हिंदू धर्म में देवी शक्ति की आराधना का एक विशेष स्थान है। देवी के अनेक स्वरूपों में अपराजिता देवी का नाम अत्यंत शक्तिशाली और पूजनीय है। “अपराजिता” का संस्कृत में अर्थ है — वह शक्ति जिसे कभी पराजित नहीं किया जा सकता।
Aparajita Stotram माँ दुर्गा के उस दिव्य स्वरूप की स्तुति है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं — चेतना, बुद्धि, शक्ति, करुणा और क्षमा के रूप में। यह स्तोत्र मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत दुर्गा सप्तशती (देवी महात्म्यम्) से लिया गया है, जो हिंदू धर्म के सर्वाधिक पवित्र ग्रंथों में से एक है।
Devi Aparajita Stotram विशेष रूप से विजयादशमी (दशहरा) के अवसर पर पाठ किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवासुर संग्राम में जब देवी ने असुरों का विनाश किया, तब सर्वप्रथम इस स्तोत्र के द्वारा उनकी स्तुति की गई थी। तभी से क्षत्रिय राजाओं ने इस दिन को विजय उत्सव के रूप में मनाना आरंभ किया।
जो भक्त नियमित रूप से अपराजिता स्तोत्र का पाठ करते हैं, वे जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी पराजित नहीं होते। Aparajita Stotram PDF के रूप में भी यह स्तोत्र व्यापक रूप से उपलब्ध है, जिससे भक्त इसे सहजता से पढ़ और संग्रहित कर सकते हैं।
Aparajita Stotram – सम्पूर्ण संस्कृत पाठ
नीचे Aparajita Stotram in English (IAST Transliteration) और देवनागरी में सम्पूर्ण पाठ दिया गया है।
Devi Aparajita Stotram (देवनागरी / Sanskrit Text)
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम् ॥ १ ॥
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥ २ ॥
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥ ३ ॥
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥ ४ ॥
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥ ५ ॥
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ६ ॥
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७ ॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ८ ॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ९ ॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १० ॥
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ११ ॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १२ ॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १३ ॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १४ ॥
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १५ ॥
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १६ ॥
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १७ ॥
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १८ ॥
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १९ ॥
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २० ॥
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २१ ॥
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २२ ॥
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २३ ॥
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २४ ॥
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २५ ॥
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २६ ॥
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमो नमः ॥ २७ ॥
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत्।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २८ ॥
Aparajita Stotram in English
namo devyai mahādevyai śivāyai satataṃ namaḥ |
namaḥ prakṛtyai bhadrāyai niyatāḥ praṇatāḥ smatām || 1 ||
raudrāyai namo nityāyai gauryai dhātryai namo namaḥ |
jyotsnāyai chendurūpiṇyai sukhāyai satataṃ namaḥ || 2 ||
kalyāṇyai praṇatā vṛddhyai siddhyai kurmo namo namaḥ |
nairṛtyai bhūbhṛtāṃ lakṣmyai śarvāṇyai te namo namaḥ || 3 ||
durgāyai durgapārāyai sārāyai sarvakāriṇyai |
khyātyai tathaiva kṛṣṇāyai dhūmrāyai satataṃ namaḥ || 4 ||
atisaumyātiraudrāyai natāstasyai namo namaḥ |
namo jagatpratiṣṭhāyai devyai kṛtyai namo namaḥ || 5 ||
yā devī sarvabhūteṣu viṣṇumāyeti śabitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 6 ||
yā devī sarvabhūteṣu cetaneti abhidhīyate |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 7 ||
