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    Shlok

    Dwadash Jyotirling Stotra | द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र – अर्थ, महत्त्व और आध्यात्मिक लाभ

    RaviBy RaviJuly 30, 2026
    Dwadash Jyotirling Stotra

    भगवान शिव की उपासना में Dwadash Jyotirling Stotra का विशेष स्थान है। यह स्तोत्र भारत के बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत पवित्र और प्राचीन स्तोत्र है। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह Dwadash Jyotirling Stotram भक्तों को शिवजी के बारह दिव्य धामों से जोड़ता है और उनकी कृपा प्राप्त करने का सरल मार्ग प्रदान करता है।

    द्वादश ज्योतिर्लिंग का शाब्दिक अर्थ है — “बारह ज्योतिर्लिंग।” ये वे बारह स्थान हैं जहाँ भगवान शिव स्वयं ज्योति के रूप में प्रकट हुए थे। इन तीर्थस्थलों के नाम-स्मरण और स्तुति-पाठ से व्यक्ति को शारीरिक रूप से इन तीर्थों की यात्रा का पुण्य प्राप्त होता है।

    शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रातः और सायं इस Dwadash Jyotirling Mantra का पाठ करता है, उसके सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि यह स्तोत्र शिव भक्तों के लिए अत्यंत प्रिय और आवश्यक है।

    Table of Contents

    Toggle
    • द्वादश ज्योतिर्लिंग क्या हैं? (What are Dwadash Jyotirlinga?)
    • Dwadash Jyotirling Stotra – संपूर्ण संस्कृत पाठ
      • लघु स्तोत्रम् (Laghu Stotram)
      • सम्पूर्ण द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् (Sampurna Stotram)
    • Dwadash Jyotirling Stotra In Hindi – हिंदी अर्थ
      • श्लोक १ – सोमनाथ (Somnath)
      • श्लोक २ – मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna)
      • श्लोक ३ – महाकाल (Mahakaal)
      • श्लोक ४ – ओंकारेश्वर (Omkareshwar)
      • श्लोक ५ – वैद्यनाथ (Vaidyanath)
      • श्लोक ६ – भीमशंकर (Bhimashankar)
      • श्लोक ७ – रामेश्वर (Rameshwar)
      • श्लोक ८ – नागेश्वर (Nageshwar)
      • श्लोक ९ – विश्वनाथ (Vishwanath)
      • श्लोक १० – त्र्यम्बकेश्वर (Trimbakeshwar)
      • श्लोक ११ – केदारनाथ (Kedarnath)
      • श्लोक १२ – घृष्णेश्वर (Ghrishneshwar)
      • श्लोक १३ – फलश्रुति (Phalashruti)
    • Dwadash Jyotirling Stotra Meaning – आध्यात्मिक व्याख्या
    • द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ कब करें?
    • Dwadash Jyotirling Stotra के आध्यात्मिक लाभ (Benefits)
    • रचनाकार – आदि शंकराचार्य के बारे में
    • निष्कर्ष (Conclusion)
    • ? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
      • प्रश्न १: Dwadash Jyotirling Stotra का क्या अर्थ है?
      • प्रश्न २: Dwadash Jyotirling Mantra का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
      • प्रश्न ३: क्या इस स्तोत्र से सात जन्मों के पाप नष्ट होते हैं?
      • प्रश्न ४: इस स्तोत्र की रचना किसने की?
      • प्रश्न ५: क्या बिना ज्योतिर्लिंग तीर्थ जाए इस स्तोत्र से पुण्य मिल सकता है?
      • प्रश्न ६: द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र और लघु स्तोत्र में क्या अंतर है?

    द्वादश ज्योतिर्लिंग क्या हैं? (What are Dwadash Jyotirlinga?)

