हिंदू तांत्रिक उपासना में Devi Khadgamala Stotram एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तोत्र है। यह स्तोत्र श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी देवी को समर्पित है, जो शक्ति की परम स्वरूप हैं। “खड्गमाला” का अर्थ होता है – तलवारों की माला या दिव्य नामों की माला जो तलवार की भाँति रक्षा करे।
यह स्तोत्र वामकेश्वर तंत्र के उमा-महेश्वर संवाद से लिया गया है। इसमें श्रीचक्र के नौ आवरणों की समस्त देवियों के नाम एक माला की भाँति पिरोए गए हैं। ऐसा माना जाता है कि Khadgamala Stotram का नियमित पाठ करने मात्र से साधक को समस्त देवियों की कृपा प्राप्त होती है और नवावरण पूजा का पूर्ण फल मिलता है।
जो भक्त श्रीचक्र की पूर्ण पूजा करने में सक्षम नहीं हैं, उनके लिए यह स्तोत्र एक सरल और अत्यंत प्रभावशाली विकल्प है। Sri Devi Khadgamala Stotram की महिमा इसी में है कि इसके स्मरण मात्र से भक्त को महासिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
Devi Khadgamala Stotram – स्तोत्र का मूल संस्कृत पाठ (Sanskrit Text)
श्री देवी प्रार्थना (Dhyana Shloka)
हृीङ्कारासनगर्भितानलशिखां सौः क्लीं कळां बिभ्रतीं
सौवर्णाम्बरधारिणीं वरसुधाधौतां त्रिनेत्रोज्ज्वलाम् ।
वन्दे पुस्तकपाशमङ्कुशधरां स्रग्भूषिताम् उज्ज्वलां
त्वां गौरीं त्रिपुरां परात्परकळां श्रीचक्रसञ्चारिणीम् ॥
Transliteration:
Hreenkaaraasanagarbhitaanalasikhaam sauh kleem kalaam bibhrateem
sauvarnaambara dhaarineem varasudhaadhautaam trinetrojjvalaam |
vande pustakapaashamankushadhaaraam sragbhooshitaamujjvalaam
tvaam gaureem tripuraam paraatparakalaam shreechakrasancharineem ||
हिंदी अर्थ: मैं उस देवी की वंदना करता हूँ, जो हृीं बीज-मंत्र के आसन पर विराजमान हैं, जिनकी कांति अग्नि की ज्वाला जैसी है, जो सौः और क्लीं कलाओं को धारण करती हैं। वे सुनहरे वस्त्र धारण करती हैं, तीन नेत्रों से दीप्तिमान हैं, पुस्तक, पाश और अंकुश धारण करती हैं, और श्रीचक्र में विचरण करती हैं। ऐसी गौरी, त्रिपुरा, परम-परा-कला स्वरूपा देवी को मेरा प्रणाम।
ध्यान श्लोक (Dhyana)
ताद्रशं खड्गमाप्नोति येन हस्तस्थितेनवै ।
अष्टादश महाद्वीप सम्राट् भोक्ता भविष्यति ॥
आरक्ताभां त्रिणेत्राम् अरुणिमवसनां रत्नताटङ्करम्यां
हस्ताम्भोजैस्सपाशाङ्कुश मदन धनुस्सायकैर्विस्फुरन्तीम् ।
आपीनोत्तुङ्ग वक्षोरुह कलशलुठत्तार हारोज्ज्वलाङ्गीं
ध्यायेदम्भोरुहस्था-मरुणिमवसना-मीश्वरीमीश्वराणाम् ॥
Transliteration:
Taadrisham khadgamaapnoti yena hastasthitenavai |
ashtaadasha mahaadweepa samraat bhoktaa bhavishyati ||
Aaraktaabhaam trinethraamarunima vasanaam ratnatataankaramyaam
hastaambhojaissapaashaankusha madana dhanussaayakairvisphuranteem |
aapeenottunga vakshoruha kalashaluthatttaara haarojjvalangeem
dhyaayedambhoruhasthaa-marunima vasanaa-meeshvareemsvaraanaam ||
