगन्नाथ मंदिर के दर्शन के समय — पुरी यात्रा में इस स्तोत्र का पाठ दर्शन को और अधिक पावन बनाता है।
- संकट के समय — आठवें श्लोक का विशेष पाठ मन को ढाढस देता है और संसार के भार को हल्का करता है।
पाठ से पूर्व शुद्ध मन से “जय जगन्नाथ” का उच्चारण करें और प्रत्येक श्लोक धीरे-धीरे भावपूर्ण ढंग से पढ़ें।
Jagannath Ashtakam के आध्यात्मिक लाभ (Benefits)
Jagannath Ashtakam Meaning को समझकर और श्रद्धा से इसका पाठ करने से निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
१. पाप-विमोचन: फलश्रुति के अनुसार, जो व्यक्ति संयम और पवित्रता से इस अष्टकम् का पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
२. विष्णुलोक की प्राप्ति: शास्त्र कहते हैं कि इसका नियमित पाठ मोक्ष का द्वार खोलता है।
३. मन की शांति: भगवान की लीलाओं का स्मरण मन में अद्भुत शांति और स्थिरता उत्पन्न करता है।
४. संसार के दुखों से मुक्ति: आठवाँ श्लोक सांसारिक कष्टों से त्राण दिलाने की प्रार्थना है — इसके पाठ से कठिन परिस्थितियों में धैर्य मिलता है।
५. भक्ति की जागृति: सातवाँ श्लोक भौतिक इच्छाओं से परे जाकर केवल प्रभु-दर्शन की कामना करना सिखाता है।
६. सुरक्षा और कृपा: यह स्तोत्र भगवान जगन्नाथ की करुणा और उनके आशीर्वाद को आमंत्रित करता है।
निष्कर्ष – जय जगन्नाथ
Jagannath Ashtakam केवल एक स्तोत्र नहीं है — यह आत्मा का प्रभु से संवाद है। आदि शंकराचार्य ने इन आठ श्लोकों में जगन्नाथ के उस विराट स्वरूप को शब्दों में बाँधने का अद्भुत प्रयास किया है जो वृंदावन के बाँसुरीधर कृष्ण भी हैं और नीलाचल के महाप्रभु भी।
Sri Jagannath Ashtakam के पाठ से भक्त को यह अनुभूति होती है कि प्रभु सदा उसके साथ हैं। जब सातवाँ श्लोक कहता है — “मुझे राज्य नहीं चाहिए, धन नहीं चाहिए, केवल तुम्हारे दर्शन चाहिए” — तो यह निष्काम भक्ति की चरमावस्था है।
और जब आठवाँ श्लोक पुकारता है — “हे प्रभु, इस असार संसार से मुझे शीघ्र उठाओ” — तो हर थका हुआ भक्त उसमें अपनी पीड़ा पहचानता है और उत्तर में उन्हें प्रभु के चरणों की शरण मिलती है।
जय जगन्नाथ। जय बलभद्र। जय सुभद्रा।
? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न १: Jagannath Ashtakam की रचना किसने की?
उत्तर: जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने इसकी रचना की थी, जब वे पुरी धाम की यात्रा पर गए और जगन्नाथ के दर्शन से अभिभूत हो गए।
प्रश्न २: Jagannath Ashtakam का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
उत्तर: प्रतिदिन एक बार पूर्ण भक्तिभाव से पाठ करना उत्तम है। विशेष अवसरों पर जैसे रथ यात्रा या एकादशी को तीन बार पाठ का विधान है।
प्रश्न ३: Jagannath Ashtakam in Hindi — क्या हिंदी में भी इसका उतना ही लाभ है?
उत्तर: संस्कृत में पाठ सर्वोत्तम है, किंतु यदि हिंदी अर्थ समझकर भाव-सहित पाठ किया जाए तो वह भी पूर्ण फलदायक है। भगवान भाव के भूखे हैं, भाषा के नहीं।
प्रश्न ४: क्या Jagannath Ashtakam भगवद्गीता से लिया गया है?
उत्तर: नहीं। यह स्तोत्र स्वतंत्र रचना है जिसे आदि शंकराचार्य ने पुरी यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ की स्तुति में रचा था।
प्रश्न ५: Jagannath Sloka in English — क्या इसका अंग्रेजी में पाठ किया जा सकता है?
उत्तर: मूल संस्कृत श्लोकों का Roman transliteration (जैसे kadachit kalindi tata vipina…) उच्चारण में पूर्णतः ग्राह्य है। इससे भी प्रभु की कृपा प्राप्त होती है।
प्रश्न ६: भगवान जगन्नाथ की उत्पत्ति कैसे हुई?
उत्तर: राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में दिव्य आदेश मिला। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने वृद्ध बढ़ई के रूप में मूर्ति निर्माण प्रारंभ किया। रानी ने 21 दिन से पहले ही द्वार खोल दिया, जिससे मूर्ति अपूर्ण रह गई। कहते हैं कि ब्रह्म (आत्मा) स्वयं उस काष्ठ में विराजे, इसलिए यह रूप ही जगन्नाथ का दिव्य स्वरूप है।
🙏 इन मंत्रों और श्लोकों को भी पढ़ना न भूलें:
- Tripura Sundari Mantra
- Vashikaran Mantra
- RAM Rameti Rameti Mantra
- Kalavati Aai Balopasana
- Swayamvara Parvathi Mantra
- Akhand Vishnu Karyam Characharam Mantra
- Varahi Moola Mantra
- Durant Dev Mantra
- Daridra Dahan Shiv Stotra
- Sanskrit Shlok On Karma
- Ucchista Ganapati Mantra
- Pitra Gayatri Mantra
- Shri Radha Kripa Kataksh Stotra
- Narsingh Kavach
- Damodar Ashtakam
- Ekatmata Stotra
- Nasadiya Sukta
- Bhog Lagane Ka Mantra
- Om Namo Hanumate Rudravataraya Mantra In Hindi
- Venkatesh Stotra Sanskrit
- Shree Hari Stotram
- Ashtalakshmi Stotram
- 22 Akshari Dakshina Kali Mantra
📖 अगर आपको मराठी *उखाणे* पसंद हैं, तो इनका पूरा संग्रह यहाँ देखें : Simple Marathi Ukhane
