हिंदू धर्म में Maa Annapurna को अन्न, पोषण और जीवन की देवी माना जाता है। “अन्नपूर्णा” शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है अन्न अर्थात भोजन और पूर्णा अर्थात परिपूर्ण। इस प्रकार माँ अन्नपूर्णा वे देवी हैं जो अन्न से सदा परिपूर्ण हैं और समस्त संसार का भरण-पोषण करती हैं।
Annapurna Stotram जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र काशी (वाराणसी) की अधिष्ठात्री देवी माँ अन्नपूर्णा की महिमा का गान करता है। इसमें कुल बारह श्लोक हैं। पहले दस श्लोकों में माँ के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए प्रत्येक के अंत में उनसे भिक्षा की विनम्र प्रार्थना की गई है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार स्वयं भगवान शिव ने काशी में माँ अन्नपूर्णा से भिक्षा ग्रहण की थी। इसी पवित्र प्रसंग की स्मृति में यह Annapurna Stotram प्रतिदिन भक्तजन श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं।
जो भक्त अन्नपूर्णा स्तोत्र का नित्य पाठ करते हैं, उनके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती और माँ की अनुकंपा से सुख-समृद्धि सदा बनी रहती है।
Maa Annapurna Stotram – संपूर्ण संस्कृत पाठ
श्लोक १
Nityanandakari Varabhayakari Saundaryaratnaakari
Nirdhutakhilaghorapavanakari Pratyakshamaaheshvari
Praleyachalavamshapawanakari Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (1)
हिंदी में:
नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (१)
सरल हिंदी अर्थ: हे माँ! आप नित्य आनंद देने वाली, वर और अभय प्रदान करने वाली तथा सौंदर्य की खान हैं। आप समस्त भय एवं पापों का नाश करने वाली, साक्षात महेश्वरी हैं। हिमालय के वंश को पवित्र करने वाली, काशी की अधीश्वरी हे माँ अन्नपूर्णेश्वरी! मुझ पर कृपा करते हुए भिक्षा दीजिए।
श्लोक २
Nanaratnavichitrabhooshanakari Hemaambaraadambari
Muktaharavilambamanavilasadvakshojkumbhaantari
Kashmeeraagaru Vaasitaangaruchire Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (2)
हिंदी में:
नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी
मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (२)
सरल हिंदी अर्थ: हे माँ! आप अनेक प्रकार के विचित्र रत्नाभूषणों से सुसज्जित हैं और सुवर्ण के वस्त्र धारण किए हुई हैं। मोतियों की माला आपके वक्षस्थल की शोभा बढ़ाती है। काश्मीर के चंदन और अगरु से आपका शरीर सुवासित है। हे काशीपुराधीश्वरी, माँ अन्नपूर्णेश्वरी! कृपा करके भिक्षा दीजिए।
श्लोक ३
Yoganandakari Ripukshayakari Dharmaartha Nishthaakari
Chandraarkanalabhasmaanaalahari Trailokyarakshaakari
Sarveshvaryasamastavanchitakari Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (3)
हिंदी में:
योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी
सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (३)
सरल हिंदी अर्थ: हे माँ! आप योग का आनंद देने वाली, शत्रुओं का नाश करने वाली तथा धर्म और अर्थ में निष्ठा प्रदान करने वाली हैं। आपकी दीप्ति चंद्रमा, सूर्य और अग्नि की भाँति तेजस्वी है। आप तीनों लोकों की रक्षा करती हैं एवं समस्त ऐश्वर्य और मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। हे काशीपुराधीश्वरी! भिक्षा दीजिए।
श्लोक ४
Kailaasaachalakandaraalayakari Gauri Uma Shankari
Kaumari Nigamaarthagocharkari Omkarabeejaakshari
Mokshadwaarkapaatapaatanakari Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (4)
हिंदी में:
कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी
मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (४)
सरल हिंदी अर्थ: हे माँ! आप कैलाश पर्वत की कंदराओं में निवास करने वाली, गौरी, उमा और शंकरी हैं। आप कुमारी हैं, वेद के गूढ़ रहस्यों को प्रकट करने वाली और ओंकार की बीजाक्षर हैं। आप मोक्ष के द्वार के कपाट खोलने वाली काशीपुराधीश्वरी हैं। हे माँ अन्नपूर्णेश्वरी! भिक्षा दीजिए।
श्लोक ५
Drishyadrishyavibhootivaahanakari Brahmaandabhaandodari
Leelanaatakasootrabhedanakari Vijnanadeepaankuri