हिंदी अर्थ: जो इस खड्गमाला का पाठ करता है, वह ऐसा खड्ग (शक्ति-कवच) प्राप्त करता है जिससे वह अठारह महाद्वीपों का सम्राट भोक्ता बन जाता है। देवी अरुण वर्ण की हैं, त्रिनेत्री हैं, रत्नजड़ित कुंडल धारण करती हैं, और कमल, पाश, अंकुश, धनुष-बाण लिए हुए हैं। ऐसी कमल-पुष्प पर विराजमान ईश्वरी का ध्यान करें।
पंचपूजा (Panchapuja)
लं – पृथिवीतत्त्वात्मिकायै श्री ललितात्रिपुरसुन्दरी परा-
भट्टारिकायै गन्धं परिकल्पयामि – नमः
हं – आकाशतत्त्वात्मिकायै श्री ललितात्रिपुरसुन्दरी परा-
भट्टारिकायै पुष्पं परिकल्पयामि – नमः
यं – वायुतत्त्वात्मिकायै श्री ललितात्रिपुरसुन्दरी परा-
भट्टारिकायै धूपं परिकल्पयामि – नमः
रं – तेजस्तत्त्वात्मिकायै श्री ललितात्रिपुरसुन्दरी परा-
भट्टारिकायै दीपं परिकल्पयामि – नमः
वं – अमृततत्त्वात्मिकायै श्री ललितात्रिपुरसुन्दरी परा-
भट्टारिकायै अमृतनैवेद्यं परिकल्पयामि – नमः
सं – सर्वतत्त्वात्मिकायै श्री ललितात्रिपुरसुन्दरी परा-
भट्टारिकायै ताम्बूलादिसर्वोपचारान् परिकल्पयामि – नमः
हिंदी अर्थ: पंचतत्वों – पृथ्वी (गंध), आकाश (पुष्प), वायु (धूप), अग्नि (दीप), और अमृत (नैवेद्य) के माध्यम से श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी परम भट्टारिका की उपासना की जाती है।
श्री देवी संबोधन (Sambodhanam)
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ॐ नमस्त्रिपुरसुन्दरी
तिथिनित्यदेवताः (16 नित्या देवियाँ)
कामेश्वरी, भगमालिनी, नित्यक्लिन्ने, भेरुण्डे, वह्निवासिनी,
महावज्रेश्वरी, शिवदूती, त्वरिते, कुलसुन्दरी, नित्ये,
नीलपताके, विजये, सर्वमङ्गले, ज्वालामालिनी, चित्रे, महानित्ये
श्रीचक्र नवावरण की देवियाँ (Nava Avarana Devatas)
प्रथम आवरण – त्रैलोक्यमोहन चक्र (Trailokyamohana Chakra):
अणिमासिद्धे, लघिमासिद्धे, गरिमासिद्धे, महिमासिद्धे,
ईशित्वसिद्धे, वशित्वसिद्धे, प्राकाम्यसिद्धे, भुक्तिसिद्धे,
इच्छासिद्धे, प्राप्तिसिद्धे, सर्वकामसिद्धे,
ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री,
चामुण्डे, महालक्ष्मी,
सर्वसंक्षोभिणी, सर्वविद्राविणी, सर्वाकर्षिणी,
सर्ववशंकरी, सर्वोन्मादिनी, सर्वमहाङ्कुशे,
सर्वखेचरी, सर्वबीजे, सर्वयोने, सर्वत्रिखण्डे,
त्रैलोक्यमोहन चक्रस्वामिनी, प्रकटयोगिनी
द्वितीय आवरण – सर्वाशापरिपूरक चक्र (Sarvaashaparipooraka Chakra):
कामाकर्षिणी, बुद्ध्याकर्षिणी, अहंकाराकर्षिणी,
शब्दाकर्षिणी, स्पर्शाकर्षिणी, रूपाकर्षिणी,
रसाकर्षिणी, गन्धाकर्षिणी, चित्ताकर्षिणी,
धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी, नामाकर्षिणी,
बीजाकर्षिणी, आत्माकर्षिणी, अमृताकर्षिणी, शरीराकर्षिणी,
सर्वाशापरिपूरक चक्रस्वामिनी, गुप्तयोगिनी
तृतीय आवरण – सर्वसंक्षोभण चक्र (Sarvasamkshobhana Chakra):
अनङ्गकुसुमे, अनङ्गमेखले, अनङ्गमदने,
अनङ्गमदनातुरे, अनङ्गरेखे, अनङ्गवेगिनी,
अनङ्गाङ्कुशे, अनङ्गमालिनी,
सर्वसंक्षोभण चक्रस्वामिनी, गुप्ततरयोगिनी
चतुर्थ आवरण – सर्वसौभाग्यदायक चक्र (Sarvasaubhagyadayaka Chakra):
सर्वसंक्षोभिणी, सर्वविद्राविणी, सर्वाकर्षिणी,
