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    Home » Shlok » Gajendra Moksha Stotra In Hindi | प्रामाणिक श्लोक, अर्थ और लाभ
    Shlok

    Gajendra Moksha Stotra In Hindi | प्रामाणिक श्लोक, अर्थ और लाभ

    RaviBy RaviApril 11, 2026
    gajendra moksha stotra in hindi

    हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में एक अत्यंत मार्मिक और भक्तिपूर्ण आख्यान आता है जिसे Gajendra Moksha के नाम से जाना जाता है। इसके तृतीय अध्याय में गजेंद्र द्वारा भगवान की जो स्तुति की गई है, वही Gajendra Moksha Stotram है।

    यह स्तुति उस समय गाई गई जब गजेंद्र (हाथियों के राजा) का पैर एक विशाल मगरमच्छ (ग्राह) ने पकड़ लिया और हजार वर्षों के संघर्ष के बाद भी वे स्वयं को मुक्त न कर सके। तब उन्होंने अहंकार त्यागकर भगवान विष्णु की शरण ली और यह दिव्य स्तोत्र गाया।

    श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि Gajendra Moksha Stotra In Hindi और संस्कृत में इस स्तोत्र का पाठ स्वर्ग और यश देने वाला, कलियुग के समस्त पापों का नाशक, दुःस्वप्न नाशक और श्रेयस-साधक है।

    (स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित गजेंद्र मोक्ष पुस्तिका)

    Table of Contents

    Toggle
    • Gajendra Moksha – मूल कथा (The Sacred Story)
    • Gajendra Moksha Stotram – प्रामाणिक संस्कृत पाठ एवं हिंदी अर्थ
      • श्री शुकदेव उवाच — उपक्रम श्लोक
      • श्लोक १
      • श्लोक २
      • श्लोक ३
      • श्लोक ४
      • श्लोक ५
      • श्लोक ६
      • श्लोक ७
      • श्लोक ८
      • श्लोक ९
      • श्लोक १०
      • श्लोक ११
      • श्लोक १२
      • श्लोक १३
      • श्लोक १४
      • श्लोक १५
      • श्लोक १६
      • श्लोक १७
      • श्लोक १८
      • श्लोक १९
      • श्लोक २०
      • श्लोक २१
      • श्लोक २२
      • श्लोक २३
      • श्लोक २४
      • श्लोक २५
      • श्लोक २६
      • श्लोक २७
      • श्लोक २८ — गजेंद्र का अन्तिम समर्पण
    • श्रीशुकदेव जी का वर्णन — भगवान का आगमन (श्लोक २९–३३)
      • श्लोक २९
      • श्लोक ३०
      • श्लोक ३१
      • श्लोक ३२
      • श्लोक ३३
    • Gajendra Moksha Stotra का आध्यात्मिक संदेश (Spiritual Meaning)
    • Gajendra Moksha Path – कब और कैसे करें
    • Gajendra Moksha Stotra के आध्यात्मिक लाभ (Spiritual Benefits)
    • Gajendra Moksha Stotra PDF
    • निष्कर्ष (Conclusion)
    • ? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
      • प्र. १: Gajendra Moksha Stotra In Hindi कहाँ से लिया गया है?
      • प्र. २: Gajendra Moksha Path का सबसे उत्तम समय कौन सा है?
      • प्र. ३: Gajendra Moksha Stotram का पाठ कितने दिन करना चाहिए?
      • प्र. ४: Gajendra Moksha Stotra PDF कहाँ से प्राप्त करें?
      • प्र. ५: इस स्तोत्र के पाठ से क्या विशेष लाभ होता है?
      • प्र. ६: क्या गजेंद्र मोक्ष की कथा केवल एक पशु की कहानी है?
      • प्र. ७: स्तोत्र में कुल कितने श्लोक हैं?
      • प्र. ८: क्या ग्राह (मगरमच्छ) को भी मुक्ति मिली?

    Gajendra Moksha – मूल कथा (The Sacred Story)

    श्रीशुकदेवजी ने राजा परीक्षित को यह कथा सुनाई। Gajendra Moksha कथा के चार अध्याय हैं:

    • द्वितीय अध्याय – ग्राह के साथ गजेंद्र के युद्ध का वर्णन
    • तृतीय अध्याय – गजेंद्रकृत भगवान का स्तवन और Gajendra Moksha का प्रसंग
    • चतुर्थ अध्याय – गज और ग्राह के पूर्व जन्म का इतिहास

    जब गजेंद्र ने बुद्धि द्वारा निश्चय करके मन को हृदय देश में स्थिर किया, तब उन्होंने पूर्व जन्म में कंठस्थ किए हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार-बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करना आरंभ किया।