yā devī sarvabhūteṣu buddhirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 8 ||
yā devī sarvabhūteṣu nidrārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 9 ||
yā devī sarvabhūteṣu kṣudhārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 10 ||
yā devī sarvabhūteṣu chāyārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 11 ||
yā devī sarvabhūteṣu śaktirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 12 ||
yā devī sarvabhūteṣu tṛṣṇārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 13 ||
yā devī sarvabhūteṣu kṣāntirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 14 ||
yā devī sarvabhūteṣu jātirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 15 ||
yā devī sarvabhūteṣu lajjārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 16 ||
yā devī sarvabhūteṣu śāntirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 17 ||
yā devī sarvabhūteṣu śraddhārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 18 ||
yā devī sarvabhūteṣu kāntirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 19 ||
yā devī sarvabhūteṣu lakṣmīrūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 20 ||
yā devī sarvabhūteṣu vṛttirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 21 ||
yā devī sarvabhūteṣu smṛtirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 22 ||
yā devī sarvabhūteṣu dayārūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 23 ||
yā devī sarvabhūteṣu tuṣṭirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 24 ||
yā devī sarvabhūteṣu mātṛrūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 25 ||
yā devī sarvabhūteṣu bhrāntirūpeṇa saṃsthitā |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 26 ||
indriyāṇāmadhiṣṭhātrī bhūtānāṃ chākhileṣu yā |
bhūteṣu satataṃ tasyai vyāptyai devyai namo namaḥ || 27 ||
citirūpeṇa yā kṛtsnaметad vyāpya sthitā jagat |
namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ || 28 ||
स्तोत्र का आध्यात्मिक अर्थ (Spiritual Explanation)
देवी सर्वत्र हैं
Devi Aparajita Stotram की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें देवी को किसी एक रूप तक सीमित नहीं किया गया है। यह स्तोत्र उस दर्शन को प्रकट करता है जिसमें कहा गया है — देवी ही समस्त प्राणियों में विभिन्न रूपों से विराजमान हैं।
भूख में देवी हैं, नींद में देवी हैं, बुद्धि में देवी हैं, करुणा में देवी हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जो भी अनुभव हम जीवन में करते हैं — वह सब देवी की ही अभिव्यक्ति है।
अपराजिता — वह जो कभी पराजित नहीं होती
“अपराजिता” नाम का गहरा अर्थ यह है कि शक्ति और धर्म कभी अंततः पराजित नहीं होते। अंधकार के बाद प्रकाश आता है, पतन के बाद उत्थान होता है — यही अपराजिता की शिक्षा है।
विजयादशमी और अपराजिता
पुराणों के अनुसार, देवासुर संग्राम के पश्चात जब देवताओं ने देवी की स्तुति की, तभी यह स्तोत्र प्रकट हुआ। यही कारण है कि विजयादशमी पर इस अपराजिता स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। त्रेतायुग में जब भगवान राम ने रावण का वध किया, उसी दिन विजयादशमी के रूप में इसे और गहरा अर्थ मिला।
पाठ का उचित समय (When to Recite Aparajita Stotram)
Aparajita Stotram का पाठ निम्नलिखित अवसरों पर विशेष रूप से शुभ माना जाता है:
दैनिक पाठ के लिए: किसी भी शुक्रवार से प्रारंभ करके सायंकाल (लगभग ५:३० से ७:३०) या रात्रि (९:१५ से १०:३०) के शांत समय में पाठ करें। लाल ऊनी आसन पर पूर्व या दक्षिण की ओर मुख करके बैठें।
विशेष अवसर:
- विजयादशमी (दशहरा) — यह सर्वश्रेष्ठ दिन है इस स्तोत्र के पाठ का।
- नवरात्रि के नौ दिन — माँ दुर्गा की आराधना के इन पावन दिनों में यह स्तोत्र पढ़ना अत्यंत लाभकारी है।
- किसी भी संकट के समय — जब जीवन में कोई बड़ी कठिनाई आए, परीक्षा, कोर्ट-कचहरी, व्यापार की समस्या, या शत्रुओं से भय हो।
- प्रातःकाल — सूर्योदय के बाद स्नान करके शांत मन से पाठ करना भी श्रेष्ठ है।
Aparajita Stotram Benefits – आध्यात्मिक और जीवन-लाभ