    हिंदू धर्म में बारह ज्योतिर्लिंगों को सर्वोच्च शिव-तीर्थ माना गया है। इनके नाम इस प्रकार हैं:

    क्रम ज्योतिर्लिंग स्थान
    1 सोमनाथ सौराष्ट्र, गुजरात
    2 मल्लिकार्जुन श्रीशैल, आंध्र प्रदेश
    3 महाकाल उज्जैन, मध्य प्रदेश
    4 ओंकारेश्वर ओंकार-मान्धाता, मध्य प्रदेश
    5 वैद्यनाथ देवघर, झारखंड
    6 भीमशंकर महाराष्ट्र
    7 रामेश्वर रामेश्वरम्, तमिलनाडु
    8 नागेश्वर द्वारका, गुजरात
    9 विश्वनाथ काशी, उत्तर प्रदेश
    10 त्र्यम्बकेश्वर नासिक, महाराष्ट्र
    11 केदारनाथ हिमालय, उत्तराखंड
    12 घृष्णेश्वर औरंगाबाद, महाराष्ट्र

    Dwadash Jyotirling Stotra – संपूर्ण संस्कृत पाठ

    लघु स्तोत्रम् (Laghu Stotram)

    यह द्वादश ज्योतिर्लिंग मंत्र का संक्षिप्त रूप है जो अत्यंत प्रचलित है:

    सौराष्ट्रे सोमनाथञ्च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।
    उज्जयिन्यां महाकालम् ॐकारेत्वमामलेश्वरम् ॥

    पर्ल्यां वैद्यनाथञ्च ढाकिन्यां भीमशङ्करम् ।
    सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥

    वारणाश्यां तु विश्वेशं त्रयम्बकं गौतमीतटे ।
    हिमालये तु केदारं घृष्णेशं तु विशालके ॥

    एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।
    सप्त जन्म कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥

    सम्पूर्ण द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् (Sampurna Stotram)

    यह Dwadash Jyotirling Stotram का पूर्ण विस्तृत पाठ है, जिसमें प्रत्येक ज्योतिर्लिंग की स्वतंत्र स्तुति की गई है:

    ॥ श्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रम् ॥

    सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् ।
    भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥१॥

    श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् ।
    तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥२॥

    अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् ।
    अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥३॥

    कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय ।
    सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥४॥

    पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् ।
    सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ॥५॥

    यं डाकिनिशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च ।
    सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि ॥६॥

    श्रीताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः ।
    श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥७॥

    याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः ।
    सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ॥८॥

    सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् ।
    वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥९॥

    सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे ।
    यद्दर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ॥१०॥

    महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः ।
    सुरासुरैर्यक्षमहोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥११॥

    इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् ।
    वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणम् प्रपद्ये ॥१२॥

    ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण ।
    स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥१३॥

    ॥ इति द्वादश ज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

    Dwadash Jyotirling Stotra In Hindi – हिंदी अर्थ

    श्लोक १ – सोमनाथ (Somnath)

    हिंदी अर्थ: सौराष्ट्र देश के सुंदर और विशाल प्रदेश में, जो ज्योति के स्वरूप हैं और जिनके मस्तक पर चंद्र कला सुशोभित है, जो भक्तों को भक्ति प्रदान करने के लिए कृपावश अवतरित हुए हैं — उन सोमनाथ की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

    श्लोक २ – मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna)

    हिंदी अर्थ: श्रीशैल पर्वत के शिखर पर, देवताओं के समूह से सेवित, जो प्रसन्नतापूर्वक वास करते हैं और जो संसार-सागर से पार करने वाले सेतु (पुल) हैं — उन मल्लिकार्जुन को मैं नमस्कार करता हूँ।

    श्लोक ३ – महाकाल (Mahakaal)

    हिंदी अर्थ: अवन्तिका (उज्जैन) नगरी में सज्जनों को मुक्ति देने के लिए और अकाल मृत्यु से रक्षा करने के लिए जिन्होंने अवतार लिया है — उन महाकाल को मैं वंदन करता हूँ।

    श्लोक ४ – ओंकारेश्वर (Omkareshwar)