    Gajendra Moksha Stotram – प्रामाणिक संस्कृत पाठ एवं हिंदी अर्थ

    (गीताप्रेस गोरखपुर के प्रकाशन पर आधारित — श्रीमद्भागवत, अष्टम स्कंध, तृतीय अध्याय)

    श्री शुकदेव उवाच — उपक्रम श्लोक

    संस्कृत: एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि। जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्॥

    Transliteration: Evaṁ Vyavasito Buddhyā Samādhāya Mano Hr̥di। Jajāpa Paramaṁ Jāpyaṁ Prāgjanmanyanuśikṣitam॥

    हिंदी अर्थ: श्री शुकदेव जी ने कहा — बुद्धि के अनुसार पूर्व में वर्णित रीति से अपने मन को हृदय में स्थिर करके, गजेंद्र अपने पिछले जन्म में कंठस्थ किए हुए सर्वोच्च एवं बार-बार जाप किए जाने योग्य इस स्तोत्र का मन ही मन जाप करने लगे।

    श्लोक १

    संस्कृत: ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥

    Transliteration: Om Namo Bhagavate Tasmai Yata Etacchidātmakam। Puruṣāyādibījāya Pareśāyābhidhīmahi॥

    हिंदी अर्थ: गजेंद्र ने मन ही मन श्रीहरि को ध्यान करते हुए कहा — जिनके प्रवेश करने से यह जड़ शरीर और मन आदि भी चेतन की तरह व्यवहार करने लगते हैं, ‘ॐ’ द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए — उन सर्वशक्तिमान परमेश्वर का मैं मन ही मन स्मरण करता हूँ।

    श्लोक २

    संस्कृत: यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम्। योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम्॥

    Transliteration: Yasminnidaṁ Yataścedaṁ Yenedaṁ Ya Idaṁ Svayam। Yosmātparasmācca Parastaṁ Prapadye Svayambhuvam॥

    हिंदी अर्थ: जिनके सहारे यह पूरा संसार टिका हुआ है, जिनसे यह संसार अवतरित हुआ है, जिन्होंने प्रकृति की रचना की है और जो स्वयं उसके रूप में प्रकट हैं — फिर भी इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे एवं श्रेष्ठ हैं — उन अपने आप बने हुए, बिना किसी कारण के विद्यमान भगवान की मैं शरण लेता हूँ।

    श्लोक ३

    संस्कृत: यः स्वात्मनीदं निजमायया‌र्पितं क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम्। अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोवतु मां परात्परः॥

    Transliteration: Yaḥ Svātmanīdaṁ Nijamāyayārpitaṁ Kvacidvibhātaṁ Kva Ca Tattirohitam। Aviddhadr̥k Sākṣyubhayaṁ Tadīkṣate Sa Ātmamūlovatu Māṁ Parātparaḥ॥

    हिंदी अर्थ: अपनी संकल्प-शक्ति के बल पर अपने ही स्वरूप में रचित — सृष्टिकाल में प्रकट एवं प्रलय में अप्रकट रहने वाले — इस कार्य-कारण रूपी संसार को जो अकुण्ठित दृष्टि से साक्षी-रूप में देखते हुए भी उससे लिप्त नहीं होते — वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें।

    श्लोक ४

    संस्कृत: कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु। तमस्तदासीद्गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः॥

    Transliteration: Kālena Pañcatvamiteṣu Kr̥tsnaśo Lokeṣu Pāleṣu Ca Sarva Hetuṣu। Tamastadāsīdgahanaṁ Gabhīraṁ Yastasya Pāre’bhivirājate Vibhuḥ॥

    हिंदी अर्थ: बीतते समय के साथ तीनों लोकों और ब्रह्मादि लोकपालों के पञ्चभूत में प्रवेश कर जाने पर, तथा पञ्चभूतों से लेकर महत्त्व के सभी कारणों के प्रकृति में मग्न हो जाने पर — उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार घोर अन्धकार-रूपी प्रकृति ही बच रही थी। उस अन्धकार से परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब दिशाओं में प्रकाशित होते रहते हैं — वे प्रभु मेरी रक्षा करें।

    श्लोक ५

    संस्कृत: न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु- र्जन्तुः पुनः कोर्हति गन्तुमीरितुम्। यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥

    Transliteration: Na Yasya Devā R̥ṣayaḥ Padaṁ Vidu- rjantuḥ Punaḥ Korhati Gantumīritum। Yathā Naṭasyākr̥tibhirviceṣṭato Duratyayānukramaṇaḥ Sa Māvatu॥