Shreevishveshamana Prasadanakari Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (5)
हिंदी में:
दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (५)
सरल हिंदी अर्थ: हे माँ! आप दृश्य और अदृश्य दोनों प्रकार की विभूतियों की वाहिका हैं। आपके उदर में समस्त ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। आप इस संसार की लीला-नाटिका के सूत्रों को उद्घाटित करने वाली और विज्ञान के दीपक को प्रज्वलित करने वाली हैं। भगवान विश्वेश्वर के मन को प्रसन्न करने वाली हे काशीपुराधीश्वरी! भिक्षा दीजिए।
श्लोक ६
Urvee Sarvajaneshvari Bhagavati Maataannapurneshvari
Venineelasaamaanakuntalahri Nityannadaneshvari
Sarvaanandakari Sada Shubhakari Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (6)
हिंदी में:
उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी
वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (६)
सरल हिंदी अर्थ: हे भगवती! आप इस धरती पर समस्त जनों की ईश्वरी हैं। आपके केश नील वेणी के समान सुंदर हैं। आप नित्य अन्न-दान करने वाली ईश्वरी हैं। आप सदा सभी को आनंद और शुभ प्रदान करने वाली काशीपुराधीश्वरी, माँ अन्नपूर्णेश्वरी! कृपा करके भिक्षा दीजिए।
श्लोक ७
Aadikshantasamastavarnanakaari Shambhostribaavaakari
Kashmeeraatrijaleshvari Trilahari Nityankura Sharvari
Kamakaankshaakari Janodayakari Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (7)
हिंदी में:
आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी
काश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (७)
सरल हिंदी अर्थ: हे माँ! आप ‘अ’ से ‘क्ष’ तक समस्त वर्णों की व्याख्या करने वाली हैं। आप शंभु के तीनों भावों को धारण करने वाली हैं। आप तीन लहरों की ईश्वरी और नित्य अंकुरित होने वाली रात्रि-शक्ति हैं। आप मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली और जनों का उत्थान करने वाली हे काशीपुराधीश्वरी! भिक्षा दीजिए।
श्लोक ८
Devi Sarvavichitrarathnarachita Daakshayani Sundari
Vaamam Swadupayodharapriyakari Saubhaagyamaaheshvari
Bhaktaabheeshtakari Sada Shubhakari Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (8)
हिंदी में:
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी
वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (८)
सरल हिंदी अर्थ: हे देवी! आप विचित्र रत्नों से सुसज्जित, दक्ष की पुत्री दाक्षायणी और सुंदरी हैं। आप सौभाग्य की महेश्वरी हैं। आप भक्तों की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करने वाली और सदा शुभ करने वाली काशीपुराधीश्वरी, माँ अन्नपूर्णेश्वरी! भिक्षा दीजिए।
श्लोक ९
Chandraarkaanalakotichotisadrisha Chandraanshubimbaadhari
Chandraarkaagnisaamaanakuntaladhari Chandraarkavarneshvari
Malaapustakapaashaasankushadhari Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (9)
हिंदी में:
चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी
मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (९)
सरल हिंदी अर्थ: हे माँ! आपकी कांति करोड़ों चंद्रमा, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी है। आपके ओष्ठ चंद्रबिंब की भाँति सुंदर हैं और आपके केश चंद्र, सूर्य और अग्नि जैसी दीप्ति लिए हुए हैं। आप हाथों में माला, पुस्तक, पाश और अंकुश धारण करने वाली काशीपुराधीश्वरी, माँ अन्नपूर्णेश्वरी! भिक्षा दीजिए।
श्लोक १०
Kshatratraanakari Mahaabhayakari Mata Kripaasaagari
Saakshaanmokshakari Sada Shivakari Vishveshvarashridhari
Dakshaakrandakari Niraamayakari Kashipuraadhishvari
Bhiksham Dehi Kripavalambanakaari Maataannapurneshvari (10)
हिंदी में:
क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी
साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी (१०)
सरल हिंदी अर्थ: हे माँ! आप रक्षा करने वाली, महान अभय देने वाली और कृपा की सागर हैं। आप साक्षात मोक्ष प्रदान करने वाली, सदा शिव-कल्याण करने वाली और भगवान विश्वेश्वर की श्री को धारण करने वाली हैं। आप रोगों का नाश करने वाली काशीपुराधीश्वरी, माँ अन्नपूर्णेश्वरी! भिक्षा दीजिए।
