हिंदू धर्म में माँ लक्ष्मी की उपासना के लिए अनेक स्तोत्र और सूक्त प्रचलित हैं, परंतु Shree Suktam का स्थान इन सबमें अत्यंत विशेष है। श्रीसूक्तम् ऋग्वेद के खिलसूक्त का एक अंश है जो देवी लक्ष्मी — धन, समृद्धि, सौंदर्य और शुभता की अधिष्ठात्री देवी — की स्तुति में रचित है।
Shree Suktam Path In Hindi और संस्कृत दोनों भाषाओं में पढ़ा जाता है। इसमें कुल ३७ श्लोक हैं जो माँ लक्ष्मी के विविध रूपों, गुणों और महिमा का वर्णन करते हैं। यह सूक्त न केवल भौतिक समृद्धि बल्कि आत्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी अत्यंत फलदायी माना जाता है।
जो भक्त नियमित रूप से Shree Suktam Path करते हैं, उन्हें माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह Full Shree Suktam का पाठ गृहस्थ जीवन में सुख-समृद्धि, व्यापार में वृद्धि और पारिवारिक शांति लाता है।
श्रीसूक्तम् का परिचय (What is Shree Suktam?)
Shree Suktam वेदों का एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र मंत्र-संग्रह है। इसे ऋग्वेद की परंपरा में ‘खिल’ भाग के अंतर्गत रखा गया है। ‘श्री’ शब्द का अर्थ है — लक्ष्मी, शोभा, संपत्ति, और दिव्य ऐश्वर्य।
इस सूक्त में अग्नि देव (जातवेद) से माँ लक्ष्मी का आह्वान किया गया है। Shree Suktam Lyrics में माँ लक्ष्मी को सोने जैसे वर्ण वाली, कमल पर विराजमान, और सभी प्राणियों को सुख देने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है।
श्रीसूक्तम् स्तोत्र का पाठ भारत के प्रत्येक कोने में — मंदिरों, घरों, और यज्ञों में — श्रद्धापूर्वक किया जाता है।
संपूर्ण श्रीसूक्तम् पाठ (Full Shree Suktam – Sanskrit Text)
हरी : ॐ
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽसुराष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वान् निर्णुद मे गृहात् ॥८॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥
कर्दमेन प्रजाभूता मयि संभव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥१५॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥
पद्मानने पद्मोरु पद्माक्षी पद्मसम्भवे ।
तन्मे भजसि पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥१७॥
अश्वदायै गोदायै धनदायै महाधने ।
धनं मे लभतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ॥१८॥
पुत्रपौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम् ।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ॥१९॥
धनमग्निर् धनं वायुर् धनं सूर्यो धनं वसुः ।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमस्तु मे ॥२०॥
वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥२१॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत् सदा ॥२२॥
वर्षन्तु ते विभावरी दिवो अभ्रस्य विद्युतः ।
रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि ॥२३॥
पद्मप्रिये पद्मिनी पद्महस्ते पद्मालये पद्मदलायताक्षि ।
विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥२४॥
या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी ।
गम्भीरा वर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया ॥२५॥
लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैः ।
नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥२६॥
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्रराजतनयां श्रीरङ्गधामेश्वरीम् ।
दासीभूतसमस्तदेववनितां लोकैकदीपाङ्कुराम् ॥२७॥
श्रीमन्मन्दकटाक्षलब्धविभवब्रह्मेन्द्रगङ्गाधराम् ।
त्वां त्रैलोक्यकुटुम्बिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम् ॥२८॥
सिद्धलक्ष्मीर्मोक्षलक्ष्मीर्जयलक्ष्मीः सरस्वती ।
श्रीलक्ष्मीर्वरलक्ष्मीश्च प्रसन्ना मम सर्वदा ॥२९॥
वराङ्कुशौ पाशमभीतिमुद्रां करे वहन्तीं कमलासनस्थाम् ।
बालार्ककोटिप्रतिभां त्रिनेत्रां भजेऽहमाद्यां जगदीश्वरीं त्वाम् ॥३०॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥३१॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥३२॥
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।
विष्णुप्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥३३॥
महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥३४॥
श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते ।
धान्यं धनं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥३५॥
ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः ।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥३६॥
य एवं वेद ।
ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥३७॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
Shree Suktam In English (श्री सूक्त हिंदी अर्थ सहित)
प्रमुख श्लोकों का रोमन लिपि में उच्चारण:
Shlok 1
Om Hiranyavarnam Harineem Suvarna Rajata Srajam |
Chandram Hiranmayeem Lakshmeem Jaatavedo Ma Aavaha ||1||
Hindi Arth (Short Meaning): हे अग्निदेव! सोने जैसी कांति वाली, चाँदी-सोने की माला धारण करने वाली, चंद्रमा-सी प्रकाशमान माँ लक्ष्मी को मेरे पास बुलाइए।
Shlok 2
Taam Ma Aavaha Jaatavedo Lakshmeem Anapagaamineem |
Yasyaam Hiranyam Vindeyam Gaamashvam Purushaanahm ||2||
Hindi Arth: हे जातवेद! उन स्थायी रूप से निवास करने वाली माँ लक्ष्मी को बुलाइए, जिनकी कृपा से मुझे सोना, गाय, घोड़े और श्रेष्ठ पुरुष मिलें।
Shlok 3
Ashvapoorvaam Rathamadhyaam Hastinaadaprabodhineeem |
Shriyam Deveem Upahvaye Shreermaadevi Jushataam ||3||
Hindi Arth: जिनके आगे अश्व, मध्य में रथ और हाथियों की ध्वनि से जागृति होती है – उन देवी श्री को मैं बुलाता हूँ। माँ श्री मुझे स्वीकार करें।
Shlok 4
Kaam Sosmitaam Hiranyaprakaaraam Aadraam |
Jvalanteem Triptaam Tarpayanteem |
Padme Sthitaam Padmavarnaam |
Taamihopaahvaye Shriyam ||4||
Hindi Arth: जो मधुर मुस्कान वाली, सोने से घिरी, आर्द्र (करुणामयी), ज्वलंत तेज से युक्त, तृप्त और तृप्ति देने वाली हैं, कमल पर विराजमान और कमल-वर्ण की हैं – उन माँ श्री को मैं यहाँ बुलाता हूँ।
Shlok 5
Chandraam Prabhaasaam Yashasaa Jvalanteem |
Shriyam Loke Devajushtaamudaraam |
Taam Padmineeemeem Sharanamaham |
Prapadye Alakshmeermae Nashyataam Tvaam Vrune ||5||