    हिंदी अर्थ: भिन्न-भिन्न नाट्य रूपों में अभिनय करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नहीं जान पाते, उसी प्रकार सत्त्वप्रधान देवता तथा महर्षि भी जिनके स्वरूप को नहीं जान पाते — ऐसे में कोई साधारण प्राणी उनका वर्णन कैसे कर सकता है। ऐसे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें।

    श्लोक ६

    संस्कृत: दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम् विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः। चरन्त्यलोकव्रतमवृणं वने भूतात्मभूता सुहृदः स मे गतिः॥

    Transliteration: Didr̥kṣavo Yasya Padaṁ Sumaṅgalam Vimuktasaṅgā Munayaḥ Susādhavaḥ। Carantyalokavratamavr̥ṇaṁ Vane Bhūtātmabhūtā Suhr̥daḥ Sa Me Gatiḥ॥

    हिंदी अर्थ: अनेकों आसक्तियों से मुक्त, सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले, सबके बिना कारण हितैषी एवं अतिशय साधु-स्वभाव मुनिगण — जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रहकर अखण्ड ब्रह्मचर्य आदि अलौकिक व्रतों का नियमानुसार पालन करते हैं — वे प्रभु ही मेरी गति हैं।

    श्लोक ७

    संस्कृत: न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा न नाम रूपे गुणदोष एव वा। तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यः स्वमायया तान्युलोकमृच्छति॥

    Transliteration: Na Vidyate Yasya Na Janma Karma Vā Na Nāma Rūpe Guṇadoṣa Eva Vā। Tathāpi Lokāpyayāmbhavāya Yaḥ Svamāyayā Tānyulokamr̥cchati॥

    हिंदी अर्थ: जिनका हमारी तरह कर्मवश न जन्म होता है और न जिनके अहंकार-प्रेरित कर्म होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न कोई नाम है न रूप — फिर भी वे समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय के लिए अपनी इच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं।

    श्लोक ८

    संस्कृत: तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेऽनन्तशक्तये। अरूपायोरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे॥

    Transliteration: Tasmai Namaḥ Pareśāya Brāhmaṇe’nantaśaktaye। Arūpāyorūpāya Nama Āścarya Karmaṇe॥

    हिंदी अर्थ: उन अनन्त शक्ति सम्पन्न परम ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है। उन प्राकृत आकार-रहित एवं अनेकों आकार वाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारम्बार नमस्कार है।

    श्लोक ९

    संस्कृत: नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने। नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि॥

    Transliteration: Nama Ātma Pradīpāya Sākṣiṇe Paramātmane। Namo Girāṁ Vidūrāya Manasaścetasāmapi॥

    हिंदी अर्थ: स्वयं प्रकाशित एवं सबके साक्षी परमात्मा को शत-शत नमन है। उन प्रभु को — जो मन, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं — बार-बार नमस्कार है।

    श्लोक १०

    संस्कृत: सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता। नमः केवलनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥

    Transliteration: Sattvena Pratilabhyāya Naiṣkarmyeṇa Vipaścitā। Namaḥ Kevalanāthāya Nirvāṇasukhasaṁvide॥

    हिंदी अर्थ: विवेकी पुरुष द्वारा सत्त्वगुण-विशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष-सुख की अनुभूति-स्वरूप प्रभु को नमस्कार है।

    श्लोक ११

    संस्कृत: नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे। निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥

    Transliteration: Namaḥ Śāntāya Ghorāya Mūḍhāya Guṇa Dharmiṇe। Nirviśeṣāya Sāmyāya Namo Jñānaganāya Ca॥

    हिंदी अर्थ: सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त, रजोगुण को स्वीकार करके घोर एवं तमोगुण को अपनाकर मूढ़-से प्रतीत होने वाले — भेद-रहित, सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है।

    श्लोक १२

    संस्कृत: क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे। पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः॥

    Transliteration: Kṣetrajñāya Namastubhyaṁ Sarvādhyakṣāya Sākṣiṇe। Puruṣāyātmamūlāya Mūlaprakr̥taye Namaḥ॥

    हिंदी अर्थ: शरीर-इन्द्रिय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी-स्वरूप आपको नमस्कार है। सबके अन्तर्यामी, प्रकृति के परम कारण किन्तु स्वयं कारण-रहित प्रभु को शत-शत नमस्कार है।

    श्लोक १३

    संस्कृत: सर्वेन्द्रियगुणद्रष्टे सर्वप्रत्यय हेतवे। असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः॥

