हिंदू धर्म में Argala Stotram एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो माँ दुर्गा की आराधना में पढ़ा जाता है। यह अर्गला स्त्रोत्र दुर्गा सप्तशती के पाठ-विधि का एक अभिन्न और अनिवार्य अंग है। “अर्गला” शब्द का अर्थ होता है अर्गल यानी कुंडी या ताला, और इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक के जीवन में बाधाओं का नाश होता है, द्वार खुलते हैं और माँ भगवती की कृपा सहज ही प्राप्त होती है।
यह स्तोत्र देवी कवचम् के बाद और कीलकम् से पहले पढ़ा जाता है। Argala Stotram in Hindi को समझ कर पढ़ने से भक्तों को न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन में सुख, यश, विजय और आरोग्य की प्राप्ति भी होती है।
नवरात्रि, दुर्गापूजा और चण्डी पाठ के अवसर पर Argala Stotram का पाठ विशेष रूप से किया जाता है। जो भक्त प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, उन्हें माँ चण्डिका का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
Argala Stotram क्या है? (What is Argala Stotram?)
अर्गला स्त्रोत्र महर्षि मार्कण्डेय द्वारा रचित है और यह मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत दुर्गा सप्तशती का एक पवित्र स्तोत्र है। इस स्तोत्र में माँ दुर्गा के विविध रूपों जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा की स्तुति की गई है।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसकी प्रत्येक पंक्ति के बाद यह मंत्र दोहराया जाता है:
“रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि”
अर्थात् “हे माँ! मुझे सौन्दर्य दो, विजय दो, यश दो, और मेरे शत्रुओं का नाश करो।”
यह पंक्ति Argala Stotram की आत्मा है, जिसमें भक्त माँ से समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करता है।
Argala Stotram in Sanskrit (सम्पूर्ण अर्गला स्त्रोत्र)
विनियोग:
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच:
श्लोक 1:
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
श्लोक 2:
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥
श्लोक 3:
मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 4:
महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 5:
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 6:
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 7:
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 8:
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 9:
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 10:
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 11:
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 12:
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 13:
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 14:
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 15:
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 16:
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 17:
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 18:
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 19:
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 20:
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 21:
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 22:
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 23:
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
श्लोक 24:
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥
श्लोक 25 (फलश्रुति):
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसङ्ख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥
Argala Stotram In English – Transliteration (उच्चारण मार्गदर्शिका)
जो भक्त संस्कृत लिपि पढ़ने में कठिनाई अनुभव करते हैं, उनके लिए यहाँ Argala Stotram In English (Roman Transliteration) में सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है। इसे ध्यानपूर्वक और शुद्ध उच्चारण के साथ पढ़ें।
Viniyoga (विनियोग)
Om Asya Shri Argala Stotram Mantrasya Vishnur Rishih,
Anushtup Chandah, Shri Mahalakshmir Devata,
Shri Jagadamba Pritaye Saptashati Pathangatvena Jape Viniyogah.
Om Namash Chandikayai.
Markandey Uvacha
Verse 1:
Om Jayanti Mangala Kali Bhadrakali Kapalini,
Durga Kshama Shiva Dhatri Swaha Swadha Namo’stu Te.
Verse 2:
Jaya Tvam Devi Chamunde Jaya Bhutarti Harini,
Jaya Sarvagate Devi Kalaratri Namo’stu Te.
Verse 3:
Madhu Kaitabha Vidravi Vidhatu Varade Namah,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 4:
Mahishasura Nirnashi Bhaktanam Sukhade Namah,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 5:
Raktabija Vadhe Devi Chanda Munda Vinashini,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 6:
Shumbhasyaiva Nishumbhasya Dhumrakshsasya Cha Mardini,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 7:
Vanditanghri Yuge Devi Sarva Saubhagya Dayini,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 8:
Achintya Rupa Charite Sarva Shatru Vinashini,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 9:
Natebhyah Sarvada Bhaktya Chandike Durita Pahe,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 10:
Stuvad Bhyo Bhakti Purvam Tvam Chandike Vyadhi Nashini,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 11:
Chandike Satatam Ye Tvam Archayanti Ha Bhaktitah,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 12:
Dehi Saubhagyam Arogyam Dehi Me Paramam Sukham,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 13:
Vidhehi Dvishatan Nasham Vidhehi Balam Uchchakaih,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 14:
Vidhehi Devi Kalyanam Vidhehi Paramam Shriyam,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 15:
Surasura Shiro Ratna Nigrishta Charane Ambike,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 16:
Vidyavantam Yashasvantam Lakshmivantam Janam Kuru,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 17:
Prachanda Daitya Darpagne Chandike Pranataya Me,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 18:
Chaturbhuje Chaturvaktra Samstute Parameshvari,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 19:
Krishnena Samstute Devi Shashvad Bhaktya Sadambike,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 20:
Himachala Suta Natha Samstute Parameshvari,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 21:
Indrani Pati Sadbhava Pujite Parameshvari,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 22:
Devi Prachanda Dordanda Daitya Darpa Vinashini,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 23:
Devi Bhakta Jana Uddama Dattanandodaye Ambike,
Rupam Dehi Jayam Dehi Yasho Dehi Dvisho Jahi.