Hindi Arth: चंद्रमा-सी प्रकाशमान, यश से ज्वलित, देवताओं की प्रिय उदार माँ श्री की मैं शरण लेता हूँ। हे माँ! मेरी दरिद्रता (अलक्ष्मी) का नाश करें, मैं आपको वरण करता हूँ।
Shlok 6
Aadityavarne Tapasoadhijaato |
Vanaspatistava Vrukshotha Bilvah |
Tasya Phalaani Tapasaa Nudantu |
Maayaantaraayaashcha Baahyaa Alakshmeeh ||6||
Hindi Arth: हे सूर्य-वर्ण देवी! तपस्या से उत्पन्न बिल्व वृक्ष के फल सभी आंतरिक और बाहरी विघ्नों तथा दरिद्रता को दूर करें।
Shlok 7
Upaeetu Maam Devesakhah Keertishchamaninaa Saha |
Praadurbhootoasuraashtresmin Keertimruddhim Dadaatu Me ||7||
Hindi Arth: देवताओं के मित्र कुबेर, कीर्ति और मणि के साथ मेरे पास आएँ। इस राष्ट्र में प्रकट होकर मुझे यश और समृद्धि प्रदान करें।
Shlok 8
Kshuatpipaasamalaam Jyeshtthaamalakshmeem Naashayaamyaham |
Abhootimasamruddhim Cha Sarvaan Nirnuda Me Gruhaat ||8||
Hindi Arth: भूख-प्यास की मलिनता से उत्पन्न ज्येष्ठा (दरिद्रता) को मैं नष्ट करता हूँ। हे माँ! मेरे घर से सभी अभाव और दुर्भाग्य को दूर करें।
Shlok 9
Gandhadwaaraam Duraadharshaam Nityaapushtaam Kareesbhineem |
Eeshvareem Sarvabhootaanaam Taamihopaahvaye Shriyam ||9||
Hindi Arth: जो गंध से जानी जाती हैं, अजेय हैं, नित्य पुष्ट हैं, उर्वरता की स्वामिनी हैं और सभी प्राणियों की ईश्वरी हैं – उन माँ श्री को मैं बुलाता हूँ।
Shlok 10
Manasah Kaamamaakootim Vaachah Satyamasheeamahi |
Pashoonaam Roopamnnasya Mayi Shreeh Shrayataam Yashah ||10||
Hindi Arth: मन की कामना, वाणी की सत्यता, पशुओं का सौंदर्य और अन्न की पुष्टि – ये सब मुझे मिलें। माँ श्री और यश मेरे पास निवास करें।
Shlok 11
Kardamena Prajaabhootaa Mayi Sambhava Kardam |
Shriyam Vaasaya Me Kule Maataram Padmamaalineem ||11||
Hindi Arth: हे कर्दम ऋषि! आप श्री के पुत्र हैं, मेरे यहाँ निवास करें। कमल-माला धारण करने वाली माँ लक्ष्मी को मेरे कुल में बसाएँ।
Shlok 12
Aapah Srijantu Snigdhaani Chikleeta Vasa Me Gruhe |
Ni Cha Deveem Maataram Shriyam Vaasaya Me Kule ||12||
Hindi Arth: हे जल देवता! मेरे घर में स्नेह और शीतलता फैलाएँ। हे चिक्लीत! देवी माँ श्री को मेरे कुल में बसाएँ।
Shlok 13
Aardraam Pushkarineem Pushtim Pingalaam Padmamaalineem |
Chandraam Hiranmayeem Lakshmeem Jaatavedo Ma Aavaha ||13||
Hindi Arth: हे जातवेद! आर्द्र (करुणामयी), कमल-कुंड में विहार करने वाली, पुष्टि देने वाली, पिंगल वर्ण की और पद्ममाला धारण करने वाली चंद्रमा-सी हिरण्मयी माँ लक्ष्मी को बुलाइए।
Shlok 14
Aardraam Yah Karineem Yashtim Suvarnaam Hemamaalineem |
Sooryaam Hiranmayeem Lakshmeem Jaatavedo Ma Aavaha ||14||
Hindi Arth: हे जातवेद! हाथी पर सवार, यष्टि धारण करने वाली, सुनहरी और हेममाला से सुशोभित, सूर्य के समान तेजस्वी माँ लक्ष्मी को बुलाइए।
Shlok 15
Taam Ma Aavaha Jaatavedo Lakshmeem Anapagaamineem |
Yasyaam Hiranyam Prabhootam Gaavo |
Daasyoshvaan Vindeyam Purushaanahm ||15||
Hindi Arth: हे जातवेद! उन माँ लक्ष्मी को बुलाइए जो कभी न जाने वाली हैं, जिनकी कृपा से प्रचुर सोना, गाय, दास और घोड़े मिलते हैं।
Shlok 16