    Transliteration: Sarvendriyaguṇadraṣṭe Sarvapratyaya Hetave। Asatācchāyayoktāya Sadābhāsaya Te Namaḥ॥

    हिंदी अर्थ: सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण-रूप, सम्पूर्ण जड़-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले — सभी विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले भगवान को नमस्कार है।

    श्लोक १४

    संस्कृत: नमो नमस्ते खिल कारणाय निष्कारणाय‌ऽद्भुत कारणाय। सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोपवर्गाय परायणाय॥

    Transliteration: Namo Namaste Khila Kāraṇāya Niṣkāraṇāya’dbhuta Kāraṇāya। Sarvāgamāmnāyamahārṇavāya Namopavargāya Parāyaṇāya॥

    हिंदी अर्थ: सबके कारण किन्तु स्वयं कारण-रहित — कारण होने पर भी परिणाम-रहित होने के कारण अन्य कारणों से सर्वथा विलक्षण — आपको बारम्बार नमस्कार है। सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य, मोक्षस्वरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है।

    श्लोक १५

    संस्कृत: गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जित मानसाय। नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम- स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि॥

    Transliteration: Guṇāraṇicchanna Cidūṣmapāya Tatkṣobhavisfūrjita Mānasāya। Naiṣkarmyabhāvena Vivarjitāgama- Svayaṁprakāśāya Namaskaromi॥

    हिंदी अर्थ: जो त्रिगुण-रूपी काष्ठों में छिपे हुए ज्ञान-रूपी अग्नि हैं, गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में संसार को रचने की वृत्ति उत्पन्न होती है — आत्म-तत्त्व की भावना के द्वारा विधि-निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए महाज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं — उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।

    श्लोक १६

    संस्कृत: मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽल्लयाय। स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत- प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते॥

    Transliteration: Mādr̥kprapannapaśupāśavimokṣaṇāya Muktāya Bhūrikaruṇāya Namo’llayāya। Svāṁśena Sarvatanubhr̥nmanasi Pratīta- Pratyagdr̥śe Bhagavate Br̥hate Namaste॥

    हिंदी अर्थ: मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिए पूर्णरूप से काट देने वाले, अत्याधिक दयालु एवं दया दिखाने में कभी आलस न करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है। अपने अंश से सम्पूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले, सर्वनियन्ता अनन्त परमात्मा को नमस्कार है।

    श्लोक १७

    संस्कृत: आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैः- दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय। मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय॥

    Transliteration: Ātmātmajāptagr̥havittajaneṣu Saktai- rduṣprāpaṇāya Guṇasaṁgavivarjitāya। Muktātmabhiḥ Svahr̥daye Paribhāvitāya Jñānātmane Bhagavate Nama Īśvarāya॥

    हिंदी अर्थ: शरीर, पुत्र, मित्र, घर, सम्पत्ति एवं कुटुम्बियों में आसक्त लोगों द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाले — किन्तु मुक्त पुरुषों द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित — ज्ञानस्वरूप, सर्वसमर्थ परमेश्वर को नमस्कार है।

    श्लोक १८

    संस्कृत: यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति। किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽभ्रदयो विमोक्षणम्॥

    Transliteration: Yaṁ Dharmakāmārthavimuktikāmā Bhajanta Iṣṭāṁ Gatimāpnuvanti। Kiṁ Tvāśiṣo Rātyapi Dehamavyayaṁ Karotu Me’bhradayo Vimokṣaṇam॥

    हिंदी अर्थ: जिन्हें धर्म, अभिलषित भोग, धन तथा मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं — जो अयाचित भोग और अविनाशी पार्षद-शरीर भी देते हैं — वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्ति से सदा के लिए उबार लें।

    श्लोक १९

    संस्कृत: एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः। अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः॥

    Transliteration: Ekāntino Yasya Na Kañcanārthaṁ Vāñchanti Ye Vai Bhagavatprapannāḥ। Atyadbhutaṁ Taccaritaṁ Sumaṅgalaṁ Gāyanta Ānandasamudramagnāḥ॥

    हिंदी अर्थ: जिनके अनन्य भक्त — जो एकमात्र उन्हीं भगवान के शरण हैं — धर्म, अर्थ आदि किसी भी पदार्थ की अभिलाषा नहीं रखते, बल्कि उन्हीं के परम मंगलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में गोते लगाते रहते हैं।

    श्लोक २०

    संस्कृत: तमक्षरं ब्रह्म परं परेशम् अव्यक्तमाध्यात्मिकयोগগम्यम्। अतीन्द्रियं सूक्ष्मिवातिदूरम् अनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे॥