    हिंदी अर्थ: कावेरी और नर्मदा के पवित्र संगम के पास, सज्जनों का उद्धार करने के लिए, मान्धाता नगरी में सदा विराजमान — उन ओंकारेश्वर शिव की मैं स्तुति करता हूँ।

    श्लोक ५ – वैद्यनाथ (Vaidyanath)

    हिंदी अर्थ: पूर्वोत्तर दिशा में ज्योति के केंद्र में, माता पार्वती के साथ सदा विराजमान, देवताओं और असुरों द्वारा जिनके चरण-कमलों की पूजा होती है — उन वैद्यनाथ को मैं प्रणाम करता हूँ।

    श्लोक ६ – भीमशंकर (Bhimashankar)

    हिंदी अर्थ: जो डाकिनी, शाकिनी आदि के समूह में और पिशाचों द्वारा सेवित हैं, जो सदा भीमशंकर के नाम से प्रसिद्ध हैं और भक्तों का हित करने वाले हैं — उन शंकर को मैं नमस्कार करता हूँ।

    श्लोक ७ – रामेश्वर (Rameshwar)

    हिंदी अर्थ: ताम्रपर्णी नदी और समुद्र के संगम पर, जहाँ श्रीरामचंद्र जी ने असंख्य बाणों से सेतु बनाकर जिनकी पूजा अर्पित की — उन रामेश्वर को मैं निरंतर प्रणाम करता हूँ।

    श्लोक ८ – नागेश्वर (Nageshwar)

    हिंदी अर्थ: दक्षिण दिशा में अत्यंत सुंदर नगर में, जो अनेक भोगों से अलंकृत हैं और जो सद्भक्ति तथा मुक्ति प्रदान करते हैं — उन नागनाथ (नागेश्वर) की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

    श्लोक ९ – विश्वनाथ (Vishwanath)

    हिंदी अर्थ: आनंद-वन (काशी) में आनंदपूर्वक विराजमान, आनंद के मूल और पापों के समूह को नष्ट करने वाले, अनाथों के नाथ, वाराणसीपति — उन श्री विश्वनाथ की मैं शरण लेता हूँ।

    श्लोक १० – त्र्यम्बकेश्वर (Trimbakeshwar)

    हिंदी अर्थ: सह्याद्रि पर्वत की पवित्र चोटी पर, गोदावरी के तट के पवित्र प्रदेश में विराजमान, जिनके दर्शन मात्र से पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं — उन त्र्यम्बकेश्वर की मैं स्तुति करता हूँ।

    श्लोक ११ – केदारनाथ (Kedarnath)

    हिंदी अर्थ: हिमालय पर्वत के तट पर रमण करते हुए, जिन्हें श्रेष्ठ मुनि, देवता, असुर, यक्ष और महान सर्प सदा पूजते हैं — उन केदारेश्वर शिव की मैं स्तुति करता हूँ।

    श्लोक १२ – घृष्णेश्वर (Ghrishneshwar)

    हिंदी अर्थ: इलापुर (एलोरा) के सुंदर और विशाल क्षेत्र में उल्लासपूर्वक विराजमान, जो सम्पूर्ण जगत में श्रेष्ठ हैं और महान उदार स्वभाव के हैं — उन घृष्णेश्वर की मैं वंदना करता हूँ और उनकी शरण लेता हूँ।

    श्लोक १३ – फलश्रुति (Phalashruti)

    हिंदी अर्थ: ज्योतिर्मय बारह शिवलिंगों की क्रमबद्ध रूप से कही गई यह स्तुति जो मनुष्य अत्यंत भक्तिभाव से पढ़ता है, वह उसके फल (पुण्य) को प्राप्त करके शिव का भजन करे।

    Dwadash Jyotirling Stotra Meaning – आध्यात्मिक व्याख्या

    Dwadash Jyotirling Stotra Meaning को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि ‘ज्योतिर्लिंग’ का अर्थ क्या है।