Yah Shuchih Prayato Bhootvaa Juhuyaadaajyamanvaham |
Sooktam Panchadasharcham Cha Shreekaamah Satatam Japet ||16||
Hindi Arth: जो व्यक्ति पवित्र होकर प्रतिदिन घी की आहुति दे और श्री की इच्छा से इस पंद्रह ऋचाओं वाले सूक्त का निरंतर जप करे, उसे माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है।
Shlok 17
Padmaanane Padmauoru Padmaakshee Padmasambhave |
Tanme Bhajasi Padmaakshee Yena Saukhyam Labhaamy Aham ||17||
Hindi Arth: हे कमल-मुखी, कमल-नयनी, कमल से उत्पन्न माँ! आप मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि डालें जिससे मुझे सुख की प्राप्ति हो।
Shlok 18
Ashvadaayae Godaayae Dhanadaayae Mahadhane |
Dhanam Me Labhataams Devi Sarvakaamaanscha Dehi Me ||18||
Hindi Arth: हे अश्व देने वाली, गाय देने वाली, धन देने वाली और महान धन की स्वामिनी देवी! मुझे धन और सभी मनोकामनाएँ प्रदान करें।
Shlok 19
Putrapaautram Dhanam Dhaanyam Hastyashvaadi Gaverratham |
Prajaanaam Bhavasi Maataa Aayushmantam Karotu Me ||19||
Hindi Arth: हे माँ! आप पुत्र-पौत्र, धन-धान्य, हाथी-घोड़े, गाय और रथ देने वाली प्रजा की माता हैं। मुझे दीर्घायु प्रदान करें।
Shlok 20
Dhanamagniir Dhanamvaayur Dhanam Sooryo Dhanamvasu |
Dhanamindro Bruhaspatir Varunam Dhanamastu Me ||20||
Hindi Arth: अग्नि धन है, वायु धन है, सूर्य धन है, वसु धन है। इंद्र, बृहस्पति और वरुण – ये सब मेरे लिए धन हों। (सब देवता मुझे संपन्न करें।)
Shlok 21
Vainateya Somam Piba Somam Pibatu Vrutrahaa |
Somam Dhanasya Somino Mahyam Dadaatu Sominah ||21||
Hindi Arth: हे गरुड़! आप सोम का पान करें, वृत्रहंता इंद्र भी सोम पिएँ। सोमरस के स्वामी मुझे धन और संपत्ति प्रदान करें।
Shlok 22
Na Krodho Na Cha Maatsaryam Na Lobho Naashubhaamati |
Bhavanti Krutapunyaanaam Bhaktaanaam Shreesooktam Japet Sadaa ||22||
Hindi Arth: जो भक्त श्रीसूक्त का सदा जप करते हैं, उनके मन में क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और अशुभ विचार नहीं आते। पुण्यशाली भक्त इन विकारों से मुक्त हो जाते हैं।
Shlok 23
Varshantu Te Vibhaavaree Divo Abhrasya Vidyutah |
Rohhantu Sarvabeejyaannyava Brahmdvisho Jahi ||23||
Hindi Arth: हे रात्रि देवी! आकाश के मेघ बरसें, सभी बीज अंकुरित हों और ब्रह्म-द्वेषी शत्रुओं का नाश हो।
Shlok 24
Padmapriye Padminee Padmahaste Padmaalaye Padmadalayataakshi |
Vishvapriye Vishnumanoanukoole Tvatpaada Padmam Mayi Sannidhattsva ||24||
Hindi Arth: हे कमल-प्रिया, कमल-हस्ता, कमल-नयनी, कमल-निवासिनी! हे विश्वप्रिया और विष्णु-मनोनुकूल देवी! अपने चरण-कमल मेरे पास स्थापित करें।
Shlok 25
Yaa Saa Padmaasanasthaa Vipulakati Tati Padmapatraayataakshi |
Gambheeraa Vartanaabhi Stana Bharanamitaa Shubhravastrottariyaa ||25||
Hindi Arth: जो कमलासन पर विराजमान हैं, विशाल कटि-प्रदेश वाली हैं, कमल-दल-सी नेत्रों वाली हैं, गहरी नाभि वाली, स्तन-भार से झुकी और शुभ्र वस्त्र धारण करने वाली हैं – वे माँ लक्ष्मी हैं।
Shlok 26