Aparajita Stotram Benefits अनेक हैं। भक्तों के अनुभव और शास्त्रीय मान्यताओं के आधार पर मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:
१. विजय और सफलता की प्राप्ति: जो व्यक्ति सच्चे मन से Devi Aparajita Stotram का पाठ करता है, उसे कार्यों में सफलता मिलती है। परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना, प्रतियोगिताओं में विजय पाना — इन सबमें देवी अपराजिता की कृपा सहायक होती है।
२. शत्रुओं और भय से रक्षा: यह स्तोत्र एक कवच (आध्यात्मिक सुरक्षा) की तरह काम करता है। जो भक्त इसे पढ़ते हैं, शत्रु उन्हें हानि नहीं पहुँचा पाते।
३. मन की शांति: “या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता” — देवी स्वयं शांति के रूप में विराजमान हैं। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से मन शांत और स्थिर रहता है।
४. पापों से मुक्ति: जाने-अनजाने में किए गए पापों का नाश होता है और चित्त शुद्ध होता है।
५. आत्मविश्वास और साहस: अपराजिता देवी की शक्ति भक्त में आत्मविश्वास भरती है। जब सभी मार्ग बंद लगते हैं, तब भी देवी अपने भक्त का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
६. समृद्धि और कल्याण: “लक्ष्मीरूपेण संस्थिता” — देवी लक्ष्मी के रूप में भी उपस्थित हैं। इस स्तोत्र के पाठ से घर में सुख, समृद्धि और शांति आती है।
७. इच्छाओं की पूर्ति: यह माना जाता है कि इस स्तोत्र के प्रभाव से मनुष्य की उचित इच्छाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में संतोष आता है।
अपराजिता स्तोत्र PDF के बारे में
जो साधक अपराजिता स्तोत्र PDF डाउनलोड करना चाहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र Blessing Read की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है।
Aparajita Stotram PDF को अपने मोबाइल या कम्प्यूटर में सहेजकर आप इसे यात्रा में, मंदिर में, या घर पर कहीं भी आसानी से पढ़ सकते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
Aparajita Stotram केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है — यह एक जीवन-दर्शन है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि देवी शक्ति हर प्राणी में, हर अनुभव में, हर क्षण में विद्यमान है। चाहे वह बुद्धि हो, करुणा हो, शांति हो या शक्ति — सब में माँ अपराजिता की झलक है।
जब जीवन की कठिनाइयाँ सामने आएँ, जब मन भय और निराशा से घिर जाए — तब “नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः” का यह पावन उच्चारण एक नया साहस, एक नई ऊर्जा और एक अटूट विश्वास जगाता है।
Devi Aparajita Stotram का यह पाठ न केवल बाहरी शत्रुओं से, बल्कि भीतर के अंधकार से भी मुक्ति दिलाता है। नवरात्रि हो, विजयादशमी हो, या जीवन का कोई भी संधिकाल — माँ अपराजिता सदा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
माँ अपराजिता की कृपा आप सभी पर सदा बनी रहे। 🙏
? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न १: Aparajita Stotram का क्या अर्थ है?
“अपराजिता” का अर्थ है — जो कभी पराजित नहीं हुई। यह स्तोत्र माँ दुर्गा के उस दिव्य रूप की स्तुति है जो समस्त प्राणियों में बुद्धि, शक्ति, करुणा, शांति और चेतना के रूप में विद्यमान हैं।
प्रश्न २: Aparajita Stotram कब और कितनी बार पढ़ना चाहिए?
इसे प्रतिदिन एक बार सायंकाल या रात्रि में पढ़ा जा सकता है। विशेष फल के लिए नवरात्रि और विजयादशमी पर पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। किसी विशेष संकट में इसे ११ या १०८ बार पढ़ने का विधान भी मिलता है।
प्रश्न ३: क्या Aparajita Stotram और Devi Aparajita Stotram एक ही है?
हाँ, दोनों एक ही स्तोत्र के नाम हैं। कुछ ग्रंथों में इसे Devi Aparajita Stotram कहा जाता है तो कुछ में Aparajita Stotram। यह मार्कण्डेय पुराण और दुर्गा सप्तशती का अंग है।
प्रश्न ४: Aparajita Stotram के क्या Benefits हैं?
इस स्तोत्र के नियमित पाठ से विजय, सफलता, शत्रु-नाश, मन की शांति, आत्मविश्वास, पापमुक्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। परीक्षा में सफलता के लिए विद्यार्थी इसे विशेष रूप से पढ़ते हैं।
प्रश्न ५: Aparajita Stotram किस पुराण से लिया गया है?
यह स्तोत्र मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत देवी महात्म्यम् (दुर्गा सप्तशती) से लिया गया है। यह हिंदू धर्म का एक प्रामाणिक और प्राचीन ग्रंथ है।
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