श्लोक ११ – Annapurna Stotram का हृदय
Annapurne Sadapurne Shankarapraanavallabhe
Gyanavairaagyasiddhyartham Bhiksham Dehi Cha Parvati (11)
हिंदी में:
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति (११)
शब्द अर्थ:
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| अन्नपूर्णे | जो अन्न से परिपूर्ण हैं |
| सदापूर्णे | जो सदा परिपूर्ण हैं |
| शंकरप्राणवल्लभे | शंकर के प्राणों की प्रिया |
| ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं | ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए |
| भिक्षां देहि | भिक्षा दीजिए |
| पार्वति | हे पार्वती |
सरल हिंदी अर्थ: हे अन्नपूर्णा, जो सदा परिपूर्ण हैं! हे शंकर की प्राणप्रिया पार्वती! मुझे ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए भिक्षा प्रदान कीजिए।
यह श्लोक संपूर्ण Annapurna Stotram का सार है। यहाँ भक्त माँ से केवल भोजन नहीं, बल्कि ज्ञान और वैराग्य की भिक्षा माँगता है। यही इस स्तोत्र की अनूठी आध्यात्मिक विशेषता है।
श्लोक १२ – फलश्रुति
Mata Cha Parvati Devi Pita Devo Maheshvarah
Bandhaavah Shivabhaktaashcha Swadesh Bhuvanatrayam (12)
हिंदी में:
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् (१२)
सरल हिंदी अर्थ: मेरी माता देवी पार्वती हैं, मेरे पिता देव महेश्वर अर्थात भगवान शिव हैं। शिवभक्त मेरे बंधु-बांधव हैं और तीनों लोक मेरा देश हैं।
यह अंतिम श्लोक भक्त की उस उच्च भावना को दर्शाता है जहाँ वह संपूर्ण जगत को अपना परिवार और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपना घर मानता है। यही सनातन धर्म की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना है।
Annapurna Stotram का आध्यात्मिक महत्व
Annapurna Stotram केवल एक स्तुति नहीं, यह एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है।
माँ अन्नपूर्णा का दर्शन हमें यह सिखाता है कि भोजन ही ब्रह्म है। उपनिषद का वाक्य “अन्नं ब्रह्म” इसी सत्य को उद्घोषित करता है। अन्न केवल शरीर का पोषण नहीं करता, वह आत्मा को भी जीवंत रखता है। जो माँ यह अन्न प्रदान करती हैं, वे ही इस सृष्टि की वास्तविक पालनहार हैं।
आदि शंकराचार्य ने अन्नपूर्णा स्तोत्र की रचना काशी में की थी। काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है और माँ अन्नपूर्णा वहाँ की प्रमुख देवी हैं। इस स्तोत्र में माँ के अनेक दिव्य स्वरूपों का वर्णन है वे गौरी हैं, उमा हैं, शंकरी हैं और कौमारी भी हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस स्तोत्र में शंकराचार्य जी माँ से ज्ञान और वैराग्य की भिक्षा माँगते हैं, न कि धन या भोजन की। यह दर्शाता है कि Maa Annapurna Stotram केवल शारीरिक पोषण का नहीं, बल्कि आत्मिक पोषण का भी अमूल्य स्रोत है।
Annapurna Stotram कब पढ़ें?
Annapurna Stotram का पाठ निम्नलिखित अवसरों पर विशेष रूप से फलदायी माना जाता है:
- प्रतिदिन प्रातःकाल – सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में
- भोजन बनाने से पहले – रसोई में माँ का स्मरण करते हुए
- अन्नपूर्णा जयंती पर – मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा के दिन
- नवरात्रि के नौ पावन दिनों में
- दीपावली और अन्नकूट के शुभ अवसर पर
- जब घर में अन्न की कमी हो अथवा आर्थिक संकट की स्थिति हो
- किसी नवीन गृह में प्रवेश के समय
- काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन से पूर्व
परंपरागत मान्यता के अनुसार Maa Annapurna Stotram का पाठ १०८ बार अथवा ११ बार करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
Annapurna Stotram के आध्यात्मिक और भावनात्मक लाभ
अन्नपूर्णा स्तोत्र का नित्य पाठ करने वाले भक्तों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं:
१. अन्न और समृद्धि की प्राप्ति माँ अन्नपूर्णा की कृपा से घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होती। परिवार सुख-संपन्न बना रहता है।
२. ज्ञान और विवेक की वृद्धि इस स्तोत्र में ज्ञान और वैराग्य की कामना की गई है। नित्य पाठ से साधक का मन शुद्ध और विवेकशील होता है।