Lakshmeer Divyaai Gajendrair Maniganakhachite Snaapitaa Hemakumbhaih |
Nityam Saa Padmahaastaa Mama Vasatu Gruhe Sarvamangalayuktaa ||26||
Hindi Arth: जो दिव्य हाथियों द्वारा मणि-जड़ित स्वर्ण कलशों से अभिषिक्त हैं, नित्य कमल धारण करने वाली और सर्व मंगल से युक्त माँ लक्ष्मी – मेरे घर में सदा निवास करें।
Shlok 27
Lakshmeem Ksheerasamudraraajatanayaam Shreeranga Dhaameshvareem |
Daaseebhoota Samastadevavanitaam Lokaika Deepankuraam ||27||
Hindi Arth: क्षीरसागर-राज की पुत्री, श्रीरंग-धाम की स्वामिनी, सभी देव-वनिताओं की सेव्य और समस्त लोकों को प्रकाशित करने वाली माँ लक्ष्मी को नमन।
Shlok 28
Shreeman Mandakataksha Labdha Vibhava Brahmeindra Gangadhaaraam |
Tvaam Trailokya Kutumbineem Sarasijaam Vande Mukundapriyaam ||28||
Hindi Arth: जिनकी मंद कटाक्ष से ब्रह्मा, इंद्र और शिव को ऐश्वर्य मिला, तीनों लोकों की कुटुम्बिनी, कमल में निवास करने वाली और मुकुंद (विष्णु) की प्रिया माँ लक्ष्मी को मैं प्रणाम करता हूँ।
Shlok 29
Siddhalakshmeer Mokshalakshmeejayalakshmeer Sarasvatee |
Shreelakshmeeer Varalakshmeeshcha Prasannaa Mama Sarvadaa ||29||
Hindi Arth: सिद्धलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी, जयलक्ष्मी, सरस्वती, श्रीलक्ष्मी और वरलक्ष्मी – ये सभी स्वरूप मुझ पर सदा प्रसन्न रहें।
Shlok 30
Varaankushau Paashamaabheeti Mudraam Kare Vahanteem Kamalaasanasthaam |
Baalaarkaakoti Pratibhaam Trinetram Bhajeham Aadyaam Jagadeeshvareem Tvaam ||30||
Hindi Arth: वर, अंकुश, पाश और अभय मुद्रा धारण करने वाली, कमल पर विराजमान, करोड़ों उगते सूर्य के समान तेजस्वी और त्रिनयनी आदि जगदीश्वरी माँ का मैं भजन करता हूँ।
Shlok 31
Sarva Mangala Maangalye Shive Sarvaarthha Saadhike |
Sharannye Tryambake Devi Naaraayannie Naamoastu Te ||31||
Hindi Arth: हे सर्व मंगलों में परम मंगल, शिवस्वरूपा, सभी अर्थों को सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, त्रिनयनी नारायणी देवी! आपको नमस्कार है।
Shlok 32
Sarasijanilaye Sarojahaste Dhavalaataraanshu Kagandhamaalyashoabhe |
Bhagavati Harivallabhe Manojnje Tribhuvanabhootikaree Praseeda Mahyam ||32||
Hindi Arth: हे कमल-निवासिनी, कमल-हस्ता, शुभ्र वस्त्र और गंधमाला से सुशोभित, विष्णु-प्रिया, मनोहर और तीनों लोकों को ऐश्वर्य देने वाली भगवती! मुझ पर प्रसन्न हों।
Shlok 33
Vishnupatnim Kshamaam Deveem Maadhaveem Maadhavapriyaam |
Vishnu Priyasakheem Deveem Naamaamy Achyutvallabham ||33||
Hindi Arth: विष्णु-पत्नी, क्षमाशीला, माधव की प्रिया और विष्णु-सखी देवी अच्युत-वल्लभा माँ लक्ष्मी को मैं प्रणाम करता हूँ।
Shlok 34 (Lakshmi Gayatri)
Mahaalaксhmee Cha Vidmahe Vishnupatni Cha Dheemahi |
Tanno Lakshmih Prachodayaat ||34||
Hindi Arth: हम महालक्ष्मी को जानते हैं, विष्णु-पत्नी का ध्यान करते हैं। वे लक्ष्मी हमें प्रेरणा और शक्ति दें।
Shlok 35
Shreervar Chasvamaayushyamaarogyamavidhaachha Shobhamaanam Maheeyate |
Dhaanyam Dhanam Pashum Bahupuralabham Shatsamvatsaram Dheerghamaayuh ||35||