Verse 24:
Patnim Manoramam Dehi Mano Vritta Nusarinim,
Tarinim Durga Samsara Sagarasya Kulodbhavam.
Verse 25 (Phala Shruti):
Idam Stotram Pathitva Tu Maha Stotram Pathennara,
Sa Tu Saptashati Sankhya Varam Apnoti Sampadam.
Argala Stotram In Hindi – श्लोकों का हिंदी अर्थ
विनियोग का अर्थ: इस अर्गला स्त्रोत्र मंत्र के ऋषि विष्णु हैं, छंद अनुष्टुप् है, देवता श्री महालक्ष्मी हैं। श्री जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए, सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप किया जाता है।
श्लोक 1 का अर्थ: हे माँ! आप जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा हैं। आपको मेरा प्रणाम है।
श्लोक 2 का अर्थ: हे देवि चामुण्डे! आपकी जय हो। आप प्राणियों के दुःखों को हरने वाली हैं। हे सर्वव्यापिनी कालरात्रि देवि! आपको नमस्कार है।
श्लोक 3 का अर्थ: हे देवि! आपने मधु और कैटभ नामक दैत्यों को भगाया और ब्रह्मा को वर प्रदान किया। आपको नमस्कार है। हे माँ! मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 4 का अर्थ: हे महिषासुर का नाश करने वाली माँ! आप भक्तों को सुख देने वाली हैं। आपको नमस्कार है। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।
श्लोक 5 का अर्थ: हे देवि! आपने रक्तबीज का वध किया और चण्ड-मुण्ड का विनाश किया। मुझे रूप, जय, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 6 का अर्थ: हे माँ! आपने शुम्भ, निशुम्भ और धूम्राक्ष जैसे दैत्यों का मर्दन किया। मुझे रूप, जय, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 7 का अर्थ: हे देवि! देवताओं ने आपके चरण-युगल की वंदना की है। आप सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाली हैं। मुझे रूप, जय, यश और शत्रुनाश प्रदान करें।
श्लोक 8 का अर्थ: हे माँ! आपका रूप और चरित्र अचिंत्य है। आप सभी शत्रुओं का नाश करने वाली हैं। कृपया रूप, जय और यश प्रदान करें।
श्लोक 9 का अर्थ: हे चण्डिके! जो भक्त भक्तिपूर्वक आपको नमन करते हैं, आप उनके पापों का नाश करती हैं। मुझे भी रूप, जय, यश और शत्रुनाश प्रदान करें।
श्लोक 10 का अर्थ: हे चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करते हैं, आप उनके रोगों का नाश करती हैं। मुझे भी इन्हीं वरदानों से कृतार्थ करें।
श्लोक 11 का अर्थ: हे चण्डिके! जो सदा भक्तिभाव से आपकी अर्चना करते हैं, उन्हें और मुझे भी रूप, जय, यश और शत्रु-नाश का वरदान दें।
श्लोक 12 का अर्थ: हे माँ! मुझे सौभाग्य और आरोग्य प्रदान करें, परम सुख दें। साथ ही रूप, जय, यश और शत्रुनाश भी दें।
श्लोक 13 का अर्थ: हे देवि! मेरे शत्रुओं का नाश करें और मुझे उच्च बल प्रदान करें। रूप, जय और यश से मुझे सम्पन्न करें।
श्लोक 14 का अर्थ: हे देवि! मेरा कल्याण करें और मुझे परम वैभव-समृद्धि दें। साथ ही रूप, जय और यश भी प्रदान करें।
श्लोक 15 का अर्थ: हे अम्बिके! देवताओं और असुरों के मस्तक के रत्नों से आपके चरण घिसते हैं (अर्थात् देव और असुर दोनों आपके चरण में नतमस्तक हैं)। मुझे रूप, जय, यश और शत्रुनाश दें।
श्लोक 16 का अर्थ: हे माँ! मुझे विद्यावान, यशस्वी और लक्ष्मीवान बनाएं। रूप, जय और यश प्रदान करें।
श्लोक 17 का अर्थ: हे चण्डिके! आपने प्रचण्ड दैत्यों के घमंड को चूर-चूर किया। आपके समक्ष प्रणत इस भक्त को रूप, जय और यश प्रदान करें।
श्लोक 18 का अर्थ: हे चार भुजाओं वाली परमेश्वरि! आपकी ब्रह्मा द्वारा स्तुति की गई है। मुझे रूप, जय और यश प्रदान करें।
श्लोक 19 का अर्थ: हे अम्बिके! भगवान श्रीकृष्ण ने भी सदा भक्तिभाव से आपकी स्तुति की है। मुझे भी रूप, जय और यश से अनुग्रहीत करें।