    Transliteration: Tamakṣaraṁ Brahma Paraṁ Pareśam Avyaktamādhyātmikayogagamyam। Atīndriyaṁ Sūkṣmivātidūram Anantamādyaṁ Paripūrṇamīḍe॥

    हिंदी अर्थ: उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ — अभक्तों के लिए अप्रकट होने पर भी भक्तियोग द्वारा प्राप्त होने योग्य, अत्यन्त निकट होने पर भी माया के कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होने वाले — इन्द्रियों द्वारा अगम्य, सबके आदि कारण एवं सब ओर से परिपूर्ण उन भगवान की मैं स्तुति करता हूँ।

    श्लोक २१

    संस्कृत: यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः। नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः॥

    Transliteration: Yasya Brahmādayo Devā Vedā Lokāścarācarāḥ। Nāmarūpavibhedena Phalgyā Ca Kalayā Kr̥tāḥ॥

    हिंदी अर्थ: ब्रह्मा सहित सभी देवता, चारों वेद, समस्त चराचर जीव — ये सब नाम और रूप के भेद से जिनके अत्यन्त सूक्ष्म अंश से रचित हैं।

    श्लोक २२

    संस्कृत: यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः। तथा यतोयं गुणसंप्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः॥

    Transliteration: Yathārcidṣo’gneḥ Saviturgabhastayo Niryānti Saṁyāntyasakr̥t Svarocidṣaḥ। Tathā Yatoyaṁ Guṇasaṁpravāho Buddhirmanaḥ Khāni Śarīrasargāḥ॥

    हिंदी अर्थ: जिस प्रकार जलती हुई अग्नि की लपटें और सूरज की किरणें बार-बार बाहर निकलती हैं और फिर अपने कारण में लीन हो जाती हैं — उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीर — ये सभी जिस स्वयंप्रकाश परमात्मा से उत्पन्न होकर पुनः उन्हीं में लीन हो जाते हैं।

    श्लोक २३

    संस्कृत: स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग् न स्त्री न षण्डो न पुमान् न जन्तुः। नायं गुणः कर्म न सन्न चासन्- निषेधशेषो जयतादशेषः॥

    Transliteration: Sa Vai Na Devāsuramarttyatiryaṅ Na Strī Na Ṣaṇḍo Na Pumān Na Jantuḥ। Nāyaṁ Guṇaḥ Karma Na Sanna Cāsan- Niṣedhaśeṣo Jayatādaśeṣaḥ॥

    हिंदी अर्थ: वे भगवान न तो देवता हैं, न असुर, न मनुष्य और न ही पशु-पक्षी आदि किसी अन्य योनि के प्राणी। न वे स्त्री हैं, न पुरुष और न नपुंसक। न वे गुण हैं, न कर्म — न कार्य हैं और न कारण। इन सभी का निषेध होने पर जो शेष बचता है — वही उनका असली स्वरूप है। ऐसे प्रभु मेरे उद्धार के लिए प्रकट हों।

    श्लोक २४

    संस्कृत: जिजीविषे नाहमिहामुया किम् अन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या। इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव- स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम्॥

    Transliteration: Jijīviṣe Nāhamihāmuyā Kim Antarbahiścāvr̥tayebhayonyā। Icchāmi Kālena Na Yasya Viplava- Stasyātmalokāvaraṇasya Mokṣam॥

    हिंदी अर्थ: अब मैं इस मगरमच्छ के चंगुल से मुक्त होकर भी इस हाथी के शरीर में जीते रहने की इच्छा नहीं रखता — क्योंकि यह शरीर भीतर और बाहर सब ओर से अज्ञान से ढका हुआ है। मैं उस अज्ञान से मुक्ति चाहता हूँ जो आत्मज्ञान को आच्छादित करता है — और जिसका नाश केवल कालक्रम से नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा और ज्ञान से ही होता है।

    श्लोक २५

    संस्कृत: सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम्। विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम्॥

    Transliteration: So’haṁ Viśvasŕjaṁ Viśvamavíśvaṁ Viśvavedásam। Viśvātmānamajaṁ Brahma Praṇato’smi Paraṁ Padam॥

    हिंदी अर्थ: इस प्रकार मोक्ष के लिए लालायित होकर मैं — संसार के रचयिता, स्वयं संसार के रूप में प्रकट किन्तु संसार से परे, संसार में लीलापूर्वक विहार करने वाले, संसार में आत्मरूप से व्याप्त, अजन्मा, सर्वव्यापी एवं प्राप्तव्य वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ — उन श्रीहरि का ही स्मरण करता हूँ और उनकी शरण में जाता हूँ।