Hindi Arth: माँ लक्ष्मी तेज, दीर्घ आयु, आरोग्य, शोभा, धान्य, धन, पशु, बहुत संतान और सौ वर्षों की लंबी आयु प्रदान करें।
Shlok 36
Runa Rogaadi Daaridrya Paap Kshudap Mrityavah |
Bhayashokamanastapaa Nashyanttu Mama Sarvadaa ||36||
Hindi Arth: ऋण, रोग, दरिद्रता, पाप, भूख, अकाल मृत्यु, भय, शोक और मानसिक कष्ट – ये सब मेरे जीवन से सदा के लिए नष्ट हों।
Shlok 37 (Phala Shruti – Mahalakshmi Gayatri)
Om Mahaadevyai Cha Vidmahe Vishnu Patni Cha Dheemahi |
Tanno Lakshmih Prachodayaat ||37||
Hindi Arth: ॐ, हम महादेवी को जानते हैं, विष्णु-पत्नी का ध्यान करते हैं। वे माँ लक्ष्मी हमें सन्मार्ग पर प्रेरित करें।
Om Shanti Shanti Shanti
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance of Shree Suktam)
Shree Suktam का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। इस सूक्त में माँ लक्ष्मी के तीन प्रमुख स्वरूपों की आराधना की गई है:
१. भौतिक लक्ष्मी: धन, सम्पत्ति, अन्न, पशु और पुत्र-पौत्र देने वाली।
२. आत्मिक लक्ष्मी: ज्ञान, विवेक, शांति और सात्त्विकता प्रदान करने वाली।
३. मोक्षदायिनी लक्ष्मी: मोक्षलक्ष्मी के रूप में भव-बंधन से मुक्ति दिलाने वाली।
इस Shree Suktam Path में ‘अलक्ष्मी’ — अर्थात् दरिद्रता, क्रोध, मात्सर्य, लोभ और अशुभ बुद्धि — के नाश की भी प्रार्थना की गई है। यह सूक्त सिखाता है कि सच्ची लक्ष्मी वही है जो हमारे मन, वचन और कर्म को शुद्ध करे।
श्रीसूक्तम् स्तोत्र में वैदिक ऋषियों ने माँ लक्ष्मी को विष्णु की प्रिय पत्नी, क्षीर-सागर की पुत्री और सम्पूर्ण सृष्टि की माता के रूप में वर्णित किया है।
पाठ करने का उचित समय (When to Recite Shree Suktam Path)
Shree Suktam Path In Hindi या संस्कृत में निम्न अवसरों पर विशेष रूप से किया जाता है:
- शुक्रवार: माँ लक्ष्मी का प्रिय दिन। इस दिन Shree Suktam का पाठ विशेष फलदायी होता है।
- दीपावली: माँ लक्ष्मी पूजन के समय इस सूक्त का पाठ अनिवार्य माना जाता है।
- प्रात:काल: सूर्योदय से पहले या स्नान के बाद पाठ करना सर्वोत्तम है।
- नवरात्रि: माँ के नौ स्वरूपों की उपासना के दौरान Full Shree Suktam का पाठ अत्यंत शुभ है।
- गृह-प्रवेश: नये घर में प्रवेश करते समय इस सूक्त से लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है।
- व्यापार-शुभारंभ: नई दुकान या व्यवसाय आरंभ करते समय।
- यज्ञ और हवन: होम में इस सूक्त की आहुतियाँ दी जाती हैं।
पाठ की संख्या: एकाग्रचित्त होकर ११ बार, २१ बार या १०८ बार पाठ करना विशेष लाभकारी माना गया है।
Shree Suktam के आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ (Benefits)
Shree Suktam Path से मिलने वाले लाभों का वर्णन स्वयं इस सूक्त में किया गया है —
१. धन-सम्पत्ति की प्राप्ति: माँ लक्ष्मी की कृपा से घर में धन, धान्य, अश्व, गाय और सम्पत्ति की वृद्धि होती है।
२. दरिद्रता का नाश: श्रीसूक्तम् स्तोत्र में ‘अलक्ष्मी’ के नाश की प्रार्थना है। नियमित पाठ से घर की दरिद्रता और अशांति दूर होती है।
३. स्वास्थ्य और दीर्घायु: श्लोक ३५ में स्वास्थ्य, तेज और दीर्घ जीवन का आशीर्वाद माँगा गया है।