सर्वह्लादिनी, सर्वसम्मोहिनी, सर्वस्तम्भिनी,
सर्वजृम्भिणी, सर्ववशंकरी, सर्वरञ्जनी,
सर्वोन्मादिनी, सर्वार्थसाधिके, सर्वसम्पत्तिपूरिणी,
सर्वमन्त्रमयी, सर्वद्वन्द्वक्षयंकरी,
सर्वसौभाग्यदायक चक्रस्वामिनी, सम्प्रदाययोगिनी
पञ्चम आवरण – सर्वार्थसाधक चक्र (Sarvarthasadhaka Chakra):
सर्वसिद्धिप्रदे, सर्वसम्पत्प्रदे, सर्वप्रियंकरी,
सर्वमङ्गलकारिणी, सर्वकामप्रदे, सर्वदुःखविमोचनी,
सर्वमृत्युप्रशमनी, सर्वविघ्ननिवारिणी,
सर्वाङ्गसुन्दरी, सर्वसौभाग्यदायिनी,
सर्वार्थसाधक चक्रस्वामिनी, कुलोत्तीर्णयोगिनी
षष्ठ आवरण – सर्वरक्षाकर चक्र (Sarvarakshakara Chakra):
सर्वज्ञे, सर्वशक्ते, सर्वैश्वर्यप्रदायिनी,
सर्वज्ञानमयी, सर्वव्याधिविनाशिनी,
सर्वाधारस्वरूपे, सर्वपापहरे,
सर्वानन्दमयी, सर्वरक्षास्वरूपिणी,
सर्वेप्सितफलप्रदे,
सर्वरक्षाकर चक्रस्वामिनी, निगर्भयोगिनी
सप्तम आवरण – सर्वरोगहर चक्र (Sarvarogahara Chakra):
वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमले,
अरुणे, जयिनी, सर्वेश्वरी, कौळिनी,
सर्वरोगहर चक्रस्वामिनी, रहस्ययोगिनी
अष्टम आवरण – सर्वसिद्धिप्रद चक्र (Sarvasiddhiprada Chakra):
बाणिनी, चापिनी, पाशिनी, अङ्कुशिनी,
महाकामेश्वरी, महावज्रेश्वरी, महाभगमालिनी,
सर्वसिद्धिप्रद चक्रस्वामिनी, अतिरहस्ययोगिनी
नवम आवरण – सर्वानन्दमय चक्र (Sarvaanandamaya Chakra):
श्री श्री महाभट्टारिके,
सर्वानन्दमय चक्रस्वामिनी,
पराऽपररहस्ययोगिनी
नव चक्रेश्वरी नाम (Nava Cakra Names)
त्रिपुरे, त्रिपुरेशी, त्रिपुरसुन्दरी, त्रिपुरवासिनी,
त्रिपुराश्रीः, त्रिपुरमालिनी, त्रिपुरसिद्धे,
त्रिपुराम्बा, महात्रिपुरसुन्दरी
श्री देवी विशेषण – नमस्कार नवाक्षरी (Namaskaranavaksari)
महामहेश्वरी, महामहाराज्ञी, महामहाशक्ते,
महामहागुप्ते, महामहाज्ञप्ते, महामहानन्दे,
महामहास्कन्धे, महामहाशये,
महामहा श्रीचक्रनगरसाम्राज्ञी,
नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमः ।
फलश्रुति (Phalashruti) – पाठ का फल
एषा विद्या महासिद्धिदायिनी स्मृतिमात्रतः ।
अग्निवातमहाक्षोभे राजाराष्ट्रस्यविप्लवे ॥
लुण्ठने तस्करभये संग्रामे सलिलप्लवे ।
समुद्रयानविक्षोभे भूतप्रेतादिके भये ॥
अपस्मारज्वरव्याधिमृत्युक्षामादिजेभये ।
शाकिनी पूतनायक्षरक्षःकूष्माण्डजे भये ॥
मित्रभेदे ग्रहभये व्यसनेष्वाभिचारिके ।
अन्येष्वपि च दोषेषु मालामन्त्रं स्मरेन्नरः ॥
ताद्रशं खड्गमाप्नोति येन हस्तस्थितेनवै ।
अष्टादशमहाद्वीपसम्राड्भोक्ताभविष्यति ॥
सर्वोपद्रवनिर्मुक्तस्साक्षाच्छिवमयोभवेत् ।
आपत्काले नित्यपूजां विस्तारात्कर्तुमारभेत् ॥
एकवारं जपध्यानं सर्वपूजाफलं लभेत् ।
नवावरणदेवीनां ललितायाः महाजनः ॥
एकत्र गणनारूपो वेदवेदाङ्गगोचरः ।
सर्वागमरहस्यार्थः स्मरणात्पापनाशिनी ॥
ललितायामहेशान्या मालाविद्या महीयसी ।
नरवश्यं नरेन्द्राणां वश्यं नारीवशंकरम् ॥
अणिमादिगुणैश्वर्यं रञ्जनं पापभञ्जनम् ।
तत्तदावरणस्थायि देवताबृन्दमन्त्रकम् ॥
मालामन्त्रं परं गुह्यं परं धाम प्रकीर्तितम् ।