    श्लोक २६

    संस्कृत: योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते। योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम्॥

    Transliteration: Yogarandhita Karmāṇo Hr̥di Yogavibhāvite। Yogino Yaṁ Prapaśyanti Yogeśaṁ Taṁ Nato’smyaham॥

    हिंदी अर्थ: जिन्होंने भगवदशक्ति-रूपी योग के द्वारा समस्त कर्मों को भस्म कर दिया है — जिन्हें योगी और ऋषिगण अपने शुद्ध हृदय में निरन्तर साक्षात् देखते हैं — उन योगेश्वर भगवान को मेरा नमस्कार है।

    श्लोक २७

    संस्कृत: नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग- शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय। प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने॥

    Transliteration: Namo Namastubhyamasahyavega- Śaktitrayāyākhiladhīguṇāya। Prapannapālāya Durantaśaktaye Kadindriyāṇāmanavāpyavartmane॥

    हिंदी अर्थ: जिनकी त्रिगुणात्मक शक्तियों का वेग असह्य है, जो सभी इन्द्रियों के समस्त विषयों में व्याप्त हैं — किन्तु इन्द्रियों में डूबे हुए लोगों को जिनका मार्ग भी नहीं मिल पाता — ऐसे शरणागत-रक्षक, अपार शक्तिशाली भगवान को बारम्बार नमस्कार है।

    श्लोक २८ — गजेंद्र का अन्तिम समर्पण

    संस्कृत: नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम्। तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तितोऽस्म्यहम्॥

    Transliteration: Nāyaṁ Veda Svamātmānaṁ Yacchaktyāhaṁdhiyā Hatam। Taṁ Duratyayamāhātmyaṁ Bhagavantito’smyaham॥

    हिंदी अर्थ: जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढके हुए होने के कारण यह जीव अपने स्वरूप को जान नहीं पाता — उन अपार महिमावाले भगवान की शरण मैं आया हूँ।

    श्रीशुकदेव जी का वर्णन — भगवान का आगमन (श्लोक २९–३३)

    गजेंद्र-स्तुति के पश्चात् श्री शुकदेव जी राजा परीक्षित को आगे का वृत्तान्त सुनाते हैं।

    श्लोक २९

    संस्कृत: एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः। नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात् तत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत्॥

    Transliteration: Evaṁ Gajendramupavar̥ṇitanirviśeṣaṁ Brahmādayo Vividhaliṅgabhidābhimānāḥ। Naite Yadopasasṛpurnikhilātmakatvāt Tatrākhilāmarmayo Harirāvirāsīt॥

    हिंदी अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं — इस प्रकार गजेंद्र ने जब भगवान के भेदरहित निराकार स्वरूप का वर्णन किया, तब उस गजराज के समीप ब्रह्मा सहित अन्य कोई देवता नहीं आए — जो अपने विभिन्न विशेष विग्रहों को ही अपना रूप मानते हैं। क्योंकि गजेंद्र ने जिस निर्विशेष परमात्मा की स्तुति की, वे सबके आत्मा होने के कारण सर्वदेवस्वरूप साक्षात् श्रीहरि ही वहाँ प्रकट हो गए।

    श्लोक ३०

    संस्कृत: तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः। छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमानः चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः॥

    Transliteration: Taṁ Tadvadārtamupabhya Jagannivāsaḥ Stotraṁ Niśamya Divijaiḥ Saha Saṁstuvadhhiḥ। Channddomayena Garuḍena Samuhyamānaḥ Cakrāyudho’bhyagamadāśu Yato Gajendraḥ॥

    हिंदी अर्थ: गजराज को इस प्रकार पीड़ित देखकर और उसके द्वारा गाई गई स्तुति को सुनकर — सम्पूर्ण जगत के आश्रय भगवान, देवताओं के साथ उनकी स्तुति स्वीकार करते हुए — वेद-मन्त्रमय छन्दोमय गरुड़ की पीठ पर सवार होकर — चक्रधारी प्रभु तत्काल उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ गजेंद्र था।

    श्लोक ३१

    संस्कृत: सोऽन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्। उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छान्- नारायण! खिलगुरो! भगवन्! नमस्ते॥

    Transliteration: So’ntassarasyurubalen Gr̥hīta Ārtto Dr̥ṣṭvā Garutmati Hariṁ Kha Upāttacakram। Utkṣipya Sāmbujkaraṁ Giramāha Kr̥cchān- Nārāyaṇa! Khilaguro! Bhagavan! Namaste॥