३. मन की शांति माँ की भक्ति से मन के समस्त भय और चिंताएँ दूर होती हैं तथा अंतःकरण में गहरी शांति का अनुभव होता है।
४. पारिवारिक सुख और एकता बारहवें श्लोक की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से परिवार में प्रेम, एकता और सद्भावना बढ़ती है।
५. मोक्ष की ओर मार्ग माँ अन्नपूर्णा को “मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी” अर्थात मोक्ष के द्वार खोलने वाली कहा गया है। इनकी उपासना से आत्मा की मुक्ति का मार्ग सुगम होता है।
६. स्वास्थ्य और दीर्घायु दसवें श्लोक में माँ को “निरामयकरी” अर्थात रोगों का नाश करने वाली कहा गया है। नित्य पाठ से स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
७. शत्रुओं से रक्षा माँ “रिपुक्षयकरी” हैं अर्थात शत्रुओं का नाश करने वाली। उनकी कृपा से साधक शत्रु-भय से मुक्त रहता है।
Annapurna Stotram In Hindi – पाठ की सरल विधि
Annapurna Stotram in Hindi पढ़ने की विधि अत्यंत सरल और सुलभ है:
१. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। २. माँ अन्नपूर्णा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप और अगरबत्ती प्रज्वलित करें। ३. पुष्प, धूप और नैवेद्य (भोग) श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। ४. शांत और एकाग्र मन से अन्नपूर्णा स्तोत्र का पाठ आरंभ करें। ५. पाठ करते समय माँ के चरण-कमलों में ध्यान लगाएँ। ६. पाठ की समाप्ति पर माँ से क्षमा-याचना करें और प्रसाद ग्रहण करें।
Conclusion – उपसंहार
Annapurna Stotram केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है, यह एक संपूर्ण जीवन-दर्शन है। जब आदि शंकराचार्य जैसे महान संन्यासी माँ से “ज्ञान और वैराग्य की भिक्षा” माँगते हैं, तब वे संपूर्ण मानवजाति को यह संदेश देते हैं कि सच्ची भिक्षा आत्मिक जागरण की है, सांसारिक संपदा की नहीं।
माँ अन्नपूर्णा हमें यह स्मरण कराती हैं कि जो व्यक्ति परमात्मा के प्रति सच्ची कृतज्ञता रखता है, उसके जीवन में कभी अभाव नहीं आता। प्रत्येक ग्रास में उनकी कृपा है, प्रत्येक श्वास में उनका आशीर्वाद है।
यदि आप Annapurna Stotram का नित्य पाठ करते हैं, तो माँ की कृपा से आपके जीवन में अन्न, धन, ज्ञान और मोक्ष चारों की प्राप्ति सुनिश्चित होती है।
माँ अन्नपूर्णा की जय!
काशी की अधीश्वरी, शंकर की प्राणवल्लभे, हमारे जीवन को ज्ञान, भक्ति और समृद्धि से सदा परिपूर्ण रखें।
? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न १: Annapurna Stotram किसने लिखा है?
Annapurna Stotram की रचना जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने की थी। वे अद्वैत वेदांत के प्रणेता थे। उन्होंने काशी में निवास करते हुए माँ अन्नपूर्णा की कृपा से प्रेरित होकर इस स्तोत्र की रचना की।
प्रश्न २: Annapurna Stotram Full पाठ में कितने श्लोक हैं?
Annapurna Stotram Full में कुल बारह श्लोक हैं। पहले दस श्लोकों में माँ की दिव्य महिमा का वर्णन करते हुए भिक्षा की प्रार्थना है। ग्यारहवें में ज्ञान और वैराग्य की माँग है तथा बारहवें श्लोक में संपूर्ण जगत को परिवार बताया गया है।
प्रश्न ३: Maa Annapurna Stotram कितनी बार पढ़ना चाहिए?
Maa Annapurna Stotram का प्रतिदिन एक बार पाठ भी अत्यंत लाभकारी है। किसी विशेष अनुष्ठान या मनोकामना की पूर्ति के लिए इसे ११ बार या १०८ बार पढ़ने का विधान है।
प्रश्न ४: अन्नपूर्णा स्तोत्र पढ़ने का सर्वोत्तम समय कौन सा है?
अन्नपूर्णा स्तोत्र पढ़ने का सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त अर्थात सूर्योदय से पूर्व का समय है। इसके अतिरिक्त रसोई में भोजन बनाने से पहले माँ का स्मरण करते हुए भी इसका पाठ किया जा सकता है।
प्रश्न ५: क्या Annapurna Stotram In Hindi में उपलब्ध है?
हाँ, Annapurna Stotram in Hindi अर्थ-सहित अनेक प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथों और वेबसाइटों पर उपलब्ध है। मूल स्तोत्र संस्कृत में है, परंतु हिंदी अर्थ सहित पढ़ने से भावार्थ और अधिक स्पष्ट एवं हृदयग्राही हो जाता है।
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