श्लोक 20 का अर्थ: हे परमेश्वरि! पार्वती पति भगवान शिव ने आपकी स्तुति की है। मुझे भी रूप, जय और यश दें।
श्लोक 21 का अर्थ: हे परमेश्वरि! इंद्र ने सद्भावपूर्वक आपकी पूजा की है। मुझे भी रूप, जय और यश प्रदान करें।
श्लोक 22 का अर्थ: हे देवि! आप प्रचण्ड भुजाओं से दैत्यों के अहंकार का नाश करने वाली हैं। मुझे रूप, जय और यश से सम्पन्न करें।
श्लोक 23 का अर्थ: हे अम्बिके! आप अपने भक्तजनों को असीमित आनंद प्रदान करती हैं। मुझे भी रूप, जय और यश का वरदान दें।
श्लोक 24 का अर्थ: हे माँ! मुझे एक मनोरम, मन के अनुरूप चलने वाली, और कुलीन पत्नी दें जो इस कठिन संसार-सागर को पार कराने में सहायक हो।
श्लोक 25 का अर्थ (फलश्रुति): जो मनुष्य इस Argala Stotram का पाठ करके फिर महास्तोत्र (दुर्गा सप्तशती) का पाठ करता है, वह सप्तशती के सम्पूर्ण फल को प्राप्त करता है और उत्तम सम्पदाओं को पाता है।
आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance)
अर्गला स्त्रोत्र केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि यह भक्त और माँ शक्ति के बीच एक सजीव संवाद है। इसमें भक्त विनम्रतापूर्वक माँ से चार मुख्य वरदान माँगता है रूप (सौन्दर्य), जय (विजय), यश (कीर्ति) और शत्रुनाश। यह चारों वरदान मनुष्य के जीवन को पूर्ण बनाते हैं।
“अर्गला” का अर्थ है वह कुंडी जो द्वार को बंद रखती है। इस स्तोत्र का पाठ उस बाधा-रूपी कुंडी को खोलता है और माँ दुर्गा की कृपा का मार्ग प्रशस्त करता है।
शक्ति साधना में यह स्तोत्र एक “Key” की तरह कार्य करता है जो माँ के कृपा-द्वार को उद्घाटित करता है। इसीलिए दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले इस Argala Stotram का पाठ अनिवार्य माना जाता है।
Argala Stotram कब पढ़ें? (When to Recite)
Argala Stotram के पाठ के लिए विशेष अवसर और समय इस प्रकार हैं:
- नवरात्रि चैत्र और शारदीय नवरात्रि में प्रतिदिन
- दुर्गापूजा विशेषकर अष्टमी और नवमी को
- चण्डी पाठ दुर्गा सप्तशती पाठ से पहले अनिवार्य रूप से
- प्रत्येक दिन प्रातःकाल माँ दुर्गा की नित्य उपासना में
- संकट के समय जब जीवन में बाधाएँ और शत्रुभय हो
- मंगलवार और शुक्रवार ये दिन माँ दुर्गा की उपासना के लिए विशेष माने जाते हैं
पाठ से पहले स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें, माँ दुर्गा का ध्यान करें, और भक्तिभाव से Argala Stotram का पाठ करें।
Argala Stotram PDF के बारे में
जो भक्त Argala Stotram PDF डाउनलोड करना चाहते हैं, वे विभिन्न विश्वसनीय हिंदू धार्मिक वेबसाइटों पर इसे निःशुल्क प्राप्त कर सकते हैं। PDF में संस्कृत पाठ, हिंदी अनुवाद और उच्चारण मार्गदर्शिका होती है, जो पाठ को सरल और शुद्ध बनाती है।
Argala Stotram in English (Roman transliteration) में पाठ करने के इच्छुक भक्त भी ऑनलाइन प्राप्त कर सकते हैं। यह उन भक्तों के लिए विशेष उपयोगी है जो संस्कृत लिपि नहीं पढ़ पाते परंतु इस स्तोत्र के लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।
Argala Stotram Benefits – आध्यात्मिक और जीवन लाभ
अर्गला स्त्रोत्र के नियमित पाठ से भक्तों को निम्नलिखित Benefits प्राप्त होते हैं:
1. शत्रु-नाश और रक्षा इस स्तोत्र में बार-बार “द्विषो जहि” की प्रार्थना की गई है। माँ दुर्गा शत्रुओं से रक्षा करती हैं और जीवन में सुरक्षा का कवच प्रदान करती हैं।
2. रूप और सौन्दर्य की प्राप्ति “रूपं देहि” के माध्यम से भक्त बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार के सौन्दर्य की कामना करता है। माँ की कृपा से व्यक्तित्व में निखार आता है।