४. मन की शांति: क्रोध, लोभ, ईर्ष्या — इन विकारों का नाश होता है और मन शांत व सात्त्विक बनता है।
५. पुत्र-पौत्र सुख: परिवार में संतान-सुख, प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।
६. ऋण और रोग से मुक्ति: श्लोक ३६ में ऋण, रोग, दारिद्र्य, भय और शोक के नाश की प्रार्थना है।
७. मोक्ष प्राप्ति: Shree Suktam के अंतिम श्लोकों में सिद्धलक्ष्मी और मोक्षलक्ष्मी का आह्वान मोक्ष-प्राप्ति की कामना से किया जाता है।
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पाठ की विधि (Method of Recitation)
Shree Suktam Path In Hindi करते समय निम्न बातों का ध्यान रखें:
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- माँ लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक प्रज्वलित करें।
- कमल के फूल, लाल पुष्प, लाल चंदन और धूप-दीप अर्पित करें।
- एकाग्रचित्त होकर शुद्ध उच्चारण के साथ Shree Suktam का पाठ करें।
- पाठ के बाद माँ लक्ष्मी से क्षमा याचना और आशीर्वाद माँगें।
निष्कर्ष (Conclusion)
Shree Suktam Path In Hindi माँ लक्ष्मी की उपासना का सर्वोच्च और सर्वाधिक प्राचीन मार्ग है। यह श्रीसूक्तम् स्तोत्र केवल धन की कामना नहीं करता — यह हमें सिखाता है कि सच्ची समृद्धि वही है जिसमें धन के साथ-साथ स्वास्थ्य, शांति, ज्ञान और भक्ति भी हो।
जब हम Full Shree Suktam का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करते हैं, तो माँ लक्ष्मी की कृपा-दृष्टि हम पर अवश्य पड़ती है। हमारे घर में सुख-शांति का वास होता है, दरिद्रता और कलह का नाश होता है, और जीवन में माँगल्य की वृद्धि होती है।
ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न १: Shree Suktam क्या है और यह किस वेद में है?
उत्तर: Shree Suktam ऋग्वेद के खिलसूक्त भाग में है। यह माँ लक्ष्मी की स्तुति में रचित ३७ श्लोकों का एक पवित्र वैदिक सूक्त है जो धन, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए पाठ किया जाता है।
प्रश्न २: Shree Suktam Path In Hindi कब करना चाहिए?
उत्तर: Shree Suktam Path शुक्रवार को, दीपावली पर, नवरात्रि में और प्रतिदिन प्रात:काल स्नान के बाद करना सर्वोत्तम माना गया है। गृह-प्रवेश और व्यापार-शुभारंभ पर भी यह पाठ किया जाता है।
प्रश्न ३: Shree Suktam कितनी बार पढ़ना चाहिए?
उत्तर: नियमित रूप से एक बार पाठ करना पर्याप्त है। विशेष कामनाओं के लिए ११, २१ या १०८ बार पाठ करने का विधान है। यज्ञ में इसकी १०८ आहुतियाँ दी जाती हैं।
प्रश्न ४: Shree Suktam के पाठ से क्या लाभ होता है?
उत्तर: Full Shree Suktam के नियमित पाठ से धन-सम्पत्ति, स्वास्थ्य, संतान-सुख, मानसिक शांति, ऋण-मुक्ति और दरिद्रता के नाश का लाभ मिलता है। यह मोक्ष-प्राप्ति में भी सहायक है।
प्रश्न ५: क्या महिलाएँ Shree Suktam का पाठ कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, बिल्कुल। Shree Suktam Path स्त्री और पुरुष दोनों कर सकते हैं। माँ लक्ष्मी की यह स्तुति सभी के लिए समान रूप से लाभदायक है। श्रद्धा और पवित्रता ही सबसे महत्त्वपूर्ण है।
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