    ‘ज्योति’ का अर्थ है प्रकाश और ‘लिंग’ का अर्थ है चिह्न या प्रतीक। इस प्रकार ज्योतिर्लिंग का अर्थ हुआ — ईश्वर का प्रकाशमय प्रतीक। भगवान शिव ने इन बारह स्थलों पर स्वयं को अनादि प्रकाश-स्तंभ के रूप में प्रकट किया था।

    यह द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र अर्थ सहित पढ़ने से भक्त को न केवल बारह तीर्थों का पुण्य मिलता है, बल्कि शिव की असीम करुणा और कृपा का अनुभव भी होता है।

    प्रत्येक श्लोक में शिवजी के एक विशिष्ट गुण और उनके दिव्य स्थान का वर्णन है — कोई मुक्तिदाता है, कोई अकाल मृत्यु से रक्षक, कोई पापनाशक तो कोई आनंद का स्रोत। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त शिव के समस्त रूपों का एकसाथ स्मरण और वंदन करता है।

    द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ कब करें?

    इस द्वादश ज्योतिर्लिंग मंत्र का पाठ निम्नलिखित समय और अवसरों पर विशेष फलदायी माना गया है:

    • प्रातःकाल: सूर्योदय से पूर्व स्नान करके इस स्तोत्र का पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है।
    • सायंकाल: संध्या के समय शिव पूजन के साथ इस स्तोत्र का पाठ विशेष लाभकारी है।
    • सोमवार: सोमवार का दिन शिवजी को समर्पित है; इस दिन पाठ करना विशेष पुण्यकारी है।
    • महाशिवरात्रि: इस पावन रात्रि में चारों प्रहरों में इस स्तोत्र का जाप करने का विधान है।
    • श्रावण मास: पूरे सावन माह में प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है।
    • तीर्थयात्रा से पूर्व: ज्योतिर्लिंग तीर्थ की यात्रा पर जाने से पूर्व इस स्तोत्र का पाठ शुभ माना जाता है।
    • मृत्यु-भय या संकट के समय: महाकाल की स्तुति से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।

    Dwadash Jyotirling Stotra के आध्यात्मिक लाभ (Benefits)

    शास्त्रों और परंपरागत मान्यताओं के अनुसार Dwadash Jyotirling Mantra के नियमित पाठ से अनेक आध्यात्मिक और भावनात्मक लाभ प्राप्त होते हैं:

    १. पापनाश: स्तोत्र की फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि सायं-प्रातः इस द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ करने वाले व्यक्ति के सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

    २. मोक्ष की प्राप्ति: महाकाल और विश्वनाथ की स्तुति से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। उज्जैन में महाकाल “मुक्तिप्रदानाय” — मुक्ति देने वाले — के रूप में स्थापित हैं।

    ३. अकाल मृत्यु से रक्षा: महाकाल की स्तुति में “अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं” शब्द आते हैं — अर्थात् यह स्तोत्र अकाल मृत्यु से सुरक्षा प्रदान करता है।

    ४. मन की शांति: इस पवित्र स्तोत्र का पाठ मन को शांत और स्थिर करता है। भक्तों को आंतरिक शांति और मानसिक संतुलन का अनुभव होता है।

    ५. संसार-सागर से मुक्ति: मल्लिकार्जुन को “संसारसमुद्रसेतुम्” — संसार-सागर से पार करने वाला सेतु — कहा गया है। यह स्तोत्र भव-बंधनों से मुक्ति दिलाता है।

    ६. भक्ति का विकास: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से हृदय में शिव के प्रति गहरी भक्ति और श्रद्धा जागृत होती है।

    ७. तीर्थ-यात्रा का पुण्य: जो व्यक्ति किसी कारणवश बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा नहीं कर सकता, वह इस स्तोत्र के पाठ से सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त कर सकता है।