शक्तिमाला पञ्चधास्याच्छिवमाला च तादृशी ॥
तस्माद्गोप्यतराद्गोप्यं रहस्यं भुक्तिमुक्तिदम् ॥
॥ इति श्री वामकेश्वरतंत्रे उमामहेश्वरसंवादे
देवीखड्गमालास्तोत्ररत्नं समाप्तम् ॥
शब्द-अर्थ (Word Meanings)
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
|---|---|
| खड्ग (Khadga) | तलवार, दिव्य रक्षा-शक्ति |
| माला (Mālā) | माला, श्रृंखला |
| श्रीचक्र (Śrīcakra) | देवी का दिव्य यंत्र |
| नवावरण (Navāvaraṇa) | श्रीचक्र के नौ स्तर |
| बीज (Bīja) | मूल मंत्र-शक्ति |
| सिद्धि (Siddhi) | आध्यात्मिक उपलब्धि |
| फलश्रुति (Phalaśruti) | पाठ का वर्णित फल |
| महाभट्टारिका | परमेश्वरी, सर्वोच्च देवी |
आध्यात्मिक महत्व (Spiritual Significance)
Devi Khadgamala Stotram श्री विद्या उपासना का सार है। इसमें श्रीचक्र के नौ आवरणों में विराजमान सभी देवियों के पवित्र नाम क्रमबद्ध रूप से पिरोए गए हैं।
यह स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं है — यह एक मंत्रमाला है। प्रत्येक देवी-नाम स्वयं में एक बीज-शक्ति है जो उच्चारण करते ही साधक के चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा-कवच बना देती है।
श्री विद्या परंपरा में ऐसा माना गया है कि —
- जो साधक Sri Devi Khadgamala Stotram का नियमित पाठ करता है, उसे नवावरण पूजा करने का संपूर्ण फल प्राप्त होता है।
- यह स्तोत्र तंत्र-मंत्र से उत्पन्न बाधाओं को नष्ट करता है।
- भूत-प्रेत, रोग, शत्रु, अग्नि, जल आदि के भय से रक्षा होती है।
फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है: “एषा विद्या महासिद्धिदायिनी स्मृतिमात्रतः” — अर्थात् यह विद्या केवल स्मरण मात्र से महासिद्धि प्रदान करने वाली है।
पाठ का उचित समय (When to Recite)
Khadgamala Stotram का पाठ निम्न अवसरों पर विशेष रूप से फलदायी माना गया है:
- प्रतिदिन — ब्रह्ममुहूर्त में (सूर्योदय से पूर्व) या संध्याकाल में।
- नवरात्र — नवरात्र के नौ दिनों में प्रतिदिन पाठ करने से विशेष फल।
- शुक्रवार — देवी उपासना का विशेष दिन।
- श्रीचक्र पूजा — नवावरण पूजा के क्रम में।
- संकट के समय — किसी भी भय, व्याधि या आपदा की स्थिति में।
- पूर्णिमा और अमावस्या — इन तिथियों पर पाठ का महत्व विशेष होता है।
परंपरागत रूप से इस स्तोत्र का पाठ गुरु-दीक्षा के पश्चात किया जाता है, किंतु आस्थावान भक्त भी श्रद्धापूर्वक इसका पाठ कर सकते हैं।
आध्यात्मिक लाभ (Spiritual Benefits)
Devi Khadgamala Stotram के पाठ से प्राप्त होने वाले मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:
1. सर्वांगीण सुरक्षा (Complete Protection) स्तोत्र में वर्णित है कि यह पाठ अग्नि, वायु, जल, चोर-भय, युद्ध, भूत-प्रेत आदि समस्त बाधाओं से रक्षा करता है।
2. रोग-मुक्ति (Freedom from Disease) बुखार, मिर्गी, असाध्य रोग और मृत्यु-भय से मुक्ति का वर्णन फलश्रुति में है।
3. मानसिक शांति (Peace of Mind) देवी के दिव्य नामों के उच्चारण से मन की अशांति दूर होती है और भीतरी शक्ति जागती है।