    हिंदी अर्थ: सरोवर के भीतर महाबलशाली मगरमच्छ द्वारा जकड़े और अत्यन्त पीड़ित उस हाथी ने — आकाश में गरुड़ की पीठ पर विराजे और हाथों में चक्र लिए भगवान विष्णु को आते देखा। तब उसने अपनी सूँड उठाई — जिसमें पहले से पूजा के लिए कमल का एक फूल था — और कठिनाई से यह वाक्य कहा: “नारायण! समस्त जगत के गुरु! भगवन्! आपको मेरा नमस्कार है।”

    श्लोक ३२

    संस्कृत: तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार। ग्राहाद्विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम्॥

    Transliteration: Taṁ Vīkṣya Pīḍitamájaḥ Sahasāvatīrya Sagrāhamāśu Sarasaḥ Kr̥payojjahāra। Grāhādvipāṭitamukhādariṇā Gajendraṁ Sampaśyatāṁ HariramoMucadUstriyāṇām॥

    हिंदी अर्थ: लाचार हाथी को इस प्रकार पीड़ित देखकर अजन्मा श्रीहरि तत्काल गरुड़ से नीचे उतर आए। उन्होंने अत्यन्त दयाभाव से ग्राह सहित उस गजराज को सरोवर से बाहर निकाला। फिर देवताओं के देखते-देखते अपने सुदर्शन चक्र से उस मगरमच्छ के मुँह को चीरकर गजेंद्र को उसके चंगुल से मुक्त कर दिया — यही Gajendra Moksha है।

    श्लोक ३३

    संस्कृत: एवं विमुक्तो भगवत्प्रमुक्तो ग्राहग्रहात् सोऽत्यन्ततां प्रपन्नः। रूपं स जगाहे वपुरात्मनो यत् सायुज्यमुक्तिर्भगवत्प्रसादात्॥

    (यह अन्तिम श्लोक गजेंद्र के मुक्त होने एवं साथ ही ग्राह की भी मुक्ति का वर्णन करता है।)

    Transliteration: Evaṁ Vimukto Bhagavatpramukto Grāhagrahāt So’tyantatāṁ Prapannaḥ। Rūpaṁ Sa Jagāhe Vapurātmano Yat Sāyujyamuktibhagavatprasādāt॥

    हिंदी अर्थ: इस प्रकार भगवान की कृपा से ग्राह की पकड़ से मुक्त गजेंद्र ने — जो पूर्णतः भगवान की शरण में आ चुके थे — भगवत्प्रसाद से साक्षात् सायुज्य-मुक्ति को प्राप्त किया और अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हो गए। साथ ही जो मगरमच्छ था — वह भी भगवान के स्पर्श से अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त हुआ।

    Gajendra Moksha Stotra का आध्यात्मिक संदेश (Spiritual Meaning)

    Gajendra Moksha Stotram का आध्यात्मिक संदेश तीन स्तरों पर प्रकट होता है:

    १. ज्ञान और भक्ति का समन्वय: यह स्तोत्र केवल भावुक पुकार नहीं — इसमें भगवान के निर्गुण-निराकार और सगुण-साकार दोनों स्वरूपों का गहन दार्शनिक वर्णन है। गजेंद्र ने ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया।

    २. अहंकार का त्याग: जब तक गजेंद्र अपनी शक्ति और अहंकार में थे — मुक्ति नहीं मिली। अहंकार छूटते ही भगवान स्वयं आए।

    ३. शरणागति का महत्त्व: Gajendra Moksha यह सिखाता है कि ईश्वर की शरण पूर्ण समर्पण से लेने पर मुक्ति अवश्य मिलती है — चाहे भक्त कितनी भी विकट परिस्थिति में हो।

    Gajendra Moksha Path – कब और कैसे करें

    ब्रह्म मुहूर्त — सूर्योदय से डेढ़ घंटे पूर्व इस स्तोत्र का पाठ सर्वाधिक फलदायी है।

    एकादशी तिथि — विष्णु भक्ति की प्रमुख तिथि पर Gajendra Moksha Stotram का पाठ विशेष पुण्यदायी है।

    कार्तिक मास — इस माह में प्रतिदिन Gajendra Moksha Path मोक्षदायी माना जाता है।

    संकट के समय — जब जीवन में कोई बड़ी बाधा या भय हो।

    श्रावण मास — भगवान विष्णु की भक्ति का श्रेष्ठ काल।

    Gajendra Moksha Stotra के आध्यात्मिक लाभ (Spiritual Benefits)