    रचनाकार – आदि शंकराचार्य के बारे में

    यह द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। आदि शंकराचार्य ने ८वीं शताब्दी में सनातन धर्म के पुनरुद्धार के लिए अथक कार्य किया। उन्होंने भारत के चारों कोनों में चार पीठों की स्थापना की और अनेक स्तोत्रों की रचना की।

    उनके द्वारा रचित यह स्तोत्र भारत की आध्यात्मिक एकता का प्रतीक है, क्योंकि इसमें उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक फैले सभी बारह ज्योतिर्लिंगों की एकसाथ स्तुति की गई है।

    निष्कर्ष (Conclusion)

    Dwadash Jyotirling Stotra भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक अमूल्य रत्न है। यह न केवल बारह पवित्र तीर्थों की स्तुति है, बल्कि यह भगवान शिव की असीम करुणा, शक्ति और ज्ञान का सार भी है।

    जब हम इस द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् का श्रद्धाभाव से पाठ करते हैं, तो हमारा मन शिव के चरणों में समर्पित हो जाता है। सोमनाथ की ज्योति से लेकर घृष्णेश्वर के दिव्य आलोक तक — यह स्तोत्र समस्त भारत की एकता और शिव-भक्ति की अखंड धारा का प्रतीक है।

    प्रतिदिन प्रातः और सायं इस द्वादश ज्योतिर्लिंग मंत्र का पाठ करें, मन को पवित्र रखें, और महादेव की कृपा से जीवन को आनंदमय बनाएँ।

    ॐ नमः शिवाय। हर हर महादेव।

    ? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    प्रश्न १: Dwadash Jyotirling Stotra का क्या अर्थ है?

    उत्तर: द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का अर्थ है बारह ज्योतिर्लिंगों की स्तुति करने वाला पवित्र मंत्र-संग्रह। इसमें भगवान शिव के बारह प्रमुख तीर्थ स्थलों — सोमनाथ से घृष्णेश्वर तक — का क्रमबद्ध वंदन किया गया है।

    प्रश्न २: Dwadash Jyotirling Mantra का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

    उत्तर: शास्त्रों के अनुसार इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल — दोनों समय करना चाहिए। सोमवार को अथवा शिव-पर्वों पर ११ बार पाठ करना विशेष पुण्यकारी माना गया है।

    प्रश्न ३: क्या इस स्तोत्र से सात जन्मों के पाप नष्ट होते हैं?

    उत्तर: हाँ, इस स्तोत्र की फलश्रुति में स्वयं कहा गया है — “सप्त जन्म कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति” अर्थात् इस द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के स्मरण और पाठ से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

    प्रश्न ४: इस स्तोत्र की रचना किसने की?

    उत्तर: यह द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है, जो ८वीं शताब्दी के महान वेदांती, दार्शनिक और सनातन धर्म के पुनरुद्धारक थे।

    प्रश्न ५: क्या बिना ज्योतिर्लिंग तीर्थ जाए इस स्तोत्र से पुण्य मिल सकता है?

    उत्तर: बिल्कुल। परंपरागत मान्यता के अनुसार जो भक्त श्रद्धा और भक्तिभाव से इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, उन्हें बारहों ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और यात्रा का पुण्य प्राप्त होता है।

    प्रश्न ६: द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र और लघु स्तोत्र में क्या अंतर है?

    उत्तर: लघु स्तोत्र चार श्लोकों का संक्षिप्त रूप है, जिसमें सभी बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम और स्थान का उल्लेख है। पूर्ण स्तोत्र में तेरह श्लोक हैं, जिसमें प्रत्येक ज्योतिर्लिंग की स्वतंत्र और विस्तृत स्तुति की गई है।

    🙏 इन मंत्रों और श्लोकों को भी पढ़ना न भूलें:

    • Durant Dev Mantra
    • Daridra Dahan Shiv Stotra
    • Sanskrit Shlok On Karma
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    📖 अगर आपको Suvichar & Shayari पसंद हैं, तो इनका पूरा संग्रह यहाँ देखें : Suvichar Sathi

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