4. सिद्धि-प्राप्ति (Attainment of Siddhi) अणिमा, महिमा, लघिमा आदि अष्टसिद्धियाँ और इच्छाओं की पूर्ति का वर्णन है।
5. पाप-नाश (Destruction of Sins) “स्मरणात्पापनाशिनी” — स्मरण मात्र से पाप नष्ट होते हैं।
6. मोक्ष की ओर मार्ग (Path to Liberation) “रहस्यं भुक्तिमुक्तिदम्” — यह स्तोत्र भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करता है।
7. शत्रु-बाधा निवारण (Protection from Enemies) ग्रह-पीड़ा, मित्र-भेद और अभिचार क्रिया से रक्षा होती है।
Devi Khadgamala Stotram PDF – Telugu, Kannada, Hindi, Sanskrit & English Transliteration
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निष्कर्ष (Conclusion)
Devi Khadgamala Stotram श्री विद्या उपासना का एक अनमोल रत्न है। यह स्तोत्र देवी की समस्त शक्तियों का आह्वान एक माला के रूप में करता है। इसका पाठ करते समय भक्त मानसिक रूप से श्रीचक्र की परिक्रमा करता है और देवी की नौ-शक्ति-आवरणों की कृपा प्राप्त करता है।
जो भक्त इस Khadgamala Stotram को श्रद्धा, पवित्रता और नियमितता के साथ पढ़ते हैं, उन पर माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की अपार कृपा बरसती है। यह स्तोत्र न केवल संकट-मोचक है, बल्कि मोक्ष की ओर ले जाने वाला दिव्य पथ भी है।
माँ ललिता की कृपा से सभी की रक्षा हो, सभी के जीवन में शांति, समृद्धि और आनंद का वास हो।
॥ ॐ श्री ललितायै नमः ॥
? FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: Devi Khadgamala Stotram क्या है?
यह श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी देवी की एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्रमाला है, जिसमें श्रीचक्र के नौ आवरणों की देवियों के नाम क्रमबद्ध रूप से आते हैं। इसे वामकेश्वर तंत्र से लिया गया है।
प्रश्न 2: Khadgamala Stotram का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
एक बार का पाठ भी संपूर्ण नवावरण पूजा का फल देता है, ऐसा फलश्रुति में कहा गया है। नित्य एक पाठ पर्याप्त है। नवरात्र में दो से तीन बार पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
प्रश्न 3: इस स्तोत्र के पाठ से किन-किन समस्याओं में लाभ होता है?
फलश्रुति के अनुसार — रोग, भूत-प्रेत का भय, शत्रु-बाधा, अग्नि-जल का भय, ग्रह-पीड़ा, मित्र-भेद और अभिचार-बाधा — इन सभी में इस स्तोत्र का पाठ लाभकारी है।
प्रश्न 4: क्या बिना दीक्षा के इस स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है?
परंपरागत रूप से श्री विद्या की गुरु-दीक्षा के बाद इसका पाठ करने की सलाह दी जाती है। किंतु श्रद्धा और पवित्र भाव के साथ आस्थावान भक्त भी इसका पाठ कर सकते हैं।
प्रश्न 5: Devi Khadgamala Stotram किस ग्रंथ से लिया गया है?
यह स्तोत्र वामकेश्वर तंत्र के उमा-महेश्वर संवाद से लिया गया है। इसका उल्लेख तंत्रशास्त्र की श्री विद्या परंपरा में मिलता है।
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