    श्रीमद्भागवत में स्वयं इस पाठ का माहात्म्य बताते हुए कहा गया है कि Gajendra Moksha Stotra In Hindi और संस्कृत में इसका पाठ:

    • स्वर्ग और यश देने वाला है
    • कलियुग के समस्त पापों का नाशक है
    • दुःस्वप्न नाशक है
    • श्रेयस-साधक — अर्थात् परम कल्याण का मार्ग खोलने वाला है
    • भय और संकट से मुक्ति दिलाता है
    • मन की शान्ति और आत्मिक शक्ति प्रदान करता है
    • भगवान विष्णु की विशेष कृपा का कारण बनता है

    Gajendra Moksha Stotra PDF

    अनेक भक्त Gajendra Moksha Stotra PDF को अपने पास सुरक्षित रखते हैं। इसका सबसे प्रामाणिक स्रोत गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित गजेंद्र मोक्ष पुस्तिका है। यह Gajendra Moksha Stotra PDF निःशुल्क उपलब्ध है और इसका पाठ परम मंगलकारी है।

    Download PDF: Gajendra Moksha Stotra PDF

    निष्कर्ष (Conclusion)

    Gajendra Moksha Stotra In Hindi में जो ज्ञान, भक्ति और दर्शन का त्रिवेणी संगम है — वह इसे हिन्दू धर्म के सबसे दिव्य स्तोत्रों में से एक बनाता है। गजेंद्र की पुकार में न केवल भावुकता थी, बल्कि ब्रह्म के स्वरूप की गहन समझ भी थी — निर्गुण से सगुण तक, सृष्टि से प्रलय तक, शरण से मुक्ति तक का पूरा दर्शन इन ३३ श्लोकों में समाया हुआ है। इसीलिए भगवान विष्णु स्वयं दौड़े चले आए।

    Gajendra Moksha Stotram का प्रतिदिन पाठ करें, Gajendra Moksha Path को अपने जीवन में नियमित बनाएं। जब भी जीवन में अँधेरा लगे — गजेंद्र की वह दिव्य पुकार याद करें और उस परम शक्ति की शरण लें जो सबकी रक्षा करती है।

    🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏

    ? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    प्र. १: Gajendra Moksha Stotra In Hindi कहाँ से लिया गया है?

    यह स्तोत्र श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध के तृतीय अध्याय से लिया गया है। इसे गजेंद्र ने भगवान विष्णु की स्तुति में गाया था।

    प्र. २: Gajendra Moksha Path का सबसे उत्तम समय कौन सा है?

    प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में — सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले — Gajendra Moksha Path सर्वाधिक फलदायी है।

    प्र. ३: Gajendra Moksha Stotram का पाठ कितने दिन करना चाहिए?

    इसे प्रतिदिन किया जा सकता है। विशेष मनोकामना के लिए ११ या २१ दिनों तक नियमित Gajendra Moksha Path करने की परम्परा है।

    प्र. ४: Gajendra Moksha Stotra PDF कहाँ से प्राप्त करें?

    Gajendra Moksha Stotra PDF गीताप्रेस गोरखपुर की आधिकारिक वेबसाइट और उनकी पुस्तिका के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।

    प्र. ५: इस स्तोत्र के पाठ से क्या विशेष लाभ होता है?

    श्रीमद्भागवत के अनुसार Gajendra Moksha Stotram का पाठ स्वर्ग-यश-दायक, कलियुग के पापों का नाशक, दुःस्वप्न नाशक और परम श्रेयस्कर है।

    प्र. ६: क्या गजेंद्र मोक्ष की कथा केवल एक पशु की कहानी है?

    नहीं। Gajendra Moksha की कथा अहंकार के त्याग, सच्ची शरणागति और ईश्वर की असीम करुणा का प्रतीक है। यह हर आत्मा की मुक्ति-यात्रा का रूपक है।

    प्र. ७: स्तोत्र में कुल कितने श्लोक हैं?

    गीताप्रेस गोरखपुर के प्रकाशन के अनुसार इस सम्पूर्ण प्रसंग में — शुकदेव जी के उपक्रम श्लोक, गजेंद्र के २८ स्तुति-श्लोक और भगवान के आगमन एवं मोक्ष-प्रदान के वर्णन सहित — कुल ३३ श्लोक हैं।

    प्र. ८: क्या ग्राह (मगरमच्छ) को भी मुक्ति मिली?

    हाँ। श्रीमद्भागवत के अनुसार मगरमच्छ पूर्व जन्म में एक गन्धर्व था जो शाप से ग्राह बना था। भगवान के सुदर्शन चक्र के स्पर्श मात्र से वह भी शाप से मुक्त होकर अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुआ।

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