3. विजय और सफलता “जयं देहि” की प्रार्थना से जीवन के हर क्षेत्र में शिक्षा, व्यवसाय, प्रतियोगिता में सफलता मिलती है।
4. यश और कीर्ति “यशो देहि” के प्रभाव से समाज में मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है और व्यक्ति का नाम सुप्रसिद्ध होता है।
5. आरोग्य और निरोगी काया स्तोत्र में “देहि सौभाग्यमारोग्यं” की प्रार्थना की गई है। इस Argala Stotram के पाठ से रोगों का नाश होता है।
6. सौभाग्य और समृद्धि “विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्” माँ से कल्याण और परम लक्ष्मी की प्रार्थना की गई है, जिससे भक्त के घर में सम्पत्ति और वैभव आता है।
7. बुद्धि और विद्या की प्राप्ति “विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु” माँ की कृपा से विद्या, यश और लक्ष्मी तीनों की प्राप्ति होती है।
8. सप्तशती के समान फल फलश्रुति के अनुसार, जो व्यक्ति Argala Stotram पढ़कर दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण सप्तशती के पाठ का फल मिलता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
Argala Stotram माँ दुर्गा की आराधना का एक अनुपम रत्न है। इसमें भक्त अपने हृदय की समस्त इच्छाएँ माँ के सामने विनम्रतापूर्वक रखता है रूप, जय, यश और शत्रुनाश की प्रार्थना करता है। यह अर्गला स्त्रोत्र न केवल दुर्गा सप्तशती के पाठ का अनिवार्य अंग है, बल्कि स्वतः भी एक सम्पूर्ण और शक्तिशाली स्तोत्र है।
जो भी भक्त Argala Stotram in Hindi को समझकर और भक्तिभाव से पढ़ता है, उसे माँ भगवती की अखंड कृपा प्राप्त होती है। जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, मन को शांति मिलती है, और हर क्षेत्र में सफलता का मार्ग खुलता है।
माँ दुर्गा से प्रार्थना है कि वे समस्त भक्तों पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें।
॥ या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Argala Stotram क्या है और यह कहाँ से लिया गया है?
उत्तर: अर्गला स्त्रोत्र मार्कण्डेय पुराण की दुर्गा सप्तशती का एक पवित्र स्तोत्र है, जिसकी रचना महर्षि मार्कण्डेय ने की थी। यह देवी कवचम् के बाद और कीलकम् से पहले पढ़ा जाता है।
प्रश्न 2: Argala Stotram के Benefits क्या हैं?
उत्तर: Argala Stotram Benefits में शत्रुनाश, रोगनाश, सौभाग्य, यश, विजय, आरोग्य और समृद्धि की प्राप्ति शामिल हैं। इसके नियमित पाठ से माँ दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
प्रश्न 3: अर्गला स्त्रोत्र कितनी बार पढ़ना चाहिए?
उत्तर: सामान्यतः अर्गला स्त्रोत्र को दुर्गा सप्तशती पाठ से पहले एक बार पढ़ा जाता है। नवरात्रि में प्रतिदिन एक बार पाठ अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
प्रश्न 4: क्या Argala Stotram महिलाएं भी पढ़ सकती हैं?
उत्तर: हाँ, बिल्कुल। Argala Stotram का पाठ महिला और पुरुष दोनों कर सकते हैं। यह माँ दुर्गा की स्तुति है और समस्त भक्तों के लिए समान रूप से फलदायक है।
प्रश्न 5: Argala Stotram PDF कहाँ से प्राप्त करें?
उत्तर: Argala Stotram PDF आप Blessingread.com जैसी विश्वसनीय धार्मिक वेबसाइटों से निःशुल्क डाउनलोड कर सकते हैं। इसमें संस्कृत पाठ और हिंदी अर्थ दोनों उपलब्ध होते हैं।
प्रश्न 6: क्या Argala Stotram और Keelakam अलग-अलग हैं?
उत्तर: हाँ, ये दोनों अलग-अलग स्तोत्र हैं। अर्गला स्त्रोत्र देवी कवचम् के बाद आता है, जबकि कीलकम् अर्गला के बाद पढ़ा जाता है। ये तीनों मिलकर दुर्गा सप्तशती के पाठ की विधि पूर्ण करते हैं।
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